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    नारी युग की शुरूआत

    By March 7, 2020 Current Issues No Comments9 Mins Read
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    अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस ( 8 मार्च 2019) पर विशेष लेख


    डॉ. जगदीश गाँधी

    संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार सारे विश्व में प्रतिवर्ष 8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को सरकारी, गैर-सरकारी, शैक्षिक संस्थानों आदि में महिला सशक्तिकरण पर सारगर्भित चर्चायें होती हैं। तथापि महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने के लिए व्याख्यान होते हैं। महिलाओं का शान्ति में दिये जा रहे योगदान पर प्रकाश डाला जाता है। हमारा मानना है कि एक माँ के रूप में नारी का हृदय बहुत कोमल होता है। वह सभी की खुशहाली तथा सुरक्षित जीवन की कामना करती है। ‘महिला’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘मही’ (पृथ्वी) को हिला देने वाली महिला। विश्व की वर्तमान उथल-पुथल शान्ति से ओतप्रोत नारी युग के आगमन के पूर्व की बैचेनी है।

    नारी का सम्मान:

    हमारा मानना है कि अनेक महापुरूषों के निर्माण में नारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान रहा है। कहीं नारी प्रेरणा-स्रोत तथा कहीं निरन्तर आगे बढ़ने की शक्ति रही है। प्राचीन काल से ही नारी का महत्व स्वीकार किया गया है। हमारी संस्कृति का आदर्श सदैव से रहा है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता’ अर्थात जिस घर में नारी का सम्मान होता है वहॉ देवता वास करते हैं। नये युग का सन्देश लेकर आयी 21वीं सदी नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की है। मेरा विश्वास है कि नारी के नये युग की शुरूआत हो चुकी है।

    जन्नत है तो माँ के कदमों में: 

    महिला का स्वरूप माँ का हो या बहन का, पत्नी का स्वरूप हो या बेटी का। महिला के चारां स्वरूप ही पुरूष को सम्बल प्रदान करते हैं। पुरूष को पूर्णता का दर्जा प्रदान करने के लिए महिला के इन चारों स्वरूपों का सम्बल आवश्यक है। इतनी सबल व सशक्त महिला को अबला कहना नारी जाति का अपमान है। माँ तो सदैव अपने बच्चों पर जीवन की सारी पूँजी लुटाने के लिए लालायित रहती है। मोहम्मद साहब ने कहा है कि अगर धरती पर कहीं जन्ऩत है तो वह माँ के कदमों में है।

    नारी का अमानवीय शोषण:

    समाज में आज चारों तरफ कम उम्र की लड़कियों तथा महिलाओं पर घरेलू हिंसा, रेप, बलात्कार, भू्रण हत्याऐं आदि की घटनायें पढ़ने व सुनने को मिल रही हैं। टीवी चैनल, इन्टरनेट, मीडिया, सिनेमा जैसे सशक्त माध्यमों से तीव्रता के साथ परोसी जा रही अश्लीलता विशेषकर बाल एवं युवा पीढ़ी के मस्तिष्क में बहुत बुरा प्रभाव डाल रही हैं। बाल एवं युवा पीढ़ी िंहंसा एवं सैक्स में डूबती जा रही है। इस महामारी से बाल एवं युवा पीढ़ी को समय रहते मुक्त कराना जरूरी है। आज हमारे विद्यालयों के साथ ही माता-पिता को यह प्रश्न विचलित कर रहा है कि घरों में और बच्चों की पढ़ाई के कमरों तक में टेलीविजन एवं इण्टरनेट के माध्यम से घुस आयी अश्लीलता की इस महामारी से हम अपने बच्चों को कैसे बचायें? िंहंसा एवं सैक्स के माध्यम से नारी का घोर अपमान किया जा रहा है। उसे कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा बाजारू वस्तु की तरह समाज में परोसा जा रहा है, जो कि घोर अपराध है।

    भाव-संवेदना का स्त्रोत:

    महिलाओं तथा छोटी बच्चियों पर होने वाले भेदभाव, शोषण एवं अत्याचार से विचलित होकर किसी ने कहा है कि विश्व में गर बेटियाँ अपमानित हैं और नाशाद हैं तो दिल पर रखकर हाथ कहिये कि क्या विश्व खुशहाल है? महिलाओं तथा छोटी बच्चियों पर होने वाली इस तरह की हृदय विदारक घटनाओं के लिए पूरा समाज दोषी है। किसी ने नारी पीड़ा को इन शब्दों में व्यक्त किया है – बोझ बस काम का होता, तो शायद हंस के सह लेती ये तो भेदभाव है, जिसे तुम काम कहते हो। मनुष्य के अंदर स्थित भाव-संवेदना का स्रोत कुण्ठित होकर बंद हो गया है। इस कारण से मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से बीमार हो गया है। चिकित्सा पद्धति भी इसे स्वीकार करने लगी है कि निरोग रहने के लिए आध्यात्मिकता एक कुँजी की तरह है। हमारी भाव-संवेदना परिवार, नाते-रिश्तेदार, नगर-देश से बढ़ते हुए वसुधैव कुटुम्बकम के लक्ष्य को प्राप्त करें। बिना किसी जाति-धर्म के भेदभाव के भाव-संवेदना बांटने का मन करने लगे तो समझो हमारे जीवन में आध्यात्मिकता बढ़ने लगी।

    अवतारों को जन्म देने वाली मातायें सदैव अमर रहेंगी:

    वे नारियाँ कितनी महान, पूज्यनीया तथा सौभाग्यशाली थी जिन्होंने राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, अब्राहीम, मूसा, जरस्थु, ईशु, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह आदि जैसे अवतारों तथा संसार के महापुरूषों को जन्म दिया। प्रभु कृपा से युग-युग में धरती पर मानव जाति का कल्याण करने आये अवतारों ने मर्यादा, न्याय, समता, करूणा, भाईचारा, अहिंसा, हृदयों की एकता आदि जैसे महान विचारों को अपनाने की शिक्षा समाज को देने हेतु धर्मशास्त्रों गीता, कुरान, बाईबिल, गुरू ग्रन्थ साहिब, त्रिपटक, किताबे अकदस, किताबे अजावेस्ता का ज्ञान दिया।

    मदर टेरेसा की ममता-करूणा शक्ति बन गयी :

    धन्य है तुलसीदास जी की माँ जिन्होंने इस महान आत्मा को जन्म दिया। तुलसीदास जी ने अपनी आत्मा के सुख के लिए रामायण जैसी पुस्तक लिख डाली। रामायण जैसी पुस्तक बिना परमात्मा के अहैतुकी कृपा के लिखा जाना संभव नहीं था। कबीरजी जुलाहे के घर में पले-बढ़े और इतने महान बन गये। क्या बिना माँ के आशीर्वाद के यह सम्भव है? सूरदास जी ने सूरसाहित्य, सूरपदावली, सूरसागर जैसा साहित्य बिना किसी प्रभु कृपा के लिख दिया? क्या यह संभव है कि एक अंधे व्यक्ति के द्वारा बिना प्रभु कृपा के मानव प्रकृति और समाज का इतना चित्रण किया जा सकता है? अब्राहम लिंकन को जन्म देने वाली माँ धन्य है। वह मोची के लड़के थे और वह अमेरिका के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति बन गये। मदर टेरेसा एक साधारण प्राइमरी टीचर थी और वह ममता-करूणा की संसार में सबसे बड़ी शक्ति बन गयीं। यह सब प्रभु कृपा की ही देन थी। प्रभु-कृपा तथा माँ के आशीर्वाद से असंभव से असंभव काम भी हो जाया करता है। हमारा मानना है कि शुद्ध आत्मा ही हमें प्रभु के समीप ले जाती है। साथ ही हमारे कर्म ही हमारे द्वारा कमाये गये पाप और पुण्य के साधन बनते हैं। इसलिए हमें अपने प्रत्येक कार्य को आत्मा से जोड़कर करना चाहिए।

    नारी अनंत गुणों की भण्डार :

    सतयुग की बेला में जागने की शुरूआत हमें हर बच्चे को धरती का प्रकाश बनाने के विचार को हृदय से स्वीकार करके, अब एक पल की देर किये बिना, कर देनी चाहिए। एक बालिका को शिक्षित करने के मायने है पूरे परिवार को शिक्षित करना। सृष्टि के आंरभ से ही नारी अनंत गुणों की भण्डार रही है। पृथ्वी जैसी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र जैसी गंभीरता, चंद्रमा जैसी शीतलता, पर्वतों जैसा मानसिक उच्चता हमें एक साथ नारी हृदय में दृष्टिगोचर होती है। वह दया, करूणा, ममता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है और समय पड़ने पर प्रचंड चंडी का भी रूप धारण कर सकती है। वह मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री भी है। नर और नारी एक दूसरे के पूरक है। नर और नारी पक्षी के दो पंखों के समान हैं। दोनों पंखों के मजबूत होने से ही पक्षी आसमान में ऊँची उड़ान भर सकता है।

    नारी के सम्मान में एक प्रेरणादायी गीत :

    नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।।

                    कभी मीरा, कभी उर्मिला, लक्ष्मी बाई, कभी पन्ना, कभी अहिल्या, पुतली बाई।

                    अपने बलिदानों से, इतिहास रचा रे।

                    नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।।

                    अबला नहीं, बला सी ताकत रूप भवानी, पहचानो अपनी अद्भुत क्षमता हे कल्याणी।

                    बढ़ो बना दो, विश्व एक परिवार सगा रे।।

                    नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे।

                    धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।

                    महिला हो तुम, मही हिला दो, सहो न शोषण, अत्याचार न होने दो, दुष्टां का पोषण।

                    अन्यायी अन्याय मिटा दो, चला दुधारे।।

                    नारी हो तुम, अरि न रह सके पास तुम्हारे, धैर्य, दया, ममता बल हैं विश्वास तुम्हारे।।

    नारी अपना नेतृत्व प्रदान करेंगी :

    नारी के चारों स्वरूप माँ, बहिन, पत्नी तथा बेटी को हृदय से पूरा सम्मान देकर ही विश्व को बचाया जा सकता है। संसार के लगभग दो अरब बच्चों के सुरक्षित भविष्य के संकल्प के साथ इस नये युग का विचार यह है कि हे प्रभु, यह वरदान दो कि हृदय की एकता का विचार सारी पृथ्वी पर छा जाये। धरती पर साम्राज्य परमेश्वर का हो यह विचार सभी समुदाय एवं विश्व के सभी राष्ट्रों के चिन्तन में आ जाये। आज नारी संसार के हर क्षेत्र को अपना नेतृत्व प्रदान कर रही है। नारी के त्याग, बलिदान तथा ममता के प्रति सच्चा सम्मान यह है कि हम जिस राष्ट्र में रहते हैं उस राष्ट्र के कानून का हमें सम्मान करना चाहिए। हमें अपनी व्यक्तिगत, पारिवारिक तथा सामाजिक समस्याओं का समाधान आपसी परामर्श से न निकलने पर अंतिम आशा न्यायालय की शरण में जाने की समझदारी दिखाना चाहिए। वर्तमान नारी युग में लड़ाई-झगड़े तथा युद्धों का अब कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

    नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत:

    विश्व की आधी आबादी महिलाएं विश्व की रीढ़ हैं। सारे विश्व में आज महिलायें विज्ञान, अर्थव्यवस्था, प्रशासन, न्याय, मीडिया, राजनीति, अन्तरिक्ष, खेल, उद्योग, प्रबन्धन, कृषि, भूगर्भ विज्ञान, समाज सेवा, आध्यात्म, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीकी, बैंकिग, सुरक्षा आदि सभी महत्वपूर्ण क्षेत्रों का बड़े ही बेहतर तथा योजनाबद्ध ढंग से नेतृत्व तथा निर्णय लेने की क्षमता से युक्त पदों पर आसीन हैं। 21वीं सदी में सारे विश्व में नारी शक्ति के अभूतपूर्व जागरण की शुरूआत हो चुकी है। इसलिए हम यह पूरे विश्वास से कह सकते हैं कि एक माँ शिक्षित या अशिक्षित हो सकती है, परन्तु वह एक अच्छी शिक्षक है जिससे बेहतर स्नेह और देखभाल करने का पाठ और किसी से नहीं सीखा जा सकता है। नारी के नेतृत्व में दुनिया से युद्धों की समाप्ति हो जायेगी। क्योंकि किसी भी महिला का कोमल हृदय एवं संवेदना युद्ध में एक-दूसरे का खून बहाने के पक्ष में कभी नही होता है। हमारा मानना है कि महिलायें ही एक युद्धरहित एवं न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का गठन करेंगी। इसके लिए विश्व भर के पुरूष वर्ग के समर्थन एवं सहयोग का भी वसुधा को कुटुम्ब बनाने के अभियान में सर्वाधिक श्रेय होगा।

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