नवेद शिकोह
मोहर्रम के दिनों में ख़ासकर पुराने लखनऊ में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के नाम पर खूब ड्रामेबाज़ी होती है। पिकनिक मनाने की तरह इकट्ठा होकर तरह-तरह के खाने, गाने-बजाने के कार्यक्रम। ये तो मनोरंजन का कार्यक्रम लगता है। गैट टू गेदर जैसा। इसे बेहतरीन एवेंट मैनेजमेंट भी कह सकता हैं।
ये कौन सा ग़म है ! ये कौन सा एतिजाज है !
अज़ादारी की मजलिस-मातम और जुलूसों पर इस तरह का एतराज मुसलमानों के ही कुछ वर्ग ख़ासकर के वहाबी ख़ूब उठाते हैं !
लेकिन अब अज़ादारी पर एतराज़ करने वाले एक विशेष मसलक के मुसलमान अज़ादारी के हर रंग की एहमियत समझ रहे हैं। मोहर्रम की अजादारी की मजलिस-मातम और जुलूसों का केंद्र हुसैनाबाद स्थित घंटाघर में मुसस्लिम आंदोलनकारियों की तादाद अधिक है। उस भीड़ में मुस्लिम समाज के उस मसलक के लोग भी शामिल हैं जो अजादारी की गतिविधियों पर एतराज करते थे, आज घंटाघर पर वैसी ही गतिविधियों मे खुद भी शामिल है।

दरअसल अजादारी एहतिजाज (शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन) ही है। असत्य पर सत्य की विजय के लिए झूठ के खिलाफ सच की आवाज़ है अज़ादारी। अन्याय के खिलाफ खामोश ना रहने की हिदायत है मोहर्रम की मजलिसें और जुलूस। इंसानियत, इंसानी हुक़ूक़ और संविधानिक हक़ हासिल करने की कुर्बानी का जज्बे की एहमियत बताती है अज़ादारी।
और मानवता को बचाने के नेक मकसद में सभी धर्म, वर्ग,समुदाय, मसलक, लिंग और हर आयु वर्ग को आकर्षित करने कलर्स भी अजादारी के हर रंग में शामिल है। यहां औरत-मर्द, हिंदू-मुसलमान, गरीब-अमीर, शिया-सुन्नी, ब्राहमण-दलित.. किसी में कोई फर्क ही।
तरह-तरह के खाने आम करने का मकसद यही है कि इस पवित्र और निस्वार्थ अनुष्ठान में आने वालों को खाने-पीने की कोई दिक्कत ना हो। यहां तक कि ऐसे आयोजन का नेक उद्देश्य नहीं भी जानते हैं वो भी खाने के.आकर्षण में यहां आकर इस अनुष्ठान से जुड़ें। कला-संस्कृति, शिल्प अदब, नज्म कवीता, लय.. धुन.. नारे, लेक्चर्स.. यही रंग अज़ादारी के होते है, जिस पर मुसलमानों का ही एक वर्ग एतराज़ करता है। और ठीक ऐसे ही रंग हुसैनाबाद स्थित घंटाघर पर CAA, NRC के खिलाफ एहतिजाज (विरोध प्रदर्शन/धरना) का है। लेकिन इसमें वही तबका बड़ी तादाद में शामिल जो कहता है कि औरतों का नारे लगाना गलत है। ग़म, विरोध या एतिजाज में शिल्पकारी, गाना-बजाना, औरत मर्द का एक जगह इकट्ठा होना.. बिदत यानी गलत है।
गौरतलब है कि लखनऊ के रिवायती अंदाज़ का हर रस यहां मनाई जाने वाली अज़ादारी की मजलिसों मे घुला है। क्योंकि लखनऊ को सजाने संवारने, कला-संस्कृति, गंगा-जमनी तहज़ीब और अदबी रंगों से खूबसूरत बनाने वालों ने ही मुसलमानों के रसूल हजरत मोहम्मद के नाती ईमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की याद में मोहर्रम की अज़ादारी को एक नया अंदाज़ दिया था। लखनऊ की सजाने-सवारने वाले नवाबीन ने ही लखनऊ की अज़ादारी को भी खूबसूरत अंदाज और नयें रंगों से सजाया था। और ये वही नवाबीन थे जिनके परिवार ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर देशकर 1947 में देश को आज़ाद कराने में योगदान दिया था।






