विक्टर नारायण विद्यांत के पूर्वजो को सम्मान के रूप में विद्यांत उपाधि मिली थी। इसका अर्थ है ज्ञान या विद्या की अंत तक प्राप्ति। विक्टर नारायण जी पर यह विचार पूरी तरह लागू था। यह उनके अंतिम वाक्य से उजागर होती है। उन्होंने अंतिम समय में प्रभु से कामना की कि तुम मुझे मनुष्य रूप में पुनर्जन्म दो या नहीं, लेकिन मैं शिक्षा के इसी प्रांगण में मिलूंगा। यह विचार चार विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे प्रो भूमित्र देव ने विद्यांत कालेज में आयोजित संस्थापक दिवस समारोह में व्यक्त किये। आज कल आजादी की मांग का फैशन है। लेकिन वस्तुतः आज अज्ञान से ही आजादी की आवश्यकता है। सर्वप्रथम स्वयं का ही सर्वोत्तम विकास करना चाहिए। इसके अभाव से हो तनाव होता है। इसे बच्चों से लेकर बड़ों तक इसको समझने की आवश्यकता है। स्ट्रेस शब्द का प्रयोग प्रायोग सबसे पहले उन्नीस सौ छत्तीस में हुआ था। गीता में भगवान समाधान बताते है। इसके लिए प्राणवायु का संतुलन अपरिहार्य है। श्वांस पर ध्यान कर ले तो तनाव मुक्ति मिलती है। आधुनिक शोध विद्यर्थियो तक पहुंचना चाहिए। गम्भीर बोलना आसान है सरल बोलना कठिन है।
आइंस्टाइन कहता है कि जो विद्वान आसान शब्दो मे कठिन बात नहीं कर सकता, वह विषय का विद्वान नहीं होता। विद्यार्थी के स्तर के अनुरूप अध्यापन होना चाहिए।
तुम आसमा से जमी पर उतरो तो
मुझे तो जमी के मसायल समझने है।
इन लाइनों में बच्चों की ही भावना है। शिक्षकों को यह समझना चाहिए। शिक्षक को ऐसे पढ़ाना चाहिए जिसे विद्यार्थी समझ सकें। असतो मा सद्गमय का भाव समझना होगा। पढ़ने से अधिक समझने पर जोर होना चाहिए।
बादल हो तो बरसो
किसी बेआब जमी पर।
खुशबू हो तुम अगर तो
बिखर क्यो नहीं जाते।।
यह ज्ञान के प्रसार का भाव है। बादल बिना भेदभाव के बरसते है। खुशुब भी फैलती रहती है। अपनी कमजोरियों को समझना चाहिए। उन्हें दूर करने का प्रयास होना चाहिए।

ये गुनाह ताउम्र मैं करता रहा
धूल चेहरे पर थी आईना साफ करता रहा।
मतलब आत्मचिन्तन की सदैव आवश्यकता रहती है। व्यक्तित्व के विकास हेतु भी जगरुक्त रहना चाहिए। कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है। यह समझ हो तो सब बात सुनी जाती है। आज कल कम्प्यूटर का युग है।इसको ज्ञान के प्रसार का ही माध्यम बनाना चाहिए। आधुनिकतम ज्ञान व अविष्कार आमजन तक पहुंचने की आवश्यकता। आधुनिक तकनीक का ज्ञान न नुकसान होने से नुकसान होता है। ऐसे लोग दौड़ में पिछड़ जाते है। लेकिन तकनीक के साथ अपने पर भी भरोसा होना चाहिए। भगवान ने सात इंद्रियां अर्थात मशीन दी है।

इन सातों का एक साथ प्रायोग करें तो स्मरण शक्ति और कार्यक्षमता दोनों का विकास होता है। विद्या,ज्ञान, वाणी भेषभूषा और विनय शीलता पर भी ध्यान देना चाहिए। इससे अभूतपूर्व सफलता मिलती है। इसी प्रकार ईमानदारी,मेहनत, सम्प्रेषण क्षमता व सृजनशीलता से उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
आंखों का वीजा नहीं लगता।
सपनो की सरहद नहीं होती
महात्मा गांधी के जीवन से भी प्रेरणा लेनी चाहिए।
महापुरुषों की जयंती वस्तुतः उनसे प्रेरणा ग्रहण करने का अवसर प्रदान करती है। समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित व्यक्ति महान होता है। उनका आचरण,व्यवहार, जीवन शैली प्रेरणादायक होती है। जन्म जयंती पर उनके विचारों का स्मरण होता है। विक्टर नारायण विद्यांत ने समाज के हित में अपनी सम्पूर्ण चल अचल संपत्ति का दान कर दिया था। पांच जनवरी को उनकी जन्म जयंती मनाई जाती है। छह शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक विक्टर नारायण विद्यांत की एक सौ पच्चीसवीं जयंती उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें विद्यांत पर व्याख्यान के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। महाविद्यालय की वार्षिक पत्रिका का लोकार्पण किया गया। उत्कृष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले विद्यर्थियो को सम्मानित किया गया।
वर्तमान समय में वैश्विक सभ्यता का संकट एक बड़ी चुनौती है। आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों का सृजनात्मक उपयोग सुनिश्चित होना चाहिए। इसके नकारात्मक प्रयोग ने अनेक जटिल समस्याओं को जन्म दिया है। इसमें प्राकृतिक,सामाजिक,शैक्षणिक,आर्थिक विसंगतियां शामिल है। इनका समाधान गांधीवादी चिन्तन से हो सकता है। विक्टर नारायण विद्यांत इसी चिंतन के संवाहक थे। उनकी जीवन शैली भी इसी के अनुरूप थी।
विशिष्ट अतिथि प्रो ए के शर्मा ने कहा कि विद्यर्थियो को विद्यांत जी जैसे महापुरूषों से प्रेरणा लेनी चाहिए। अध्यक्षता डॉ गोपाल चक्रवर्ती ने की। उन्होंने कहा कि विद्यांत जी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। प्रबंधक शिवाशीष घोष ने कहा कि विद्यांत जी राष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविद होने के साथ ही,उच्च स्तरीय संगीतिज्ञ थे।
प्राचार्या प्रो धर्म कौर ने प्रगति आख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय में अनुशासन,पठन पाठन, स्पोर्ट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। समय समय पर यहां राष्ट्रीय,प्रादेशिक स्तर की सेमिनार आयोजित की जाती है। समारोह के संयोजक उप प्राचार्य डॉ राकेश कुमार मिश्र थे। स्वागत भाषण डॉ राजीव शुक्ला ने किया।
समारोह में कॉलेज की वार्षिक पत्रिका साक्षी का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर होनहार विद्यर्थियो को विद्यांत गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। इसके अलावा डी एस बोस,राम दुलारी, सरोजनी श्रीवास्तव कैलाश नाथ, श्रीवास्तव,केसी सरकार,शक्ति ज्योत्स्ना गोल्ड मेडल से भी नवाजा गया।
- प्रस्तुति: डॉ दिलीप अग्निहोत्री






