इंसान की दृढ़ इच्छाशक्ति, उसके ज्ञान और विज्ञान के साथ ही सावधानी से संघर्ष करते रहने की हिम्मत से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं! यह अपने आप में शत-प्रतिशत सच है। इंसानी शक्ति के आगे आज तक न तो कोई समस्या टिकी है और न ही भविष्य में टिक पायेगी।
दरअसल तात्कालिक रूप से हम लोग जिसे प्रलयकारी समस्या मान लेते हैं, हकीकत में वो प्रलयकारी न होकर विस्मयकारी होती है। ऐसी विस्मयकारी समस्या जिसमें आम जनमानस उचित निर्णय लेकर समस्या से बचाव करने या उससे निपटने के साधन-संसाधन खोजने के बजाय अन्य तरह की समस्याओं से उलझ जाता है। बस ऐसा करने मात्र से ही अर्थात लापरवाही करने से समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। जिसके चलते इंसान को भारी हानि होती है। यह हानि जन व धन दोनों रूप में हो सकती है! कुछ न करने वाले अर्थात निकम्में लोगों का एक ही मत होता है कि फलां समस्या का कोई समाधान ही नहीं है। अब ऐसे लोगों को ‘रेगिस्तानी शुतुरमुर्ग और शेर’ की कहानी भला कौन समझाए! मानकर चलिये कि अगर समस्या है..तो उसका निदान भी है.. वह भी सौ फीसदी !
इस बात में तो कोई शक ही नहीं है। जरूरत इस बात की है कि इंसान को खुद इस बात के लिए तैयार होना पड़ेगा कि हम हर तरह की समस्या का न सिर्फ डटकर मुकाबला करेंगे बल्कि समस्या को खत्म भी करेंगे। प्रत्येक तरह की समस्या का मुकाबला सिर्फ एक ही तरीके से नहीं किया जा सकता। मुकाबला करने के अलग-अलग तरीके होते हैं। जिस तरह की समस्या होती है उससे निपटने का तरीका भी उसी तरह का होता है। हां यह अलग बात है कि कभी-कभी हम किसी तरह की समस्या से निपटने के लिए पहले से तैयार होते हैं, तो कभी कभार ऐसा भी हो सकता है कि हमें जल्दबाजी में समस्या से निपटने के लिए एकाएक कदम उठाने पड़ते हैं। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि हम सभी को सावधानी बरतनी चाहिए। इसके लिए यह तो बहुत ही जरूरी हूं कि जब तक समस्या से निपटने के कारगर उपाय न कर लिए जाएं तब तक विशेष सावधानी बरती जाये।
पड़ोसी मुल्क चीन से उपजे कोरोना वायरस (कोविड-19) के दुनिया भर में तेजी से फैलने और अभी तक उसके उपचार की स्थायी वैक्सीन तैयार न हो पाने की वजह से हमारे प्रधानमंत्री जी ने जनहित में कोरोना से बचाव हेतु एक दिन का ‘जनता कर्फ्यू लागू करने का आवाहन कर किया था। देश की अधिकांश जनता ने कोरोना वायरस के बढ़ते दुष्प्रभाव और उससे बचाव में जनता कयूं को कारगर मानते हए अपने प्रधानमंत्री जी का साथ दिया। बीते दिवस का ‘जनता-कर्फ्यू!’ देश भर में ऐतिहासिक रूप से सफल रहा। लेकिन देश के कुछ मानसिक रूप से बीमारू वर्ग के लोगों को मोदी विरोध के कारण यह भी रास नहीं आया। ऐसे लोगों ने जब कुछ नहीं कर पाया तो सोशल मीडिया पर सरकार को इस बात के लिए घेरा कि सरकार ने अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए देश की जनता को मूर्ख बनाया है।
अब भला उनको कौन समझाये कि जब संसार के किसी भी अति विकसित देश ने कोरोना वायरस की दवा नहीं बना पायी है तो भारत जैसे उस देश की क्या गिनती है इसलिए मेरा अपना मत है कि देश के प्रधानमंत्री के आह्वान पर ही नहीं बल्कि अपने गांव के चौकीदार के कहने पर भी पूरी शिद्दत के साथ संक्रामक बीमारी से बचने के लिए अपने-अपने घरों में रहें। जितना सम्भव हो सके बाहरी लोगों से संपर्क भी कम ही रखें। क्योंकि कोरोना वायरस एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से ही फैलता है।

वैज्ञानिक आधार पर यह एक बड़ा जन आंदोलन है जिससे हमारा देश कोरोना वायरस से मुकाबला करके जीतेगा। दरअसल मुझे खूब मालूम है कि चरखे पर सूत कातकर गांधी जी ने गोरों को भारत से भगाया था। हम उनका न तो भारत छोड़ो आंदोलन ही भूले हैं और न ही उनकी दांडी यात्रा भूले हैं। विदेशी वस्त्रों का जलाना भी हमें याद है। ये सब ऐसी तमाम बातें व चीजें हैं जो हमने न तो खुद अपने कानों से सुनी हैं और न ही अपनी आंखों से देखी हैं। लेकिन जिन्होंने हमें यह बातें बताईं व सुनाई हैं वो हमारे अपने थे। उन्हें हम कभी भूल भी नहीं सकते! क्योंकि वह हमारे बाप थे। जब हम बहुत छोटे थे। तब हमारे पैतृक गांव के लोग उन्हें ‘हरेराम’ कहकर पुकारते थे। क्योंकि वे पक्के गांधीवादी थे।
गाँधीजी की इन सब बातों का उस समय की ब्रिटिश हुकूमत सहित गरम दल के लोगों ने भी खासा मजाक बनाया था। देश के प्रधानमंत्री के रूप में पंडित लालबहादुर शास्त्री ने जब जनता से एक टाइम उपवास करने का आवाह्न किया था तब भी कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था। ठीक वैसा ही जैसा पिछले एक हफ्ते से बीते दिवस तक मोदी जी का मजाक बनाया गया। वैसे भी मति मंदों को यह जान लेने में नुकसान नहीं है कि कोरोना की कोई दवा अभी तक दुनिया में कहीं नहीं बनी है। सिवाय संक्रमण से बचने और बचाने के उपाय ही हैं और वही कारगर भी हैं। अगर कोई दवा किसी के संज्ञान में है तो उसे बता देने में कोई हर्ज नहीं है।
वास्तव में इन मति मंद और जहरीले लोगों की असली तकलीफ यह है कि नरेंद्र मोदी के एक आह्वान पर जनता कर्फ्यू को सफल बनाने के लिए समूचा देश एक साथ खड़ा क्यों और कैसे हो गया। इसलिए इनके पेट में ही नहीं बल्कि नफरती दिमाग में भी इसी बात का मरोड़ है। लिहाजा इन नफरत के मारों को कुचल कर आगे बढ़िए और कोरोना से लड़िए। नफरत के मारे इन मानसिक बीमार लोगों को इनके हाल पर छोड़ दीजिए। इसलिए अब ये लोग ‘सोशल मीडिया’ पर मिमियाते हुए जनता को भृमित कर रहे हैं। जो फिलहाल जनता के गले उतरने वाला नहीं है।
- दिनेश






