गोड़िन खरहर ले के रहस बड़की बारी,
बगइचा में पतई क लाग जात रहे टीला।
लागत रहे भीड़ भरसाईं में,
पसीना से कपड़ा हो जाव गीला।
भइया हो,
एही सतुआन में सुगंध फईल जाव पुरा जिला।।
सबेरहीं सब पहुंच जाव इनारे पर,
जल्दी नहाके सब आ जाव दुआरे पर।
सुबहिए से दुअरा पर रखा जाव दउरा,
एगो में सतुआ रहे, दूजा में रहे चउरा (चावल)।
रबी क फसल क रहे खुशहाली,
केहू उठावे दउरा, केहू उठावे डाली।
देख भाई, दुआरे पर आके,
केहू जाए ना पावे खाली।।
भाई हो, अब त न उ महिया (पतला गुड़) दिखाता,
ना लउकाता, कहीं लगड़ी-चरखनवा क गुर।
सतुआ त बिला गइल देशवे से,
सब आंसू बहावे के हो गइल बा मजबूर।।
अब त बहुत कुछ बदल गइल,
भरसाय त बन गइल इतिहास क बात।
खूब रह जा दिल्ली, आ मुम्बई में,
एगो कोरोनवा कई देहलस दिन के रात।।
अब न दिल में मिठास बा,
न रही गइल बा सतुआ क लस्सी।
आखिर महामारी में बाहर निकल काहें बनतड़ खस्सी (बकरा)।।
भइया हो, घुमंतुआ दे ता तोहरा के सतुआन क बधाई।
मन में रख गुर सातू क मिठास,
जिंदगी रही त फिर सतुआ लस-लसाई।।
- उपेन्द्रनाथ राय, ‘घुमंतू’







