जी के चक्रवर्ती
16 अगस्त के दिन अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जा करने के बाद से वहां दिन प्रतिदिन एक के बाद एक घटनाये घटित होती चली गई जिसके केंद्र बिंदु में अमेरिका ही रहा है। आज दो सप्ताह से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद आज तक तालिबान अफगानिस्तान में अपनी सरकार बनाने में असफल रहा। इसकी बजह चाहे जो भी हो लेकिन तालिबान को अफगानिस्तान में सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिये और इतने विध्वंश होने के बाद नवनिर्माण करने के लिये उसे प्रचुर मात्रा में धन की आवश्यकता होगी ऐसे में प्रश्न उठता है कि वह धन की व्यवस्था कहाँ से करेगा?

इस वक्त दुनिया को सबसे बड़ी चिंता यह है कि अफगानिस्तान एक मात्र ऐसा मुल्क जहां दुनिया के कई देशों की सांसें अटकी हुई हैं और हो भी क्यों नही अफगानिस्तान पूरे विश्व मे एक एकलौता ऐसा देश है जिसमे अपार खनिज सम्पदाओं का भंडार है। भारत के जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अफगानिस्तान में 60 मिलियन मीट्रिक टन तांबा, 2.2 बिलियन टन लौह अयस्क, 1.4 मिलियन टन दुर्लभ खनिज जैसे लैंटम तथा सेरियम, नियोडिमियम, और एल्युमिनियम, सोना, चांदी, जस्ता, पारा और लिथियम का प्रचुर भंडार मौजूद होने से सम्पूर्ण विश्व का ध्यान बरवश ही अफगानिस्तान की ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक सी बात है।
अफगानिस्तान को एक लंबे समय से सोवियत संघ, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, ईरान, सऊदी अरब, भारत, पाकिस्तान जैसे देशों से उसे लगातार हस्तक्षेप का सामना करना पड़ा है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हमेशा से तनावपूर्ण संबंध किसी से छिपी नही हैं।

अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान के मध्य तनावपूर्ण संबंध जगजाहिर हैं। वर्ष 1947 में पाकिस्तान ने जब अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की, तो संयुक्त राष्ट्र में इसके गठन के खिलाफ मतदान करने वाला एक मात्र देश अफगानिस्तान ही था।
अफ़ग़ानिस्तान से भागे राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी यूएई ही क्यों पहुंचे? इस अरब देश के रिश्ते तालिबान से कैसे हैं?
इस पूरे घटनाक्रम के एक सप्ताह के बाद, सोमवार को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री से फ़ोन पर दोनों के बीच अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर चर्चा हुई थी लेकिन दोनों की तरफ़ से तालिबान पर कुछ भी नहीं कहा गया। ऐसे में यह प्रश्न भी उठता है कि वो सऊदी अरब, जो 1996 में तालिबान के साथ हुआ करता था, आज इतना चुप्पी मारे कियूँ बैठा है?
आखिर में यहां एक और प्रश्न का उठना लाजमी है कि आखिरकार अमेरिका को यहां पर अपने अत्याधुनिक हथियारों के भंडार छोड़ने की क्या मजबूरी थी? या इसे जानबूझ कर छोड़ा है यदि जानबूझ कर छोड़ा है तो निसंदेह इसके पीछे हो न हो कोई गुप्त मानसा रही होगी क्योंकि आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति इतने नादान भी नही हैं की उनके इस कदम से सम्पूर्ण दुनिया दुनिया मे अमेरिका की ओर से क्या संदेश जायेगा व उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? इस बात की उन्हें समझ नही थी।







