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    मातृत्व: सृष्टि का शाश्वत सत्य और ईश्वर का प्रतिरूप

    ShagunBy ShagunMay 2, 2026 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    जो लोग ईश्वर को पत्थरों या किताबी ज्ञान में खोजते हैं, वे मां की आंखों में झांककर देखें तो उन्हें ब्रह्मांड की सबसे पवित्र और निस्वार्थ ज्योति के दर्शन होंगे

    rahul guptaराहुल कुमार गुप्ता

    जबलपुर में नर्मदा की लहरों के बीच 30 अप्रैल को क्रूज हादसे में घटित हृदयविदारक घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दु:खद हादसे के कारणों और जिम्मेदारों की लापरवाही की चर्चा के बीच एक अत्यंत मार्मिक दृश्य भी देखने को मिला, जिसने पाषाण हृदयों को भी नम कर दिया है। यह मार्मिक दृश्य मां की महानता और उसकी ममता का है।

    ‘मां’ शब्द उस आदिम और अनंत परिभाषा का जीवंत साक्ष्य है, जिसे समझने में संसार के समस्त दर्शन और विज्ञान आज भी नतमस्तक हैं। जब काल अपनी विभीषिका के साथ सामने खड़ा था और मौत की लहरें सब कुछ निगलने को आतुर थीं, तब एक मां का अपने बच्चे को सीने से अंतिम सांस तक चिपकाए रखना यह प्रमाणित करता है कि मातृत्व केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, अपितु इस ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली, अभेद्य और निस्वार्थ ऊर्जा है। वह आलिंगन केवल मांस और अस्थियों का मिलन नहीं था, बल्कि नियति के विरुद्ध प्रेम का एक ऐसा महायुद्ध था, जिसमें एक मां ने अपनी देह को ढाल बनाकर यमराज को यह संदेश दिया कि उसकी संतान तक पहुँचने का मार्ग उसकी लाश से होकर गुजरता है। यह दृश्य उस शाश्वत सत्य की पुष्टि करता है कि मां ही इस सृष्टि का आधार है और संसार के हर जीव-जंतु में ममता, दया और करुणा की एक ही प्रकृति समाहित है।

    हर प्राणी में मां और बच्चे का यह संबंध प्रकृति की सबसे जटिल और परिष्कृत इंजीनियरिंग है। जिसे हम ममता कहते हैं, वह न्यूरोलॉजी की भाषा में ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन जैसे हार्मोन्स का वह चरम प्रवाह है, जो मां के भीतर एक ऐसी सुरक्षात्मक आक्रामकता पैदा करता है कि वह अपनी संतान के लिए किसी भी शिकारी या प्राकृतिक आपदा से भिड़ जाने का अलौकिक साहस जुटा लेती है। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान बच्चे की कुछ कोशिकाएं मां के रक्तप्रवाह के जरिए उसके हृदय और मस्तिष्क में सदा के लिए बस जाती हैं, जिसे फेटोमैटर्नल माइक्रोकाइमेरिज्म कहा जाता है। अतः तकनीकी रूप से एक मां मरते दम तक अपनी संतान के अंश को अपने अस्तित्व में ढोती है। इसलिए जब बच्चा खतरे में होता है, तो मां का मस्तिष्क उसे स्वयं से अलग नहीं मानता, बल्कि अपनी ही आत्मा के उस दूसरे हिस्से को बचाने के लिए आत्म-संरक्षण के मूल सिद्धांत को भी त्याग देता है। तर्क यह कहता है कि जीवन की मूल वृत्ति खुद को बचाना है, किंतु मातृत्व इस तर्क को ध्वस्त कर देता है, क्योंकि यहाँ स्व का अर्थ स्वयं की देह नहीं, बल्कि संतान की सांसें हो जाती हैं।

    आध्यात्मिक क्षितिज पर मातृत्व को ईश्वर से भी उच्च सोपान पर प्रतिष्ठित किया गया है। संसार के तमाम धर्मों में मां को उस निराकार ईश्वर का एकमात्र साकार और दृश्य रूप माना गया है। सनातन संस्कृति में जहाँ मां को जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी कहकर स्वर्ग से श्रेष्ठ बताया गया है, वहीं इस्लाम में जन्नत को मां के कदमों के नीचे स्थान दिया गया है। ईसाई धर्म में मदर मैरी का त्याग और करुणा वैश्विक चेतना का हिस्सा है।

    यह सामंजस्य सिद्ध करता है कि ईश्वर ने हर प्राणी के संरक्षण के लिए अपना प्रतिनिधि मां के रूप में भेजा है। जो लोग ईश्वर को पत्थरों या किताबी ज्ञान में खोजते हैं, वे उस मां की आंखों में झांककर देखें तो उन्हें ब्रह्मांड की सबसे पवित्र और निस्वार्थ ज्योति के दर्शन होंगे। और ऐसा दर्शन प्रकृति में हर क्षण किया जा सकता है, हर जीव जंतु में मां के रूप में उनकी ममता को लेकर। जबलपुर की क्रूज हादसे की घटना में एक मां ने पुनः अपनी ममता से यह सिद्ध कर दिया कि करुणा और दया कोई सीखी जाने वाली भावनाएं नहीं हैं, बल्कि यह वह दैवीय गुण है जो मानव, पशु, पक्षी और यहाँ तक कि सूक्ष्म कीटों में भी समान रूप से विद्यमान है।

    प्रकृति के कण-कण में इस निस्वार्थ प्रेम के साक्ष्य बिखरे पड़े हैं। एक छोटी सी चिड़िया जब अपने अंडों की रक्षा के लिए बाज़ या सर्प से टकरा जाती है, या एक शेरनी जब अपने शावकों के लिए स्वयं भूखी रहकर शिकार की रक्षा करती है, तब वहां केवल जैविक प्रेरणा नहीं, बल्कि वही करुणा प्रवाहित होती है जो क्रूज हादसे की शिकार उस मां के भीतर उफन रही थी। मातृत्व का यह भाव शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है। वह दृश्य जिसमें मां ने नर्मदा की बीच धारा में बच्चे को बाहों में जकड़े रखा, वह वास्तव में काल के कपाल पर लिखा गया एक ऐसा काव्य है जिसे जल्द विस्मृत नहीं किया जा सकता। उसने शायद यमदूतों से यह मूक संवाद किया होगा कि यदि विधाता को एक प्राण चाहिए, तो वह उसे ले ले, पर उसकी रचना के इस अंकुर को सुरक्षित छोड़ दे।

    https://x.com/i/status/2050266467070091538

    यह मर्मस्पर्शी प्रसंग आज के भौतिकवादी समाज के लिए एक गंभीर चेतना का आह्वान है। जहाँ स्वार्थ और संवेदनहीनता अपने चरम पर है, वहाँ एक मां का यह आत्मोसर्ग हमें याद दिलाता है कि संसार अभी भी केवल प्रेम और त्याग की धुरी पर टिका है। मां ही वह सेतु है जो मनुष्य को ईश्वत्व से जोड़ती है। वह सृजन की वह शक्ति है जो खुद को मिटाकर भी परंपरा को जीवित रखती है। नर्मदा की उन लहरों ने भले ही दो शरीरों को जुदा कर दिया हो, लेकिन मां की वह ममता उन लहरों से भी ऊंची उठकर अमर हो गई। इस चराचर जगत में मां की ममता ही वह परम प्रकाश है जिसे साक्षात् ईश्वर भी नमन करता है। वह दृश्य सदैव हमारे मानस पटल पर एक स्थाई और हृदयग्राही छाप छोड़ेगा कि मां का प्रेम ही वह एकमात्र सत्य है जो मृत्यु को भी पराजित करने का सामर्थ्य रखता है।

    मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण ब्रह्मांड है। वह सृष्टि की वह प्रथम गुरु है जो बिना बोले ही त्याग का पाठ पढ़ा देती है। मां की ममता से संबंधित प्रकृति के वो सभी दृश्य या हाल ही में जबलपुर का वह दृश्य हमें केवल रुलाता नहीं है, बल्कि वह हमें यह गौरव भी दिलाता है कि हम उस संस्कृति और उस जीव-जगत का हिस्सा हैं जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा मृत्यु को भी अर्थ प्रदान कर देती है। ईश्वर को किसी ने देखा हो या न देखा हो, लेकिन उस मां के रूप में ईश्वर की उपस्थिति उस दिन नर्मदा की धारा में स्पष्ट रूप से दिखाई दी होगी। वह मां, जो अपनी आखिरी सांस तक अपने बच्चे की ढाल बनी रही, उसने यह साबित कर दिया कि संसार में सब कुछ नश्वर हो सकता है, सब कुछ बदल सकता है, लेकिन मां की करुणा, उसकी ममता और उसका संरक्षण भाव ही वह शाश्वत सत्य है जो कल भी था, आज भी है और सृष्टि के अंत तक अटल रहेगा।

    Shagun

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