एक तरफ भूख,
दूसरी तरफ महामारी का है डर।
गोद में ले के नौनिहाल,
आंसू बहाते चल दिए हैं घर।।
सिर पर लदी है गठरी,
शरीर होए जा रही ठठरी।
ना मिला दो दिन से निवाला,
फिर भी पकड़े हैं सड़क की पटरी।।
दर्द इतना है कि
उसे बयां नहीं किया जा सकता।
सैकड़ों किमी चलने में भी आज नौनिहाल नहीं थकता।।
गोद में नौनिहाल,
पेट में है भूख,
भारी हो गया है सर।
आंखों में आंसू,
लाल बचा रहेगा या नहीं,
सता रहा है डर।।
।।एक तरफ भूख,
दूसरी तरफ महामारी का है डर।
गोद में लेकर नौनिहाल,
चल दिए हैं घर।।
मित्रों, किसी को नसीहत देना तो आसान है।
मगर, वे भूखों मर जाएं, यही मेरा सम्मान है।।
आज यही सोच रात को नींद नहीं आई।
देखो ना, कैसे गोद में नौनिहाल लेकर तड़प रही है माई।।
क्या आंखों में आंसू देख,
तुम्हारा दिल नहीं तड़फड़ाता।
क्या इतना मर चुके हैं आज
कि भी हमसे है शर्माता।।
भाई, प्रकृति के प्रकोप को देखकर तो जरा सा डर।
आओ, थोड़ा हाथ बढ़ाओ,
मरना तो सबको है,
कल मरें या आज ही जाएं मर।।
देखो, आज मानवता हो रही है तार-तार।
फिर भी सोच रहे कि
सब करे सरकार।।
अरे, महामारी का है इतना कहर।
फिर भी भगवान से नहीं है डर।।
।। देखो ना एक तरफ भूख,
दूसरी तरफ महामारी का डर।
गोद में ले के नौनिहाल,
लोग चल दिए हैं घर।।
- उपेंद्र नाथ राय ‘घुमन्तु’






