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    Home»उत्तर प्रदेश

    बबेरू के सीने पर बुलडोजर, बेबसता और रुदन के बाद फिर खिलेगा चमन!

    ShagunBy ShagunFebruary 3, 2026Updated:February 5, 2026 उत्तर प्रदेश No Comments5 Mins Read
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    After the bulldozer tears through Baberu's heart, and amidst helplessness and tears, the garden will bloom again!
    बबेरू के सीने पर बुलडोजर, बेबसता और रुदन के बाद फिर खिलेगा चमन!
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    अजय कुमार श्रीवास्तव

    बबेरू। बबेरू में अतिक्रमण के नाम पर जो बुलडोजर चल रहा है तो क्या वो लोगों द्वारा जान बूझ कर किए गए अतिक्रमण पर चल रहा है या वो अपनी और तत्कालीन प्रशासन की जानकारी के अनुसार सही था तब क्या वो अतिक्रमण था ही नहीं! क्या तब आमजन के साथ-साथ नोटरी वाले वकील, नगर पंचायत और राजस्व प्रशासन भी ऐसे कई अधिनियम से अनजान थे, या फिर कोई इस विषय को जान रहा था और उस समय आमजन को इस विषय में जानकारी देना उचित नहीं समझा गया।

    आज जितनी गलती या अनजाना आमजन के हिस्से में है क्या उससे बड़ी गलती तत्कालीन नगर पंचायत, नोटरी वकीलों और प्रशासन के हिस्से में नहीं होनी चाहिए? आज बबेरू का यह दर्द सिर्फ ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि उन जज्बातों का है जो साठ-सत्तर सालों में एक-एक कतरे पसीने से सींचे गए हैं। बबेरू के बहुत से लोगों की उम्मीदें, सपने और भावनाएं आज दम तोड़ रही हैं। उन्हें लग रहा है वो सही हैं, वो सारे नियम कानून और करों को सही समय से अदा करते आए हैं।

    After the bulldozer tears through Baberu's heart, and amidst helplessness and tears, the garden will bloom again!
    बबेरू के सीने पर बुलडोजर, बेबसता और रुदन के बाद फिर खिलेगा चमन!

    बबेरू के ये आमजन आज बेबस है लोगों का कहना है कि सरकार ऐसे कई जरूरी अधिनियमों की जागरूकता के लिए अपने तंत्र और लोक दोनों को सुचारू रूप से समय समय पर जानकारी देती रहे जिससे किसी को ऐसी अति दयनीय और मृत्यु तुल्य दुखद स्थिति से सहसा ही न गुजरना पड़े।

    “सत्तर साल का लंबा सफर लगा, तब जाकर बाजार सजा था,
    गलियों से निकलकर यह हिस्सा, सपनों का आगाज बना था।
    किसी ने अपना गांव छोड़ा, किसी ने सारी पूंजी हारी,
    मकान नहीं वो रूह बनी थी, सबकी दुनिया थी प्यारी।
    चौराहों की रौनक में तब, किसका हाथ रहा होगा?
    जब नोटरी/रजिस्ट्री की फाइलों पर, सरकारी ठप्पा लगा होगा।
    तब क्यों नहीं चेताया था कि, ‘सड़क का यह कानून’ है?
    आज जिसे तुम तोड़ रहे, वो तो इन मासूमों की “रूह” है!
    वो ‘एक्ट’ दबा था फाइलों में, या जिम्मेदार इससे अनजान रहे,
    हर करों का हिस्सा तो ये जन-जन समय-समय पर देते रहे।
    नगर पंचायत चुप रही, और सोता रहा प्रशासन भी,
    अब अतिक्रमण के नाम पर, छीन रहे हो राशन भी।
    जिन्न निकला है दफ्तर से, पुराने उस अधिनियम का,
    पर दोष बता दो किसका है, जिम्मेदारों या इन बेबस लाचारों का?
    आत्मा उजड़ रही बस्ती की, आंखों में सैलाब खड़ा,
    बबेरू का हर बाशिंदा आज, इंसाफ का मुंह ताक रहा।
    होगा नया सवेरा इस अंधियारी रात के बाद,
    चमकेगा फिर बबेरू अब जाम भी होगा साफ।”

    आमजन के कुछ मौन सवाल!

    1. उत्तरदायित्व (Accountability): – यदि जमीन, दुकान या मकान Road Side land control Act या किसी अन्य प्रतिबंध के दायरे में थी, तो पिछले 60 से ज्यादा वर्षों में ‘नगर पंचायत’ और ‘राजस्व विभाग’ ने वहां निर्माण होने ही क्यों दिया? उस समय तो नोटरी भी मान्य थी घरों की खरीद फरोख्त के लिए उस समय इन तमाम अधिनियमों का जिक्र क्यों नहीं किया गया? क्योंकि उस समय तो ऐसी जानकारी देना और अनिवार्य बन जाता था जब आमजन पढ़ा लिखा नहीं था।
    2. कानूनी सूचना (Public Awareness): तत्कालीन पुराने सरकारी नियम अक्सर जनता की पहुंच से दूर फाइलों में बंद रहते आए हैं। अधिनियमों का उद्देश्य जनता को व्यवस्थित करना होता है, जनता और तंत्र को ऐसे हर अधिनियम के प्रति समय समय पर जागरूक करते रहना चाहिए, जिससे भविष्य में ऐसी दु:खद स्थिति किसी अन्य स्थान अन्य लोगों के साथ न उत्पन्न हो सके।
    3. ये कैसा मापदंड: सरकार सालों तक उन्हीं दुकानों और मकानों से गृह कर (House Tax), जल कर और व्यापारिक कर वसूलती रही। यदि निर्माण अवैध था, तो कर वसूलना अनैतिक और कानूनी विरोधाभास है। या टैक्स लेते समय रोड साइड एक्ट आदि की जानकारी देने की जिम्मेदारी भी किसी न किसी जिम्मेदार की तय होनी चाहिए थी, तय होनी चाहिए।
    4. दोषी कौन?: उस कालखंड में नोटरी को मान्यता किसने दे रखी थी, अगर तत्कालीन मान्यताएं थीं तो रोड साइड कंट्रोल एक्ट लोगों को क्यों नहीं बताए गए? बताए गए होते तो इस दयनीय स्थिति से यहां के आमजन को गुजरना न पड़ता। बिना अपराध के इस अपराधबोध का सामना न करना पड़ता।

    यह स्थिति दर्शाती है कि आम आदमी जब अपनी सारी जमा-पूंजी लगा देता है, तब व्यवस्था उसे “अतिक्रमण” कहकर पल्ला झाड़ लेती है। यह केवल भौतिक नुकसान नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लोक की आत्मा में गहरा घाव है। लेकिन ये घाव जब भरेगा तब एक नई चेतना जन्म लेगी। नया चौराहा, नया बबेरू, चौड़ी सड़कें पर जाम का क्या? इसकी क्या गारंटी है कि सड़क चौड़ीकरण से जाम समाप्त हो जाएगा? जब तक सड़क पर चलने वाले सड़क के नियमों का पालन नहीं करते तब तक जाम की समस्या आम ही रहना है।

    शासन प्रशासन किसी का बुरा नहीं चाह रहा, वो आमजनों के हितों के लिए बनाए नियमों के तहत अपने सिस्टम से ही चल रहा है। बात समय-समय पर ऐसी तमाम जानकारियों के अभाव की है जो जनता तक उस समय नहीं पहुंच सके जब जनता को इनकी जरूरत थी।

    “उम्मीदों का एक नया सूरज उगेगा।
    बबेरू फिर से एक बार खिल उठेगा।।”
    धैर्य और हिम्मत की जरूरत है अभी।
    शासन-प्रशासन अपने हैं गैर नहीं।।”

    Shagun

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