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    अपने भीतर की अच्छाई को जिंदा रखिए

    By November 5, 2019Updated:November 5, 2019 Featured No Comments6 Mins Read
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    तुम्हारे अंदर के भाव ही तुम्हारी दशा और दिशा करते हैं तय 

    कहते हैं कि हर व्यक्ति सफल एवं सार्थक जीवन की आकांक्षा रखता है। भौतिक जीवन जीते हुए भी हर व्यक्ति आंतरिक विकास के लिए जागरूक रह सकता है, अपने भीतर की अच्छाई को जिंदा रख सकता है, अच्छा इंसान बनने की यात्रा निरंतर जारी रख सकता है, इसी से जीवन को सार्थकता मिलती है। और यही है अंधकार से प्रकाश का रास्ता। यही है माटी के मंदिर में परमात्मा की प्राण-प्रतिष्ठा का उपक्रम। पर यह सब मनुष्य की सकारात्मक सोच पर निर्भर करता है कि उसे माटी या मोम जैसा बनना है या फिर वज्र संकल्प और फौलादी व्यक्तित्व वाला। असल में व्यक्ति ही सोच ही उसका व्यक्तित्व बनाती है। डिजरायली ने बहुत गूढ़ बात कही है-‘‘दोस्त यदि तुम अपना स्वास्थ्य खराब करना चाहते हो तो नशे पर पैसा खर्च मत करो, केवल अपने को गुस्से से भरे रखो, गुस्सा तुम्हारे रक्त में इतना विकार पैदा कर देगा कि वह जहरीला हो जाएगा।’’

    वास्तव में कोप, दुर्भाव, ईष्र्या, प्रतिशोध की भावना-ये व्यक्ति के विवेक को टेढ़ा कर देते हैं। शत्रुता का भाव और विचार अपने आसपास अनेक शत्रु खड़े कर देता है। इसके विपरीत मित्रता का भाव और विचार आपके चारों ओर मित्रों की जमात खड़ी कर देता है। जीवन में अच्छे और सकारात्मक विचारों से अनेक जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान संभव है और इसीलिये हैनरी वार्ड बीचर ने विचार के महत्व को व्यक्त करते हुए कहा है कि विचारों को मूर्त रूप देने की क्षमता ही सफलता का रहस्य है।

    प्राणशक्ति को प्रखर बनाने के लिए निषेधात्मक भावों और विचारों से बचें। इससे जीवनी शक्ति क्षीण होती है। निषेधात्मक भाव जहर से भी अधिक हानिकारक है। वे मजबूत शरीर को भी तोड़ देते हैं। नकारात्मक चिंतन तनाव उत्पन्न करता है। इससे अम्ल की मात्रा अधिक उत्पन्न होने से उत्तेजना बढ़ती है। इससे जीवनी शक्ति, प्राणशक्ति को क्षति पहुंचती है। क्रोध प्राणनाशक शत्रु है। उसे अनेक मुखों वाला नाग या तेज धार वाली तलवार से उपमित किया जाता है। यह तप, संयम, दान आदि के फल को भी नष्ट कर देता है।

    ईष्र्या की वृत्ति भी बहुत कष्टकर होती है। किसी के घर फूल भी खिलता है तो पड़ोसी को जुकाम हो जाता है। यह असहिष्णु वृत्ति है। नौकरानी अच्छी साड़ी पहनकर आ जाए तो मालकिन जल-भुन उठती है, भले ही स्वयं के पास एक से बढ़कर एक कीमती सौ साडि़यां पड़ी हैं। पड़ोसी के घर का रंगीन टीवी सिरदर्द बन जाता है, चाहे स्वयं के पास दो-दो टीवी सेट और मिनी थियेटर ही क्यों न हो।

    जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने एक बार कहा था कि आप प्रसन्न है या नहीं यह सोचने के लिए फुरसत होना ही दुखी होने का रहस्य है, और इसका उपाय है व्यवसाय।’ एक प्रौढ़ महिला का पति क्लास इन्कम टैक्स अधिकारी है। आमदनी बढि़या है। बहू-बेटे बाहर रहते हैं। घर का काम नौकर-चाकर संभालते हैं। किसी प्रकार की तकलीफ नहीं, चिंता का कोई कारण नहीं, फिर भी सदा बीमार रहती हैं, निरंतर डाॅक्टरों का चक्कर। कारण नेगेटिव विचार। विचारों से उत्पन्न रोगों की चिकित्सा सामान्यतः कोई डाॅक्टर नहीं कर सकता। ये निषेधात्मक विचार न केवल शरीर को रुग्ण बनाते हैं अपितु जीवनी शक्ति को भी क्षीण करते हैं। भीतर में बिलौना चलता है तो छींटे आसपास उछलते ही हैं। तनाव, चिंता, गुस्सा, चिड़चिड़ापन-इनसे शरीर की 185 मांसपेशियां एक साथ प्रभावित होती हैं। इससे बचने के लिए सकारात्मक सोच की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। महान् वैज्ञानिक आइंस्टीन का कहा हुआ प्रासंगिक है कि सफल मनुष्य बनने के प्रयास से बेहतर है गुणी मनुष्य बनने का प्रयास।

    सबसे पहले शरीर यानी खुद को समझें। तैजस शरीर से परे एक सूक्ष्मतम शरीर और है। जैन सिद्धांत के अनुसार उसे कर्म शरीर कहते हैं। यह जन्म-जन्मांतरों से संचित शुभाशुभ कर्म पुद्गलों से निर्मित है। योग शास्त्र के अनुसार इसे कारण शरीर भी कहते हैं। यह जीन, क्रोमोसोम व गुण सूत्रों से भी अधिक सूक्ष्म है। अपरिमित संस्कारों का संवाहक होने के कारण यह संस्कार शरीर के रूप में भी पहचाना जाता है। यह भावनाओं, संवेदनाओं, वृत्तियों व अभिवृत्तियों का क्षेत्र है। यह जितना पवित्र, पारदर्शी और विरल होता है, व्यक्ति उतना ही अधिक आस्थावान, संवेदनशील, धर्मपरायण और संयमरत बनता है। इसी के आधार पर जागतिक विराट् सत्ता या परम तत्त्व के साथ उसके संबंध जुड़ते हैं। ज्ञान-विज्ञान व अनुभवों के आदान-प्रदान के द्वार खुलते हैं।

    ध्यान, धारणा, संयम, तप इत्यादि के द्वारा संचित संस्कारों का जब परिष्कार होता है, आत्मा परमात्मा को समर्पित होकर एकाकार बन जाती है। संस्कार शरीर में ही भावनाएं, मान्यताएं, आस्थाएं, आकांक्षाएं उगती हैं, पुष्ट होती हैं। इन्हें यदि करुणा, सेवा, सहकारिता आदि से भरा-पूरा रखा जाए तो मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व को उभारा जा सकता है। चर्चिल ने जीवन का सार प्रस्तुत करते हुए कहा था कि निराशावादी हर अवसर में कठिनाई देखता हैं, जबकि आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता हैं।

    प्रत्येक व्यक्ति की कोशिश रहती है कि वह आकर्षक और प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी बने। इसके लिए मात्र सुगठित शरीर या सुंदर चेहरा ही पर्याप्त नहीं है। वह आकर्षक बनता है ऊंचे चरित्र से, सुंदर भावों से और स्वस्थ विचारों से। व्यक्तित्व निर्माण में विचारों की भूमिका प्रमुख रहती है। विचार हमारे तीनों शरीरों को प्रभावित करते हैं। परामनोविज्ञान का निष्कर्ष है-सोचना मात्र ब्रेन का ही काम नहीं है। हमारा पूरा शरीर सोचता है, पूरा शरीर उन-उन विचारों से प्रभावित होता है। अस्वस्थ विचार मस्तिष्क में व्याधि की प्रतिमा निर्मित करते हैं। वह चित्र क्रमशः अस्थि, स्नायु, श्वसन, रक्त संचार प्रणाली और पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। अरस्तू का कथन है कि अच्छी शुरुआत से आधा काम हो जाता है।

    बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कितनी वजनवाली बात कही है कि हँसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना ही लाभकर है जितना कि स्वस्थ ऋतु। हम प्रसन्न होते हैं तो हमारी सारी नस-नाडि़यां खिल उठती हैं। हम उदास होते हैं तो पूरा स्नायु तंत्र उदास-शिथिल हो जाता है। हमारी भावनाएं स्वस्थ-प्रसन्न रहें। मन उल्लास-उत्साह से भरा रहे। इससे चेहरा तेजस्वी बनता है, आंखों में चमक आती है। इसके विपरीत चिंताओं में डूबे, हीन भावनाओं से घिरे, हताश-निराश व्यक्ति का चेहरा बुझा-बुझा, कांतिहीन प्रतीत होता है। झुका हुआ सिर, धंसी हुई आंखें, मरियल-सी चाल एक सुंदर चेहरे को भी दयनीय बना देती है।

    सकारात्मक सोच और पवित्र अंतःकरण वाला व्यक्ति चेहरे से सुंदर न भी हो उसके व्यक्तित्व की गरिमा, आभा और प्रभावोत्पादकता दूसरी ही होती है। अतः यदि अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठता प्रदान करना है तो स्थूल शरीर से प्रारंभ कर सूक्ष्म और सूक्ष्मतम शरीर को शुद्ध करें, सिद्ध करें। चैतन्य के साथ संपर्क होगा। राग-द्वेष क्षीण होंगे। ज्ञाता-द्रष्टा भाव जागेगा। आंतरिक अर्हताएं प्रकट होंगी। यही है अस्तित्व बोध से समग्र व्यक्तित्व विकास की महायात्रा। यही है स्वयं के सम्यक् निर्माण की प्रक्रिया। डिजरायली का कथन बिल्कुल सही है-तुम्हारे अंदर के भाव ही तुम्हारी दशा और दिशा तय करते हैं।

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