जी के चक्रवर्ती
किसी भी देश के लोग विशेष कर हमारे देश के लोग को चुरा लेने की कला या चोरी करने जैसी निकृष्ट कार्यों की प्रवृत्ति की ओर उन्मुख ऐसे ही नहीं हो जाते। इसके लिए कुछ हद तक तो हमारे घरेलू भूत, वर्तमान काल के आचरणों संस्कारों के अलावा वर्तमान समय का आर्थिक परिस्थितियों के साथ सत्तासीन तात्कालिक सरकारी नियम-कानून भी उन्हें वैसा बनाने में बाध्य कर देती हैं।क्योंकि हम मनुष्यों को हर हाल में हमारे वर्तमान समाज में उपस्थित सामाजिक परिवेश से तालमेल बैठाते हुए अपना जीवन यापन करने की संघर्षशील रहने की आवश्यकता होती है जिसे निरन्तर बनाये भी रखना पड़ता है। ठीक इसी तरह किसी देश या समाज के लोग यूँही निठल्ले या आलसी बन नहीं जाते हैं। कुछ खूबी होती है वहां के शासनतंत्र एवं उसके विधि-विधान में, जो देश को आलसी बनने की ओर प्रेरित करती है। हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना यदि चलने-फिरने और काम करने की अपेक्षा लाभकारी साबित होता है तो इंसान उसे ही करना चाहेगा, चाहे वह दुनिया का कोई अन्य देश ही में ही कियूं न पैदा हुआ हो!
हमारे देश में पूंजी लगाकर स्वयं काम करने की बजाय भाड़े या किराए पर देना या पूंजी पर बैठे-बैठे ब्याज खाना अधिक लाभप्रद है और यदि आप निठल्ले रहकर घर बैठे रुपये कमाते हैं तो आपको मेहनत, पसीना और रोजमर्रे की भागदौड़ कर कमाने वाले लोगों की तुलना में कोई अधिक टैक्स नहीं देना पड़ता। यहां पर लोग प्रत्येक चीज, चाहे वह कारखाना हो, सिनेमा, मकान, मशीन, दुकान या कुछ और, सबमें पूंजी लगा कर उसे स्वयं न संभालकर भाड़े पर उठा देते हैं और स्वयं बैठे-बैठे खाते हैं।

यदि हम बातें करें दुनिया के अन्य देशों की जिसमे खासकर जापानी लोग की तो वे कितनी मेहनत से प्रगति कर रहे हैं। यदि दस लाख बैंक में जमा कर किसी को डेढ़ लाख रुपए सालाना ब्याज में मिलता है तो उसे डॉक्टर भी यही सलाह देगा कि कि आप बिस्तर में पडे आराम करें।
वही यदि हम भारत की बात करें तो ब्याज पर रुपया उठाने या चढ़ाने जैसी परम्परा पूर्व समय से चली आ रही है हमारे देश मे अनेकों प्रकार के ब्याज दरें देखने को मिलती हैं, ऐसा शायद किसी दूसरे देशों में देखने को नहीं मिलेगा। आज शहरों से लेकर गांवों तक में लोग किराये पर मकान या कमरा लेकर रहने के लिए मजबूर है। वही शहरों में आपके द्वारा खरीदी गयी टैक्सी या रिक्शा दूसरा व्यक्ति चला कर प्रतिदिन शाम को आपको रुपये लाकर दे रहा हो तो आप सिवाय खा-खा कर अपना पेट भरेंगे, और तोंद में हाथ फेरते हुये इधर-उधर की बेकार की बातें करते नजर आएंगे और इसके अलावा आपके द्वारा किसी तरह की कोई उल्लेखनीय गतिविधियां या कार्य करने के लिये नहीं होगी और इस तरह की ब्याज-भाड़े से कमाई के रुपयों से समाज मे उत्पन्न आलसी सभ्यता एवं संस्कार पैदा होने के बाद समाज मे फैल कर उन्नति के सोपान चढ़ कर तीन-चार और निकम्मी प्रजातियों को पैदा करेगी जिनमे दलाल, सप्लायर ठेकेदार एवं घूसखोर लोगों का दल जो इसका माल उसे देकर, दलाली खाएंगे या इस काम के बदले इतने रुपये पड़ेंगे ऐसे में एक आलसी व्यक्ति स्वमं जाकर सामान खरीदने के बजाये किसी सप्लायर से कहेंगा तू मुझे माल ला कर दे और वह उससे कमीशन खाने और दूसरे ने रिश्वत खाने जैसे कार्यों में लिप्त हो रुपये कमा कर बैंक खाते भरेंगे।
जैसा सामाजिक परिवेश वैसा व्यक्तित्व:
लोग इस राष्ट्रव्यापी आलसी संस्कृति के हमारे समाज मे पैदा होने का दोषारोपण केवल कृषि क्षेत्र के व्यवसाय को देते हैं जिसमे केवल बीज बोने के बाद सिवाय फसल का इंतजार करने के और कुछ कार्य नही रह जाता सिवाय इसके कि जब तक फसल पक कर तैयार न हो जाये। वहीं देश के किसानों के पास बीज खरीदने या साल-भर सपरिवार जी लेने के अतिरिक्त इतनी बड़ी पूंजी इकठ्ठा नहीं हो पती कि वह कोई उद्योग-धंधा लगा सके। बहुत पुरजोर प्रयास करने के बाद यदि संम्भव हुआ तो खाट-खटिया बुनेगा या रस्सी वटेगा इससे कुछ और अधिक वोह नही करना चाहे भी तो नही कर सकता है।
अब दूसरी तरफ शहर के या अन्य तरह से कमाई के रुपयों को इकठ्ठा कर लोग उस पूंजी से मशीन खरीदने के बाद उसे स्वयं न चलाना तो दूर, देखभाल से भी कतराकर अन्तोगत्वा उसे किराए पर उठाने की सोचते हैं। अब यहाँ पर सवाल ऐसे लोगों का है जो समाज मे अप्रत्याशित तौर तरीकों से धन की कमाई करने लगते है ऐसे ही लोग समाज मे आलसी नेतृत्व एवं अन्य लोगों को भी इसी संस्कृति को अपनाने के लिए प्रेरित करते है और एक समय आते-आते ऐसे लोगों से सम्पूर्ण समाज पट जाता है और ऐसे ही इन आलसी कर्मो को बढ़ाने की इस नीति को प्रसार करने वाले हाय-हाय हम क्या करे अरे हम से बाद में आजाद हुआ देश और हमसे छोटा कम संसाधनों वाला देश आज अपने प्रगति के चरम बिंदु पर खड़ा है ऐसी बातों करते मिलेंगे।






