पिछले पांच-छह बरसों में हम लगातार यह देखते चले आ रहे हैं कि न्यूज़ चैनल समाज में ज़हर उगलने और देश को बांटने में ही लगे हुए हैं। चैनलों की डिबेट जानबूझकर उकसाने वाली रखी जाती हैं। किसी का रक्तचाप बढ़ता हो तो एंकर और एडिटर की बला से। लोग स्टूडियो में ही दम तोड़ दें, तो इनकी उस दिन की टीआरपी तो उछल ही जाएगी। ये तमाशेबाज़ लोग हैं।
मैंने सोशल मीडिया पर यह लगातार कहा है कि कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष को और आत्मसम्मान रखने वाले विश्लेषकों को इस तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का घोषित बहिष्कार करना चाहिए। यह देश और समाज का दुश्मन है। आज का मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी नहीं, खलनायक है।
वैकल्पिक मीडिया के तमाम मंचों को एक साथ आकर एक साझा बयान जैसा जारी करना चाहिए न्यूज़ चैनलों के बहिष्कार का। ये अब ख़बर नहीं, मनोरोग और मौत बांट रहे हैं, हत्यारों में बदल चुके हैं। कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी से हुई मुलाकातों में मैंने उनको भी सलाह दी थी कि चैनलों की चीख चिल्लाहट वाली चर्चाओं में चीखने-चिल्लाने, लड़ने-झगड़ने और बेइज़्ज़त होने के बजाय पार्टी के कर्णधारों को समझाएं कि उन्हें ज़मीन पर और सोशल मीडिया में और नये वैकल्पिक माध्यमों में अपनी पैठ बनाने पर काम करना चाहिए। त्यागी जी कांग्रेस के चंद गिने-चुने तेज़-तर्रार प्रवक्ताओं में से थे। उनका यूं अकस्मात चले जाना पहले से ही मुसीबत में पड़ी पार्टी का एक बड़ा नुक़सान है।
जो मीडिया सुशांत राजपूत की आत्महत्या के लिए रिया चक्रवर्ती पर उंगली उठा रहा है, वह राजीव त्यागी के हृदयाघात और उनकी मृत्यु के पीछे अपनी भूमिका के बारे में कुछ कहेगा या सोचेगा?
– अमिताभ श्रीवास्तव कि वॉल से







