19 दिसंबर के दंगों से लेकर घंटाघर पर औरतों के जमावड़े की अनसुनी कहानी सुनिए –
नवेद शिकोह
मैं पुराने लखनऊ के हुसैनाबाद स्थित घंटाघर हूं। हमसे ज्यादा वक्त का अंदाजा किसी को नहीं ! आसमान छूता मेरा ऊंचा क़द वो चीज़े देख रहा है जो आप नहीं देख सकते। मै देख रहा हूं कि गंदी सियासत की चालें चंद नासमझ लोगों का वक्त खराब कर रही हैं। नज़ाकत-नफासत, तहज़ीब और तमद्दुन के इस खूबसूरत शहर को बदसूरत बनाने पर तुली हैं। पर्दे के पीछे लिखी स्क्रिप्ट मेहनतकश शहरियों की तरक्क़ी की राहें रोकना चाहती है। साम्प्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी तहज़ीब वाले इस शहर के अमन-ओ-अमान को चुनौती देने के लिए साजिशे रची जा रही हैं। CAA ..NRC पर झूठ और अफवाहों के साथ एक ख़ास समुदाय के भोले भाले लोगों को भड़काकर आम लोगों की ज़िन्दगी के साथ कानून व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए विपक्षी दल योजनाबद्ध तरीके से काम कर रहे हैं।
वक़्त का गवाह बना मैं घंटाघर घंटा दर घंटा हर साजिश को बहुत ग़ौर से देख रहा हू। 19 दिसम्बर को मैंने पत्थरबाजी देखी। आगजनी करते और बम चलाते दंगाइयों को देखा। मैंने देखा कि एक ख़ास तबके की मेरे आसपास की घनी आबादी कब निकली, क्यों निकली, कहां निकली, किसके कहने पर और किसके भड़काने पर किस तरह से प्रदर्शन के नाम पर लखनऊ जलाया गया। मेरे बगल का रूमी दरवाज़ा जो दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करता है ये भी कुछ सिरफिरों के आतंक का गवाह बना। चौकियां फूकते और पुलिस पर हमले होते सबने देखा।
ख़ैर, इन सब के दौरान ज़ख्म खाकर भी लखनऊ की पुलिस ने विपक्षियों द्वारा प्रायोजित दंगों पर क़ाबू किया। तस्वीरों और तमाम सुबूतों के साथ दंगाई चिंहित हुए।
इन दंगाइयों को मैंने जेल में जाते देखा। सैकड़ों दंगाइयों में चंद दंगाई विपक्ष की स्क्रिप्ट को निर्देशित करने वाले थे। मुख्य भूमिका वाले इन मुख्य दंगाइयों को जेल से जमानत पर रिहा करने के लिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने प्रयास शुरु कर दिये। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लखनऊ की सड़को पर दौड़ती नज़र आईं। अपने कुछ ख़ास और मास्टरमाइंड दंगाइयों के पक्ष में बयान दिये। प्रियंका इनके घरों तक पहुचीं।और फिर उन्होंने मंहगे वकीलों के जरिये अपने इन खास लोगों को ज़मानत पर रिहा करवा दिया। CAA, NRC को लेकर झूठ, अफवाहें फैलाकर नासझ मुस्लिमों को बहकाने/भड़काने वाले विपक्ष के जाल में फंस कर जो आम मुस्लिम नौजवान दंगों के आरोप में जेल मे है उनकी जमानत के लिए प्रियंका वाड्रा ने कोई प्रयास नहीं किए। कुछ खास लोगों को जमानत पर रिहा करवाकर इनके जरिए फिर एक खेल शुरु किया।
जेल से बाहर आये कांग्रेस के इन ख़ास लोगों को उन औरतों को घंटाघर पर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया गया जिनके घर के नौजवान 19 दिसंबर के दंगे के आरोप में काफी दिन से जेल मे हैं। हुसैनाबाद स्थित घंटाघर के आसपास के मुस्लिम इलाकों में रहने वाले सैकड़ों आम और गरीब परिवारों के युवको को अब तक जमानत इसलिए भी नहीं मिली क्योंकि इनके परिजन मंहगे वकीलो के जरिए मोटी रक़म खर्च करके जमानत नहीं दिलवा पा रहे है। काफी दिनों से जेल में कैद दंगाई नौजवानों के परिजन कुंठित और परेशान हैं।
बस इस कुंठा और परेशानी का फायदा उठाकर जमानत पर रिहा कांग्रेस के ख़ास लोगों ने जेल मे बंद नौजवानों के परिवार की औरतों को उकसाया कि यदि वे CAA, NRC, MPR के विरुद्ध अपने घरे के करीब घंटाघर पर धरने पर बैठ जायेंगी तो प्रशासन/सरकार दबाव में आकर उनके घरों के नौजवानों को जेल से रिहा कर देगी। और फिर एक चाल के तहत दस-पंद्रह परिवारों के महिलाओं को घंटाघर में बैठाकर एक आधार तैयार किया गया। और उसके बाद विपक्षी दलों ने अपने कार्यकर्ताओं और कुछ संस्थाओं के लिए धरने को विशाल रुप देना शुरु कर दिया है।
हां मै घंटाघर हूं, शहर के हर घंटे का हिसाब जानता हूं। वक्त की नज़्ब मेरे सीने में दफ्न है। गगन चिमनी सी मेरी घड़ी की सुइयों और मेरे दिल में धड़कते घंटे ने बहुत कुछ देखा भी है और सुना भी है। अफसोस ये कि मुझे ही नहीं पता था कि साजिशों की आग में मेरे पैरों में ही फफोले पड़ जायेंगे। लखनऊ की शान, पहचान और वक्त कहा जाने वाला मैं लखनऊ का घंटाघर बहुत परेशान हूं। गंगा जमुनी तहज़ीब, मोहब्बत, नज़ाकत और नफासत का प्रतीक मेरा क़द आज भी सिर उठाये है, पर मेरी इन खूबियों के दुश्मनों ने इन दिनों मेरे पैरों में बेड़िया डाल दी हैं। नासमझी और साजिश के कॉकटेल के रुप में मेरे क़दमों के नीचे औरतों का जमावड़ा लगा है।







