
भारत में मेला महोत्सव की परंपरा प्राचीन काल से रही है। इनके पीछे सामाजिक चेतना व समरसता का भाव समाहित रहा है। इसमें लोकसंस्कृति जीवंत होती है, स्वस्थ मनोरंजन होता है, समाज के प्रति दायित्व बोध का जागरण होता है, अपनी जमीन से जुड़ने की प्रेरणा मिलती है। मनोरंजन के आधुनिक रूप के बाद भी महोत्सव के प्रति आज भी लगाव रहता है। गोरखपुर महोत्सव में भी यही दृश्य दिखाई दिया। यहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किये।

उन्होंने कहा कि महोत्सव हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग है। इनसेपारस्परिक सौहार्द एवं सामाजिक समरसता सुदृढ़ होती है। ऐसे आयोजनों से लोक कलाओं एवं संस्कृति को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने मंथन व महोत्सव की स्मारिका का विमोचन किया। गोरखपुर महोत्सव के माध्यम से जनमानस को जनपद के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के साथ ही विकास सम्बन्धी गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध होती है। लोककला की अभिव्यक्ति होती है। लोककलाकारों को प्रोत्साहन मिलता है।
- डॉ दिलीप अग्निहोत्री







