राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बसपा को कंट्रोल करने के लिए सपा ने की परशुराम प्रतिमा लगाने की घोषणा
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का प्रधानमंत्री द्वारा शिलान्यास किये जाने के साथ ही अधिकांश पार्टियों को हिन्दू एकता का भय सताने लगा है। यही कारण है कि कार सेवकों पर गोली चलवाने वाली सपा को भी राम याद आ गये, वहीं राम मंदिर का अंत तक विरोध करने वाली कांग्रेस के लिए भी राम प्यारे हो गये। वहीं दूसरी तरफ खुद को पीछे न रहने की नीयत से इस होड़ में बसपा प्रमुख मायावती भी कूद गयीं।
मायावती के कूदने के बाद तो सपा ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए लखनऊ में परशुराम की प्रतिमा लगाने की भी घोषणा कर दी। माना जा रहा है कि सपा ने ब्राह्मणों की सहानुभूति बंटोरने की नीयत से ऐसा किया लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ऐसा करने से सपा की हालत और खराब होने की संभावना है।
इस संबंध में राजनीतिक विश्लेषक राजीव रंजन का कहना है कि राम लहर में सब बह गये। इस बहाव के कारण जहां हिन्दू एकीकृत हुआ है, वहीं विपक्ष दिग्भ्रमित हो गया है। इस भ्रम में सपा को तो ज्यादा नुकसान हो सकता है। इसका कारण है, हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को लेकर चलने वाली सपा से उसका मुस्लिम मतदाता ही नाराज हो सकता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसके बाद आजम खान के भी नाराज होने की संभावना बढ़ जाएगी। ऐसे में हिन्दू मतदाता के साथ लाने के चक्कर में उसके हाथ से मुस्लिम मतदाता निकल जाएगा।
विपक्ष का जल्दबाजी में लिया गया निर्णय
वरिष्ठ पत्रकार पंकज पांडेय का कहना है कि विपक्ष का जल्दबाजी में लिया गया यह निर्णय है। इस मामले में जय श्रीराम का नारा सुनकर विपक्ष वैसे ही घबरा गया, जैसे संसद में अचानक 370 को न्यून करने की घोषणा से घबराया था। उस समय भी विपक्ष नहीं सोच पाया कि इसको कैसे रोका जाय और संसद में पास हो गया। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से वार्ता में कहा कि राम मंदिर के मामले में अचानक तो नहीं हुआ लेकिन उसके नाम पर पूरे देश में बदलते माहौल से विपक्ष घबरा गया। जल्दी-जल्दी में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने ट्वीटर पर राम का नाम लिया। इसके बाद कांग्रेसी तुरंत सामने आ गये। इसके बाद जब अखिलेश यादव ने ट्वीटर पर रामभक्ति अलापी तो ऐसे में मायावती कैसे पीछे रहतीं। उन्होंने भी ट्वीट कर दिया।
बसपा के दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम गठबंधन का फार्मूला तोड़ना चाहती है सपा
उन्होंने कहा कि कुछ गठबंधन के समय को छोड़ दिया जाय तो हमेशा सपा, बसपा को अपना सबसे बड़ा दुश्मन के तौर पर देखती है। इस कारण मायावती का ट्वीट आते ही अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को लुभाने के लिए परशुराम की प्रतिमा लखनऊ में लगाने की घोषणा कर दी। उसकी यह घोषणा को इस रूप में देखा जा सकता है कि बसपा ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित गठबंधन बनाकर चलना चाहती है। इस कारण सपा इस बार ब्राह्मण को अपने पाले में लाने की कोशिश करेगी। यह परशुराम प्रतिमा उसी का प्रतीक है। आने वाले चुनाव के बारे में अभी से कुछ कहना तो ठीक नहीं होगा, लेकिन ब्राह्मणों का झुकाव सपा की तरफ होगा, यह मुश्किल लगता है।
मंदिर आंदोलन में पक्ष या विपक्ष में सीधे तौर पर नहीं थी बसपा की भूमिका
बसपा की भूमिका मंदिर आंदोलन में पक्ष या विपक्ष में सीधे तौर पर नहीं थी। बसपा सुप्रीमो मायावती ने ट्वीट कर कहा कि भाजपा इसका श्रेय न ले और मंदिर निर्माण का कार्य सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार हो रहा है।
भाजपा के लिए आस्था का विषय रहा है राम मंदिर
भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला ने कहा कि भगवान राम और जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण बीजेपी के लिए हमेशा से आस्था का विषय रहा है। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से कहा कि 1986 से लेकर आज तक पार्टी इसके पक्ष में सदैव मजबूती से खड़ी रही। वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्ष पार्टियों के लोग ट्वीट के माध्यम से यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि प्रभु राम के मंदिर के साथ हैं।
कांग्रेस ने कहा था राम काल्पनिक हैं
भाजपा प्रवक्ता मनीष शुक्ला ने कहा कि कांग्रेस ने कहा था कि राम काल्पनिक हैं और रामसेतु तोड़ देना चाहिए। 2019 के पहले सुनवाई नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मुहूर्त पर सवाल खड़ा किया था। मनीष शुक्ला का कहना है कि अखिलेश यादव ट्वीट करके राम मंदिर बनने पर खुशी जाहिर करते हैं। दूसरी तरफ अपने सांसद से कहलवाते हैं कि वहां मस्जिद थी मस्जिद रहनी चाहिए। जनता सब समझती है। अगर राम के प्रति थोड़ी सी भी श्रद्धा है, तो पूर्व में किए गए बयानों के लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए।







