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    तमिलनाडु में सिनेमा-सियासत की नई लहर, विजय ने लिखी नई इबारत

    ShagunBy ShagunMay 8, 2026 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    The suspense of the vote count has brought about major upsets!
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    तमिलनाडु की जनता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राज्य में सिनेमा और राजनीति की जुगलबंदी अभी खत्म नहीं हुई है। हालिया विधानसभा चुनावों में फिल्म अभिनेता विजय की तमिल वेट्री கழகம் (टीवीके) ने मात्र दो साल के भीतर जो करिश्मा दिखाया है, वह अभूतपूर्व है। 108 सीटों पर विजय हासिल कर टीवीके राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कांग्रेस के समर्थन के साथ अब सरकार बनाने की दूरी महज पांच सीटों की रह गई है और विजय ने राज्यपाल से मुलाकात कर दावा भी पेश कर दिया है। एक और फिल्मी सितारे के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता लगभग तय हो चुका है।

    इतिहास की पुनरावृत्ति या नया अध्याय?

    तमिलनाडु में यह कोई नई घटना नहीं है। एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने 1972 में द्रमुक से अलग होकर एआईएडीएमके बनाई और लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। उनके बाद जयललिता ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। विजयकांत और कमल हासन भी राजनीति में आए, जबकि रजनीकांत ने पार्टी बनाने की घोषणा कर अंतिम समय में पीछे हट गए। अब विजय इस सूची में शामिल होने जा रहे हैं।

    लेकिन इस बार का विकास पहले से अलग है। एमजीआर और जयललिता जब राजनीति में आए तो वे पहले से स्थापित द्रमुक-एआईएडीएमके के अंदर या उनके करीब थे। विजय ने शून्य से शुरुआत की। पार्टी बनाए मात्र दो साल में उन्होंने तमिलनाडु की द्विदलीय व्यवस्था को तोड़ दिया। द्रमुक और एआईएडीएमके दोनों को ही करारी हार मिली है। यह साफ संकेत है कि राज्य के मतदाताओं में द्रविड़ पार्टियों के प्रति मोहभंग हो चुका है।

    मतदाता क्यों बदले?

    लंबे समय से तमिलनाडु में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद और विकास की धीमी गति प्रमुख मुद्दे रहे हैं। युवा मतदाताओं की बड़ी संख्या को पुरानी राजनीति के चक्रव्यूह से बाहर निकलने का रास्ता चाहिए था। विजय ने इसी खालीपन को भरा है। उनकी अपील- साफ-सुथरी छवि, युवा ऊर्जा और “परिवर्तन” का नारा – काम कर गई।

    फिर भी, जीत हासिल करना एक बात है और सत्ता में रहकर उम्मीदों पर खरा उतरना दूसरी। विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती पुरानी राजनीतिक व्यवस्था की जड़ें हैं। भ्रष्टाचार और सरकारी तंत्र में गहरी बैठी लॉबी को हटाना आसान नहीं होगा। साथ ही, उन्हें प्रशासनिक अनुभव की कमी भी पूरी करनी होगी।

    क्या यह द्रविड़ राजनीति का अंत है?

    नहीं। लेकिन यह निश्चित रूप से उसका रूपांतरण है। टीवीके की सफलता ने साबित किया कि तमिलनाडु के लोग अब केवल भावनात्मक और जाति-आधारित राजनीति से आगे निकल चुके हैं। वे अच्छे शासन, पारदर्शिता और आर्थिक प्रगति चाहते हैं। अगर विजय इन उम्मीदों को पूरा करते हैं तो न सिर्फ तमिलनाडु, बल्कि पूरे दक्षिण भारत की राजनीति का स्वरूप बदल सकता है।

    विपक्ष के रूप में द्रमुक और एआईएडीएमके को भी अपनी गलतियों से सबक लेना होगा। अगर वे पुरानी शैली में ही वापसी की कोशिश करेंगे तो उनकी प्रासंगिकता और कम होती जाएगी।

    अंत में, विजय की सफलता लोकतंत्र की जीत है। एक आम नागरिक (हालांकि सुपरस्टार) के रूप में उन्होंने सिस्टम को चुनौती दी और जनता का समर्थन हासिल किया। अब परीक्षा का असली दौर शुरू होता है – सत्ता संभालकर दिखाना। तमिलनाडु की जनता देख रही है कि क्या नया चेहरा पुरानी समस्याओं का हल बन पाएगा या सिनेमा की चकाचौंध सियासत की कड़वी हकीकत में खो जाएगी।

    अब इतिहास गवाह है – तमिलनाडु में सितारे चमकते रहे हैं, लेकिन अच्छा शासन बहुत कम ही दिखा है। उम्मीद है कि इस बार कहानी कुछ अलग होगी।

    Shagun

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