हमारे देश मे न्यायिक प्रक्रिया इतनी जटिल व लम्बी है कि समय पर न्याय मिल पाना बहुत कठिन होने के साथ ही साथ बहुत खर्चीला भी है, लेकिन फिर भी आम आदमी को न्याय पाने के लिए मुकदमेबाजी के फेरे में पड़ जाता है इसलिए किसी मुकद्दमे से पहले दोनो पक्षों के बीच मध्यस्थता संबंधी कानूनों का बनाया जाना वक्त की जरूरत बन गयी है।
न्यायपालिका एवं विधायिका को इस तरह की कोई राह अवश्य निकालना चाहिए कि जिससे अदालतों पर दिनों दिन बढ़ते मुकदमों का बोझ समाप्त न भी हो पाये तो कम से कम आगे इसकी संख्या में बढ़ोत्तरी न हो सके एवं लोगों को समय से न्याय मिलने का रास्ता साफ हो सके।
इस दिशा में अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश द्वारा मुकदमों से पहले मध्यस्थता को अनिवार्य बनाने के लिए नए कानून बनाने की जरूरत की बात दुहराई गयी है यह कोई पहली बार नही है बल्कि सच तो यह है कि इसके पहले स्वमं प्रधान न्यायाधीश ने ही पिछले वर्ष इस तरह के किसी कानून की आवश्यकता पर बल दिया था। मौजूदा समय मे इस तरह का कोई कानून इसलिए भी आवश्यक हो गया है, क्योंकि देश के लोग अंतरराष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्य एवं निवेश जैसे कई महत्वपूर्ण मामलों को लेकर अदालतों तक पहुंच रहे हैैं और एसे मुकद्दमों में बहुत लंबा समय लग जाता हैं। इसलिये यह सबसे अच्छा है कि व्यापारिक एवं औद्योगिक गतिविधियों एवं निवेश करने के लिए उपयुक्त माहौल के बनाने के लिए मुकदमेबाजी होने से पहले दोनो पक्षों के बीच मध्यस्थता करने को लेकर कानून बनाये जाने की मौजूदा समय की आवश्यकता बन गयी है।
वैसे तो इस मामले में सबसे अच्छा तो शायद यही होगा कि ऐसे कानून बनाये जाने की आवश्यकता को लेकर सरकार अपनी सक्रियता दिखाये और इस दिशा में तेजी के साथ प्रयास करने की कोशिश करें एवं इसकी आवश्यकता को समझे, लेकिन इसी के साथ न्यायपालिका को भी स्वमं देखना होगा कि उसके स्तर पर मध्यस्थता का निर्वहन किस प्रकार से किया जा सकता है।
यह इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि स्वमं उच्च न्यायपालिका के स्तर पर कई ऐसे मामले वर्षों तक लटकते रहे हैैं, जिसका निस्तारण अति शीघ्र हो जाना चाहिए। क्योकि व्यापार, वाणिज्य एवं निवेश संबंधी अदालती मामलों का निपटारा होने में देरी से होने से इससे न केवल भारतीय न्यायपालिका की ही छवि प्रभावित होती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेश संबंधी गतिविधियों पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है और वह भी ऐसे वक्त जब कारोबारी माहौल को सुगम बनाने के लिए हर संभव स्तर पर तीब्र प्रयास किये जा रहे हैं। इसके साथ ही साथ यह भी समय की मांग है कि सामान्य अदालती मामलों का निस्तारण अति शीघ्र से शीघ्र करने की कोई ऐसी प्रक्रिया विकसित किये जाने की जरूरत है जिससे देश मे लंबित चल रहे मुकद्दमों पर निर्णय शीघ्र से शीघ्र हो सके।
इससे अधिक और क्या विडंबना होगी कि अदालती मामलों के समय से निपटारे के लिए एक लंम्बे समय से बातें हो रही हैं, लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास अभी तक नही किया गया है इसके लिये जितनी तेजी के साथ इसे आगे बढ़ाये जाने की जरूरत है फिलहाल वैसा होता नजर नहीं आ रहा है। बहुत धीमी, थकाउ एवं जटिल अदालती प्रक्रियाओं का कितना दुरुपयोग हो रहा है, इसके उदाहरण स्वरूप ताजा प्रकरण निर्भया दुष्कर्म मामले में देखा जा सकता है। जबकि इस मामले में उच्चतम न्यायालय दोषियों को फांसी की सजा सुना चुकी है, लेकिन फिर भी गुनहगारों के लिए अदालती विकल्प खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैैं। यह स्थिति उस वक्त तक नही हट सकती है जब तक कि न्यायिक सुधारों की रफ्तार तेज नहीं हो जाती है। देश के लिये देश के सुभचिंतक न्यायपालिका एवं विधायिका को मिलकर कोई न कोई ऐसी राह अवश्य निकालना चाहिये जिससे न केवल अदालतों पर मुकदमों का बोझ हल्का या समाप्त हो सके और देश के लोगों को समय पर न्याय मिलने की उम्मीदें कायम हो सकें।
- जी के चक्रवर्ती







