- जी के चक्रवर्ती
भारत देश के पांच राज्यों में चुनाव होना है जिसमें से सबसे पहले देश के पश्चिम बंगाल राज्य में चुनाव सम्पन्न होना है। इन चुनावों के मद्देनज़र देश मे बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाले खर्चों को रोकने के लिये एक देश एक चुनाव जैसी अवधारणा जैसी बातें फिर से एक बार जोर पकड़ने लगी है। हमारे देश मे यदि ऐसा होना संभव हो जाये तो चुनावों में होने वाले व्यय की एक बहुत बड़ी धनराशि में कमी लाने में कामयाबी हासिल हो सकती है, लेकिन इसी के साथ ही ईवीएम मशीन द्वारा होने वाले चुनाव में धोखाधड़ी की संभावनाओं से भी इनकार नही किया जा सकता है।
वैसे इससे पहले देश के प्रधानमंत्री ने अनेक मंचों से एक देश एक चुनाव की बात कह चुके हैं। नीति आयोग विधि आयोग एवं अन्य समीक्षा समितियों ने भी देश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया है। देखा जाए तो यह विचार भारत के लिए कोई नयी नहीं है।
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार देश मे पिछले तीस वर्षों के दौरान प्रति वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होता है। इसके अतरिक्त प्रत्येक राज्य में नगर निकाय एवं पंचायतों के भी चुनाव होते ही रहते हैं। जिसके कारण देश में रह-रहकर चुनाव में आचार संहिता के लागू करने की आवश्यकता पड़ती है, वैसे सही कहा जाय तो इसके कारण न केवल प्रशासनिक बल्कि नीतिगत फैसले भी प्रभावित होते रहने से देश की ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों का अनुपयुक्त प्रयोग भी होता रहता है। यदि हम इस तरह के चुनावी खर्चों पर लगाम लगा सकें तो सार्वजनिक धन की बर्बादी को रोक सकतें है। इसके लिये यह नियतांत आवश्यक होगा कि देश मे बार-बार होने वाले इन चुनावों से देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ से जितनी जल्दी हो सके हम मुक्त हो जायें।
इस परिपेक्ष्य में देश की नीति आयोग ने यह भी सुझाव दिया था कि कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में विस्तार एवं कुछ राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती करके एक देश एक चुनाव करने की अवधारणा को साकार करने की दिशा में हम अग्रसर हो सकते हैं, इस तरह के निर्णयों से न केवल चुनावी खर्चों पर लगाम लगेगी, बल्कि सार्वजनिक धन की बर्बादियों को भी रोका जा सकेगा है।
इस तरह के निर्णयों से प्रशासनिक मशीनरियों पर कार्यों का बोझ कम होने से देश मे लागू किये जाने वाले नीतियों के जमीनी धरातल पर क्रियान्वयन के लिए अधिक समय और सुचारू रूप से देखभाल किया जा सकेगा बल्कि केंद्र सरकार का भी ध्यान नीतिगत फैसलों के लेने एवं उनके क्रियान्वयन पर अधिक ध्यान रख सकेगी। इस तरह चुनावों की अवधि के घटाने से कार्यदिवसों की बचत होगी, जिससे राजनीति के अपराधीकरण एवं भ्रष्टाचारों में भी कमी लायी जा सकती है। चुनाव आयोग इस संदर्भ में पहले ही यह कह चुकी है कि हम लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव को एक साथ कराने में सक्षम हैं तो फिर यहां यह प्रश्न उठता है कि आखिर हम इस दिशा में गंभीर प्रयास क्यों नहीं कर रहे हैं?







