जी के चक्रवर्ती
भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिन लोगों पर कानून का उलंघन एवं व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने जैसे संगीन आरोप से घिरे हुये हों ऐसे लोगों द्वारा सदन में बैठ कर कानून बनाने का काम करें? इस पर रोक लगाने के लिये अभी जल्दी ही देश के सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को ऐसे तरीको को अमल में लाकर एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने के निर्देश दिये हैं, जिससे देश की राजनीति में आपराधिक ब्योरा रखने वाले लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके। इस दिशा में देश के कोर्ट द्वारा दिये गये यह आदेश एक बहुत बड़ी पहल है जिसको निश्चित रूप से अंजाम तक पहुंचाया ही जाना चाहिए, क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद देश की राजनीति में आपराधिक इतिहास रखने वाले लोगों की संख्या में दिनोदिन इजाफा होता चला जा रहा है। जिसके कारण भारतीय लोकतंत्र को एक गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
आज मौजूदा समय मे भारत जैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश की राजनीति में एक आपराधिक छवि वाले लोगों का सदन में चुनाव जीत कर पहुंचना एक खिलवाड़ जैसी बात नहीं तो और क्या कहा जा सकता है? बहुत दिनों से यह महसूस किया जारहा था कि चुनावों के वक्त नामांकन दाखिल करते समय अपने आपराधिक मामलों का विवरण देने की बाध्यता से भी ऐसे लोगों को चुनाव में उतारने से रोक जाना संभव नही हो सका, लेकिन इससे यह अवश्य हुआ कि चुनाव आयोग के पास आपराधिक व्यक्तित्व वाले लोगों की लिस्ट एकत्र हो गयी जिसकी जरूरत पड़ने पर प्रयोग किया जा सकता है इसके साथ ही ऐसा भी नियम होना चाहिए कि जिस भी व्यक्ति का समाज मे आपराधिक छवि होने के साथ ही उनके विरुद्ध एक भी पुलिस रिपोर्ट दर्ज हौ तो ऐसे लोगों को चुनावी टिकट ही न दिया जाय।
इसमे एक बात और भी है कि खुद आपराधिक छवि वाले व्यक्ति ने स्वमं अपनी चरित्र प्रमाण पत्र देने का काम कर दिया यह एक अलग मुद्दा है कि अभी कोर्ट में उसका अपराध सिद्ध हुआ या नही या फिर कहें उनके विरुद्ध दायर मुकदमे में कोर्ट का निर्णय क्या और कब आता है। ऐसी स्थिति में किसी भी सूरत में ऐसे लोगों को चुनावी टिकट दिया ही नही जाना चाहिये। इस तरह से पुनः एक बार यह बात सामने निकल कर आती है कि हमारे देश मे अपराध और अपराधियों पर लगाम लगाने की प्रक्रियां इतनी लम्बी और जटिल है कि जिससे अपराधियों का मनोवल पहले से और भी अधिक बढ़ जाता है। यह कटु सच्चाई है कि ऐसे लोग चुनाव जीतने में रुपये -पैसों से लेकर वल दबंगई में समर्थ होने से देश मे होने वाले चुनावों के वक्त यह प्रचारित करने में भी सफल हो जाते हैं कि उन पर चल रहे मामले बदले की राजनीति का नतीजा हैैं इसके साथ ही साथ छल-छद्म और जाति-संप्रदाय जैसे बातों का सहारा लेकर चुनाव जीतने में कामयाब भी हो जाते हैैं।
एक लम्बे समय से निर्वाचन आयोग इस बात का जिक्र करता चला आ रहा है कि यह कहता चला आ रहा है कि ऐसे अपराधी छवि वाले चुनाव प्रताशीयों को चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिये जिनके खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल हो चुके हैं। यह बडे ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि इस तरह की सुझावों की लगातार देश में अनदेखी होती चली आरही है कि दोष सिद्ध न होने तक व्यक्ति को निर्दोष नही माना जाना चाहिए। इस तरह के कथन की आड़ लेकर एक लम्बे समय से देश मे होने वाले चुनावों में दबंग किस्म के अपराधी लोग टिकर हासिल कर इसमे शामिल होते चले आरहे हैं।
देश के आम लोगों की यही चाहत हैैं जो निर्वाचन आयोग भी चाहता है। चूंकि देश का जनमत राजनीति के अपराधीकरण से बुरी तरह से आजिज आ चुका है अतः मौजूदा समय मे यह अत्यंत आवश्यक है कि जनता की आकांक्षाओं में पूरी तरह से खरा उतरने का समय आ गया है कि किसी भी सूरत में आपराधिक प्रवत्ति वाले तत्वों को चुनावी प्रक्रियाओं से पृथक रखा जाना चाहिये जिससे देश के लोगों के मध्य चुनावी प्रक्रियाओं को निष्पक्ष एवं लोकतंत्र में उनके विश्वास को और भी मजबूत करने में सहायक हो।






