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    मजबूत फेफड़े ही जूझ सकते हैं कोविड से

    ShagunBy ShagunMay 9, 2021 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    यदि आईआईटी, कानपुर के शोध और एक अमेरिकी संस्था के आकलन को बतौर चेतावनी लें तो मई महीने में कोरोना का कहर और घातक होगा। उम्मीद तो यही करते हैं कि आने वाले सप्ताह में भारत की सरकारी मशीनरी, आक्सीजन, अस्पताल में बिस्तर जैसी मूलभूत सुविधाओ में सुधार करेगी, लेकिन संक्रमण की गति बहुत तेज होगी। बारिकी से देखें तो हमारे देश में संक्रमण के सहजता से फैलने का करण समाज की लापरवाहियां तो हैं ही जिसमें सोशल डिस्टेंस और मास्क लगाने का पालन नहीं करना और खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही शामिल है। लेकिन हकीकत यह है कि आम भारतीय खासकार श हरों में रहने वालों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत जर्जर है। ना तो उन्हें सांस लेने को स्वच्छ हवा है और ना कंठ को साफ पानी, जिस भोजन को पौष्टिक मान कर षहरवासी खा रहे हैं, असल में वह निहायत जहरीले परिवेश में उगाया जा रहा है। ऐसे में एक तो बाहरी वायरस जल्दी मार करता है दूसरा दवाओं का असर भी अपेक्षाकृत धीरे होता है।

    ‘दुनिया के तीस सबसे दूषित शहरों में भारत के 21 शहर हैं। हमारे यहां सन 2019 में अकेले वायू प्रदुषण से 17 लाख लोग मारे गए। यह किसी से छिपा नहीं है कि कोरोना वायरस जब फैंफडों या स्वांस-तंत्र पर अपना कब्जा जमाता है तो रोगी की मृत्यू की संभावना बढ़ जाती है। जिन शहरों के लोगों को फैंफडे वायू प्रदूषण से जितने कमजोर है, वहां कोविड का कहर उतना ही संहारक है। जान लें कि जैसे-जैसे तापमान बढेगा, दिल्ली एनसीआर में सांस के रोगी भी बढेंगे और इसके साथ ही कोरोना का कहर भी बढ़ेगा।

    जरा बारिकी से गौर करें, जिन शहरों – दिल्ली,मुंबई , प्रयागराज, लखनऊ, इंदौर , भोपाल, पुणे आदि में कोरोना इस बार सबसे घातक है, वहां की वायु गुणवत्ता बीते कई महीनों से गंभीरता की हद से पार है। दिल्ली से सटे गाजियाबाद को बीते तीन सालों से देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में पहले तीन स्थानों पर रहने की शर्मनाम ओहदा मिला है। गत पांच सालों के दौरान दिल्ली के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एम्स में सांस के रोगियों की संख्या 300 गुणा बढ़ गई है। एक अंतर राष्ट्रिय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार हो कर असामयिक मौत के मुंह में जाएंगे। सनद रहे कि आंकड़ों के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर घंटे एक मौत होती है।

    भले ही रास्ते में धुंध के कारण जाम के हालात न हों, भले ही स्माॅग के भय से आम आदमी भयभीत ना हो, लेकिन सूर्य की तपन बढ़ने के साथ ही दिल्ली की सांस ज्यादा अटकती है। एनसीआर में प्रदूशण का स्तर अभी भी उतना ही है जितना कि सर्दियों में धुंध के दौरान हुआ करता था। यही नहीं इस समय की हवा ज्यादा जहरीली व जानलेवा है। देश की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिषत जिम्मेदारी धूल-मिट्टी व हवा में उड्ते मध्यम आकार के धूल कणों की है। दिल्ली में हवा की सेहत को खराब करने में गाड़ियों से निकलने वाले धुंए से 17 फीसदी, पैटकाॅक जैसे पेट्रो-इंधन की 16 प्रतिषत भागीदारी है। इसके अलावा भी कई कारण हैं जैसे कूड़ा जलाना व परागण आदि। जानलें हवा में जहर के ये हालात जैसे दिल्ली-गाजियाबाद के, वैसे ही जयपुर, औरंगाबाद, पटना, प्रयागराज या रांची व रायपुर के हैं।

    हानिकारक गैसों एवं सूक्ष्म कणों से परेशान महानगर वालों के फैंफडों को कुछ महीने हरियाली से उपजे प्रदूषण से भी जूझना पड़ता है। विडंबना है कि परागण से सांस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम के साथ मिल कर करके अधिक जहरीले हो जाते हैं। ये प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैं, एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं।

    एक बात और कि हवा में परागणों के प्रकार और घनत्व का पता लगाने की कोई तकीनीक बनी नहीं है। वैसे तो परागणों के उपजने का महीना मार्च से मई मध्य तक है लेकिन जैसे ही जून-जुलाई में हवा में नमी का स्तर बढ़ता है। तो पराग और जहरीले हो जाते हैं। हमारे रक्त में अवशोषित हो जाते हैं, जिससे एलर्जी पैदा होती है। यह एलर्जी इंसान को गंभीर सांस की बीमारी की तरफ ले जाती है। चूंकि गर्मी में ओजेान लेयर और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है , ऐसे में परागण के शिकार लेागों के फैफडो ज्यादा क्षतिग्रस्त होते हैं। यदि ऐसे में इंसान पर कोरोना का आक्रमण हो जाए तो जल्दी ही उसके फेंफडे संक्रमित हो जाएंगे।

    यह तो सभी जानते हैं कि गरमी के दिनों में दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब के बड़े हिस्से में हवा एक से डेढ़ किलोमीटर ऊपर तक तेज गति से बहती है। इसी लिए मिट्टी के कण और राजस्थान -पाकिस्तान के रास्ते आई रेत लेागों को सांस लेने में बाधक बनती है। मानकों के अनुसार पीएम की मात्रा 100 माईक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर वायू होना चाहिए, लेकिन अभी तो पारा 37 के करीब है और यह खतरनाक पार्टिकल 240 के करीब पहुँच गए हैं। इसका एक बड़ा कारण विकास के नाम पर हो रहे ताबड़तोड़ व अनियोजित निर्माण कार्य भी हैं, जिनसे असीमित धूल तो उड़ ही रही है , यातायात जाम के दिक्कत भी उपज रही है। पीएम ज्यादा होने का अर्थ है कि आंखों में जलन, फैंफडे खराब होना, अस्थमा, और कोविड ।

    यह भी जानना जरूरी है कि वायुमंडल में ओजोन का स्तर 100 एक्यूआई यानि एयर क्वालिटी इंडेक्स होना चाहिए। लेकिन जाम से हलाकांत दिल्ली में यह आंकड़ा 190 तो सामान्य ही रहता है। वाहनों के धुंएं में बड़ी मात्रा में हाईड्रो कार्बन होते हैं और तापमान चालीस के पार होते ही यह हवा में मिल कर ओजोन का निर्माण करने लगते हैं। यह ओजोन इंसान के षरीर, दिल और दिमाग के लिए जानलेवा है । इसके साथ ही वाहनों के उत्सर्जन में 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाले पार्टिकल और गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण फेंफडें बेहद कमजोर हो जाते हैं ।

    वायू प्रदूशण को और खतरनाक स्तर पर ले जाने वाले पैटकाॅन पर रोक के लिए कोई ठोस कदम ना उठाना भी हालात को खराब कर रहा है। साथ ही तेजी से विस्तारित हो रहे षहरों में हरियाली सजाते समय ऐसे पेड़ों से परहेज करना जरूरी है जिनमें परागण बड़े स्तर पर गिरते हैं। इससे बेहतर नीम, पीपल जैसे पारंपरिक पेड़ होते है। जिनकी उम्र भी लंबी होती है और एक बार लगने पर कम रखरखाव मांगते हैं। आने वाले दिन सांसों पर कड़ी निगरानी के हैं और ऐसे में वायू प्रदूशण से जितना बचें, उतना ही कोविड के प्रकोप से बच सकते हैं। सरकार को भी लोगों के स्वषन तंत्र को ताकतवर बनाने के लिए दूरगामी योजनओं पर काम करना होगा, इसका पहला कदम षहरों में भीड़ कम कीरना ही होगा।

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