जीवन की दौड़ में हर कोई इच्छाओं के चक्रव्यूह में घिरा नजर आता है। साधारण व्यक्ति धन चाहता है, धनी पद-प्रतिष्ठा! सुकन्याएं रूप-सौंदर्य की चाह रखती हैं, तपस्वी स्वर्ग की इच्छा रखता है और ज्ञानी मोक्ष की! यह अनमोल जीवन कब-कैसे इच्छाओं की गति के साथ दौड़ते-दौड़ते बीत जाता है, इसका हमें पता ही नहीं चल पाता। चाहतों की मृगतृष्णा ही कुछ ऐसी है कि यह प्यास कभी खत्म नहीं होती। कुछ और होने, और पाने की तीव्र इच्छा हमें सदा उस दुष्चक्र में डाले रखती है जिसमें डूबे रहकर हम जीवन की खुशियों को यूं ही गंवा देते हैं।
इच्छाओं का पात्र कभी नहीं भरता। जीवन में हमें जो प्राप्त हो चुका है, उसकी हम अवहेलना कर देते हैं। जिस चीज की तीव्र इच्छा हमें पहले सताए रहती है, उसके मिलने पर हम उसका सुख अनुभव नहीं कर पाते और नई इच्छा हमारे भीतर बलवती हो उठती है। इसे भी पा लें, तो फिर कोई तीसरी इच्छा सिर उठा लेती है, और यह क्रम जिंदगी भर चलता रहता है। हम चाहतों के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाते। बस, उन्हीं में कैद हो, असंतुष्ट-अतृप्त, दरिद्र और अपूर्ण बने रहकर, यह सुंदर जीवन लुटा देते हैं।
कोई इच्छा सामाजिक हित से प्रेरित हो तो उसे सच होता देख मन सच्चे सुख का अनुभव करता है। पर जब इच्छाएं व्यक्तिगत स्वार्थ से जुड़ी होती हैं तो उनकी परिधि का विस्तार होता जाता है। यूं भी विषय-भोग की इच्छा विषयों का उपभोग करने से कभी शांत नहीं हो सकती। वह तो जैसे घी की आहुति डालने से तेज हुई आग के समान बढ़ती ही जाती है। इच्छाएं ही हमें पाप के रास्ते पर ले जाती हैं। इच्छाओं से ही दुःख के बीज पनपते हैं। अविवेक, अविश्वास, अशांति, असंतोष, ईर्ष्या, द्वेष, द्वंद्व, हिंसा, असत्य और अहंकार की जड़ें अतृप्त इच्छाओं से गहराई तक जुड़ी हुई हैं।







