आज के इस आधुनिक युग में त्योंहारों की इम्पोर्टैंट्स कितनी बढ़ गयी यह बाजार की रौनक और बढ़ती खरीदारी को देखकर लगाया जा सकता है। महिलाएं अपने फेस्टिवल करवाचौथ को पूरे रीति रिवाज और आधुनिक विविधतापूर्ण परिधानों के साथ मनाने के लिए कितनी उत्सुकता से इस त्यौहार का इन्तजार करती हैं इस बात का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। हांथों में मेंहदी और श्रृंगार का पूर्ण साजों सामान के विशेष गिफ्ट एक दो दिन पहले ही स्पेशल दिखने के तैयार हो जाते हैं।
खासतौर पर बता दें कि करवाचौथ त्यौहार विशेष कर हमारे देश के पंजाब, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश एवं राजस्थान जैसे राज्यों के स्त्रियों द्वारा मनाये जाने वाला पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।
इस पर्व में स्त्रियों द्वारा व्रत रखा जाता है और यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले करीब 4 बजे के बाद से प्रारम्भ हो कर रात में चंद्र दर्शन के बाद ही संपूर्ण होता है।

करवाचौथ का पर्व ग्रामीण क्षेत्र की स्त्रियों से लेकर आधुनिक महिलाओं तक सभी नारियाँ इस व्रत को बडी़ श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मानती हैं। शास्त्रों के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी के दिन किया जाता है। इस पर्व में पत्नियां अपने पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए व्रत रखकर इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की पूजा-अर्चना करती है और रात में चन्द्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करती है। वर्तमान समय में करवाचौथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर विधिवत चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।
इस व्रत को विवाहित स्त्री किसी भी आयु, जाति, वर्ण, संप्रदाय की हो, सबको इस व्रत को करने का अधिकार है। इस दिन स्त्रियाँ अपने पति की दीर्घाआयु, स्वास्थ्य व सौभाग्य की कामना करते हुये यह व्रत रखती हैं।
यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार प्रति वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन (उपसंहार) किया जाता है। बहुत से स्त्रियाँ इस व्रत को आजीवन करती हैं।
हमारे भारत देश में वैसे तो चौथ माता का मंदिर अनेको राज्यों में स्थित है, लेकिन सबसे प्राचीन एवं सबसे अधिक विख्यात मंदिर राजस्थान राज्य के सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा गाँव में स्थित है। चौथ माता के नाम पर इस गाँव का नाम बरवाड़ा से चौथ का बरवाड़ा पड़ गया। चौथ माता मंदिर की स्थापना महाराजा भीमसिंह चौहान ने की थी।







