महोबा के इस मुहल्ले का हवेली दरवाजे पर अब यहां न वो हवेली रही और न वो दरवाजा जिसने इस मुहल्ले को ये नाम दिया। सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देने वाले इस मैदान पर अब सुअर लोट रहे हैं। कूड़े के ढेर लगे हैं और पूरा मैदान भारी अतिक्रमण की चपेट में आ चुका है। प्रशासन की उदासीनता का अगर यही आलम रहा तो लोग जल्दी ही ये भूल जायेंगे कि 1857 की पहली गदर में इस मैदान पर आजादी की बड़ी जंग लड़ी गयी थी। 16 क्रांतिकारियों को एक साथ फांसी पर लटका दिया गया था। उनकी पत्नियां भी जौहर दिखाते हुए उनकी चिता के साथ शहीद हो गयीं थीं। ये इलाका बगावत का केन्द्र बन गया था व विद्रोह दबाने के लिए अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पड़े थे। संवेदनहीन प्रशासन ने 19 साल पहले उनकी याद में आज ही के दिन इसी शहीद स्थल पर लगने वाले गुदड़ी के मेले को बंद करा दिया, अब इसे पूरी तरह खत्म करने पर उतारू है। इसी मैदान से मुहर्रम में ताजिया उठते हैं व कजली मेले का जुलूस शुरू होता है लेकिन मैदान का जो हाल हो गया है, उससे लगता है जल्दी ही बचा-खुचा मैदान भी खत्म हो जायेगा और ये कार्यक्रम बंद हो जायेंगे। प्रशासन के इस रवैये के प्रति जनता में आक्रोश है।
– तारा पाटकर







