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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    और कई भी कारण हैं पक्षियों की मौत के?

    ShagunBy ShagunJanuary 16, 2021 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    दिल्ली में संजय झील में जिन साढे तीन सौ से बत्तखों और जल मुर्गियों की चहलकदमी देखने लोग आते थे, शक हुआ कि उन पर वायरस का हमला है और पलक झपकते ही उनकी गर्दन मरोड़ कर मार डाला गया। बीते दस दिनों से देश में कहीं भी किसी पक्षी के संक्रमित हाने पर शक होता है, आसपास के सभी पक्षी निर्ममता से मार दिए जाते हैं। इस बार पंक्षियों के मरने की शुरूआत कौओं से हुई- कौआ एक ऐसा पक्षी है जिसकी प्रतिरोध क्षमता सबसे सशक्त कहलाती है। कौए भी मध्य प्रदेश के मालवा के मंदसौर-नीमच व उससे सटे राजस्थान के झालावाड़ जिले में मरे मिले। जान लें इन इलाकों में प्रवासी पक्षी कम ही आते हैं। उसके बाद हिमाचल प्रदेश में पांग झील में प्रवासी पक्षी मारे गए और फिर केरल में पालतु मुर्गी व बतख। एक बात जानना जरूरी है कि हमारे यहां बीते कई सालों से इस मौसम में बर्ड-फ्लू का शोर होता है और अभी तक किसी इंसान के इससे मारे जाने की खबर मिली नहीं। हां, यह मुर्गी पालन में लगे लोगों के लिए भारी नुकसान होता है।

    यह तो स्पष्ट है कि इसी मौसम में पक्षियों के मरने की वजह हजारो किलोमीटर दूर से जीवन की उम्मीद के साथ आने वाले वे पक्षी होते हैं जिनकी पिछली कई पुष्तें, सदियों इस मौसम में यहां आती थीं। चूंकि ये तो सदियों से आते रहे हैं व उनके साथ नभचरों के मौत का सिलसिला कुछ ही दशकों का है तो जाहिर है कि असली वजह उनके प्राकृतिक पर्यावरण में लगातार हो रही छेड़छाड़ व बहुत कुछ जलवायूु परिवर्तन का असर भी है। यह सभी जानते हैं कि आर्कटिक क्षेत्र और उत्तरी ध्रुव में जब तापमान शून्य से चालीस डिग्री तक नीचे जाने लगता है तो वहां के पक्षी भारत की ओर आ जाते हैं ऐसा हजारों साल से हो रहा है, ये पक्षी किस तरह रास्ता पहचानते हैं, किस तरह हजारों किलोमीटर उड़ कर आते हैं, किस तरह ठीक उसी जगह आते हैं, जहां उनके दादा-परदादा आते थे, विज्ञान के लिए भी अनसुलझी पहेली की तरह है। इन पक्षियों के यहां आने का मुख्य उद्देश्य भोजन की तलाश, तथा गर्मी और सर्दी से बचना होता है। यह संभव है कि उनके इस लंबे सफर में पंखों के साथ कुछ जीवाणु आते हों, लेकिन कोरोना संकट ने बता दिया है कि किस तरह घने जंगलों के जीवों के इंसानी बस्ती के लगातार करीब आने के चलते जानवरों में मिलने वाले वायरस इंसान के शरीर को प्रभावित करने के मुताबिक खुद को ढाल लेते हैं। अभी तो इन पक्षियों के वायरस दूसरे पक्षियों के डीएनए पर हमला करने लायक ताकतवर बने हैं और इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि इनकी ताकत इंसान को नुकसान पहुचाने लायक भी हो जाए। ऐसे में इस बारे में सतर्कता तो रखनी ही होगी।

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    विदित हो मरने वाले पक्ष्यिों की पहले गर्दन लटकने लगी, उनके पंख बेदम हो गए, वे न तो चल पा रहे थे और न ही उड़ पा रहे थे। शरीर शिथिल हुआ और प्राण निकल गए। फिलहाल तो इसे ‘बर्ड-फ्लू ’ कहा जा रहा है लेकिन संभावना है कि जब वहां के पानी व मिट्टी के नमूने की गहन जांच होगी तब असली बीमारी पता चलेगी क्योंकि इस तरह के लक्षण ‘‘एवियन बॉटुलिज़्म ’’ नामक बीमारी के होते है। यह बीमारी क्लोस्ट्रिडियम बॉट्यूलिज्म नाम के बैक्टीरिया की वजह से फैलती है। एवियन बॉटुलिज़्म को 1900 के दशक के बाद से जंगली पक्षियों में मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण माना गया है। यह बीमारी आमतौर पर मांसाहारी पक्षियों को ही होती है। इसके वैक्टेरिया से ग्रस्त मछली खाने या इस बीमारी का शिकार हो कर मारे गए पक्षियों का मांस खाने से इसका विस्तार होता है।

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    संभावना यह भी है कि पानी व हवा में क्षारीयता बढ़ने से तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करने वाली बीमारी ‘हाईपर न्यूट्रिनिया’ से कुछ पक्षी, खासकर प्रवासी पक्षी मारे गए हों। इस बीमारी में पक्षी को भूख नहीं लगती है और इसकी कमजोरी से उनके प्राण निकल जाते हैं। पक्षी के मरते ही जैसे ही उसकी प्रतिरोध क्ष्षमता शून्य हुई, उसके पंख व अन्य स्थानों पर छुपे बैठे कई किस्म के वायरस सक्रिय हो जाते हैं व दूसरे पक्षी इसकी चपेट में आते हैं। इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि दूषित पानी से मरी मछलियों को दूर देश से थके-भूखे आए पक्षियों ने खा लिया हो व उससे एवियन बॉटुलिज़्म के बीज पड़ गए हों। यह सभी जानते हैं कि एवियन बॉटुलिज़्म का प्रकोप तभी होता है जब विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक कारक समवर्ती रूप से होते हैं। इसमें आम तौर पर गर्म पानी के तापमान, एनोक्सिक (ऑक्सीजन से वंचित) की स्थिति और पौधों, शैवाल या अन्य जलचरों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण आदि प्रमुख हैं। यह सर्वविदित है कि धरती का तापमान बढ़ना और जलवायु चक्र में बदलाव से भारत बुरी तरह जूझा रहा है।

    ‘भारत में पक्षियों की स्थिति-2020’ रिपोर्ट के नतीजे बता चुके हैं कि पक्षियों की लगातार घटती संख्या ,नभचरों के लिए ही नहीं धरती पर रहने वाले इंसानों के लिए भी खतरे की घंटी हैं। बीते 25 सालों के दौरान हमारी पक्षी विविधता पर बड़ा हमला हुआ है, कई प्रजाति लुप्त हो गई तो बहुत की संख्या नगण्य पर आ गईं। पक्षियों पर मंडरा रहा यह खतरा शिकार से कही ज्यादा विकास की नई अवधारणा के कारण उपजा है।

    अधिक फसल के लालच में खेतों में डाले गए कीटनाषक, विकास के नाम पर उजाड़े गए उनके पारंपरिक पर्यावास, नैसर्गिक परिवेश की कमी से उनकी प्रजनन क्षमता पर असर; ऐसे ही कई कारण है जिनकेचलते हमारे गली-आंगन में पंक्षियों की चहचहाहट कम होती जा रही है। ऐसे में पक्षियों में व्यापक संक्रामक हमले बेहद चिंताजनक हैं।

    पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील पक्षी उनके प्राकृतिक पर्यावास में अत्यधिक मानव दखल, प्रदूषण, भोजन के अभाव से भी परेशान है। सनद रहे हमारे यहां साल-दर-साल प्रवासी पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। प्रकृति संतुलन और जीवन-चक्र में प्रवासी पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनका इस तरह से मारा जाना असल में अनिष्टकारी है। अब पंक्षियों को रोका या टोका तो जा नहीं सकता, हमें ही अपने पर्यावास, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनो को नैसर्गिक रूप में अक्षुण्ण रखने पर गंभीर होना होगा।

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