डॉ दिलीप अग्निहोत्री
साहित्य का प्रादुर्भाव सर्वप्रथम भारत भूमि पर हुआ था। विश्व के अधिकांश इलाको में जब मानव सभ्यता का प्रारंभिक विकास नहीं हुआ था, उस समय हमारे ऋषियों ने वेद जैसे उत्कृष्ट साहित्य की रचना कर दी थी। हजारों वर्ष बाद भी ऐसी अनेक साहित्यिक रचनाएं प्रतिष्ठित है। साहित्य साधना का यह प्रवाह भारत में सदैव कायम रहा। विदेशी आक्रांताओं ने इसको नष्ट करने के प्रयास किये। लेकिन वह इसे समाप्त नहीं कर सके। संस्कृत जननी के रूप में प्रतिष्ठित रही,अनेक भाषा बोलियों का जन्म हुआ। इन सभी में उत्कृष्ट साहित्य की रचना होती रही। हिंदी साहित्य ने भारत ही नहीं विश्व स्तर पर अपनी जगह बनाई।वही साहित्य अमर हुआ जिसमें लोककल्याण का भाव से समाहित था। हमारे ऋषियों ने वैदिक काल से ही साहित्य का लोकरंजन लक्ष्य निर्धारित किया। उसी भावभूमि पर साहित्य साधना चलती रही। यह विचार आज भी कायम है।
लोकहित का संवर्धन न करने वाले साहित्य को हमारे यह प्रतिष्ठा नहीं मिली। मतभिन्नता और असहमति को महत्व दिया गया। वैदिक ऋषियों ने भी कहा कि उनकी दृष्टि जहाँ तक पहुंची, उसका उल्लेख उन्होंने कहा। लेकिन यह अंतिम ज्ञान नहीं है। ज्ञान,शोध की जिज्ञाषा सदैव बनी रहनी चाहिए। लेकिन यह सब सकारात्मक होना चाहिए। नकारात्मक चिंतन से समाज का नुकसान होता है। इसी प्रकार के विचार लखनऊ हिंदी संस्थान द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में व्यक्त किये गए। इसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधानसभा अध्य्क्ष हृदय नारायण दीक्षित ने उल्लेखनीय योगदान करने वाले साहित्यकारों को सम्मानित किया। कार्यकारी अध्यक्ष डॉ सदानन्द गुप्ता ने समारोह का संयोजन किया।
योगी आदित्यनाथ ने भी सकारात्मक साहित्य को समाज के लिए अपरिहार्य बताया। योगी आदित्यनाथ ने ठीक कहा कि हिंदी सेवा किसी सम्मान की मोहताज नहीं होती। लेकिन ऐसे लोगो को सम्मानित करके संस्थान स्वयं गौरवांवित होते है।

जिस प्रकार की साहित्यधर्मिता होती है, वैसी ही समाज को दिशा मिलती है। वैचारिक रूप से यह यह चुनौतीपूर्ण समय है। राष्ट्रहित के प्रतिकूल विचार भी दिखाई दे रहे है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिंदी को प्रतिष्ठित किया। वह संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी गुंजाने वाले पहले भारतीय नेता थे। विदेश मंत्री के रूप में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा को हिंदी में सम्बोधित किया था। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विदेशों में हिंदी की प्रतिष्ठा बढाने का कार्य कर रहे है। वह विश्व मंचों पर हिंदी का ही प्रयोग करते है। साहित्य समाज का दर्पण है। दर्पण साफ सुथरा होना चाहिए। इसका मतलब है कि साहित्य भी साफ स्वस्थ होना चाहिए। इसकी पहचान सरल है।
समाज के अनुकूल साहित्य ही स्वस्थ व स्वच्छ होता है। साहित्य में लोक कल्याण का भाव होना चाहिए। इससे समाज को नई दिशा मिलती है। लेखनी खेमों या जाति,वर्ग, क्षेत्र की सीमा में बंधी न रहे। ऐसे लेखन से समाज भ्रमित होता है। समाज केवल सरकार द्वारा संचालित नहीं होता। बल्कि इसमें साहित्य की भी भूमिका होती है। वह समाज को सार्थक दिशा देता है। लेकिन साहित्य में भी कुछ स्वार्थी तत्व होते है। ऐसे लोग खासतौर पर युवकों को गलत दिशा देते है। ऐसे में राष्ट्रवादी साहित्यकारों की भूमिका बढ़ जाती है। उन्हें ऐसे अप्रचार का भी मुकाबला करना होगा। अच्छी सामग्री भी उन्हीं को देना है। हिंदी राष्ट्रीय एकता की संवाहक बन सकती है।
इस समारोह से यह तथ्य प्रमाणित भी हुआ। इसमें देश के सभी क्षेत्र के लोग ही नहीं मॉरीशस से भी लोग आए है। योगी ने साहित्य व समाज की सामयिक समस्याओं को भी उठाया। कहा कि कुछ लेखकों ने साहित्य को विभाजित करने का प्रयास किया है। ऐसे लेखक युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे लेखन से बचने की आवश्यकता है। जहां भी लेखनी को बांधने का प्रयास होता है, वहां समाज भ्रमित होगा। साहित्यकारों के लिए यह बड़ी चुनौती है। क्योंकि बीच-बीच में कुछ लोग साहित्य के साथ खिलवाड़ कर समाज को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। विदेशों में भी लोगों ने हिंदी साहित्य के लिए काम किया है। योगी ने विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित की साहित्य साधना का भी उल्लेख किया। कहा कि उनकासाहित्य में बड़ा योगदान है।
उन्होंने समाजसेवा राजनीति व साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय समन्वय स्थापित किया है। साहित्य के माध्यम से भी राष्ट्र हो सकती है। इसके बहुत उदाहरण अपने देश में है।
विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित स्वयं करीब तीन दर्जन पुस्तकों के लेखक है। वैदिक साहित्य के विशेषज्ञ है। उन्होंने उस महान विरासत का उल्लेख किया। कहा कि हमारी प्रेरणा का स्रोत यूरोप नहीं हो सकता,भारतीय संस्कृति की गौरवशाली धरोहर ही हमारा ज्ञानवर्धन व मार्ग दर्शन कर सकती है। केवल भारत ही नहीं इसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड व मानवता के कल्याण की कामना है। विश्व में इसी चिंतन के माध्यम से ही शांति की स्थापना ही सकती है। वेद व उपनिषद साहित्य की पराकाष्ठा है। परतंत्रता काल में नवजागरण की शुरुआत साहित्यकारों ने ही कि थी।
उन सभी के लिखने का उद्देश्य राष्ट्रभाव था। उन्होंने इसका प्रसार और संवर्धन किया था। स्वतंत्रता संग्राम में लेखकों साहित्यकारों ने बहुत योगदान दिया।लेकिन स्वतंत्रता के बाद यूरोप से प्रभावित होकर भारतीय मूल्यों की अवहेलना की गई। इसके मुकाबले के लिए राष्ट्रवादी साहित्यकारों ने प्रमाणिक लेखन किया। आज भारतीय विचारों के प्रसार की बहुत आवश्यकता है।समारोह में भारत भारती सम्मान से पटना की डॉ़ उषा किरण, लोहिया साहित्य सम्मान से पटियाला के डॉ मनमोहन सहगल, हिन्दी गौरव सम्मान से वाराणसी के डॉ बद्रीनाथ कपूर, महात्मा गांधी साहित्य सम्मान से भागलपुर के डॉ श्रीभगवान सिंह, पंडित दीनदयाल उपाध्याय साहित्य सम्मान से लखनऊ के ओमप्रकाश पांडेय, अवंतीबाई साहित्य सम्मान से दिल्ली की डॉ. कमल कुमार,राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन सम्मान से मणिपुर हिन्दी परिषद,साहित्य भूषण से बरेली के डॉ भगवान शरण भरद्वाज,कबीर सम्मान डॉ ओम प्रकाश दुबे को समानित किया गया। हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ सदानन्द गुप्ता ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया।






