खरी – खरी : आलोक बाजपेयी
छह जून 2026 को अमृतसर के मेहता चौक स्थित दमदमी टकसाल के मुख्यालय में आयोजित ऑपरेशन ब्लू स्टार की 42वीं बरसी के कार्यक्रम में महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री और भाजपा नेता गिरीश महाजन के भाषण को लेकर देश की राजनीति में एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. गिरीश महाजन ने ऑपरेशन ब्लू स्टार को ‘काला दिन’ बताया। 6 जून 1984 को “काला दिन” (काळा दिवस) करार देते हुए उन्होंने सैन्य कार्रवाई में मारे गए लोगों को उन्होंने “शहीद और बलिदानी” कहकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की. महाजन ने इसे एक सोची-समझी साजिश बताते हुए कहा कि यह हमारे पवित्र तीर्थ स्थल पर एक “सैन्य हमला” था, जहाँ तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जबरन सेना को भेजा था. उन्होंने इस सैन्य कार्रवाई की तुलना ऐतिहासिक अफगान आक्रमक अहमद शाह अब्दाली द्वारा स्वर्ण मंदिर पर किए गए हमलों से भी कर दी.
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विवाद
गिरीश महाजन किसी भी राज्य सरकार के पहले ऐसे आधिकारिक प्रतिनिधि या मंत्री बने हैं, जिन्होंने दमदमी टकसाल के इस बरसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया. मंच पर जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तस्वीरें भी मौजूद थीं. इस बयान के सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने भाजपा पर तीखे हमले किए हैं. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया है कि भाजपा पंजाब में आगामी चुनावों को देखते हुए और अकाली दल के राजनीतिक शून्य को भरने के लिए सिख भावनाओं को भुनाने का प्रयास कर रही है और देश विरोधी तत्वों की विचारधारा को हवा दे रही है. शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने इस बयान की कड़े शब्दों में निंदा की है. उन्होंने गिरीश महाजन को “देशद्रोही” बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से उन्हें तुरंत कैबिनेट से बर्खास्त करने की मांग की है. विपक्ष का कहना है कि यह बयान देश की अखंडता के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाली भारतीय सेना और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का अपमान है.
तुष्टिकरण की नई सीमा और राष्ट्रीय अखंडता पर मंडराता खतरा
महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री गिरीश महाजन द्वारा अमृतसर में ऑपरेशन ब्लू स्टार को “काला दिन” बताना और उसमें मारे गए लोगों को “शहीद” घोषित करना केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है। यह भारतीय राज्य व्यवस्था, देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बुनियादी सिद्धांतों पर एक आत्मघाती हमला है। जब सत्ताधारी दल का एक जिम्मेदार संवैधानिक प्रतिनिधि उस सैन्य कार्रवाई को ‘कलंक’ कहता है जो देश को टूटने से बचाने के लिए की गई थी, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राजनीतिक लाभ के लिए देश की संप्रभुता की बोली लगाई जा रही है? यह टिप्पणी भारत के भविष्य और आंतरिक सुरक्षा के लिए कई मायनों में बेहद खतरनाक संकेत है। आइये, इसके कुछ और पहलू देखें –
आतंकवाद और अलगाववाद का अनजाने में समर्थन

ऑपरेशन ब्लू स्टार कोई सामान्य पुलिस कार्रवाई नहीं थी। यह स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर भारी हथियारों से लैस जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उसके अलगाववादी समर्थकों के खिलाफ भारतीय सेना का एक अत्यंत कठिन मिशन था, जिन्होंने पवित्र परिसर को एक किले में तब्दील कर दिया था। जब एक सरकारी मंत्री वहां मारे गए लोगों को ‘शहीद’ कहते हैं, तो वे अनजाने में उस उग्रवादी विचारधारा को मान्यता दे रहे होते हैं जिसने देश को बांटने की कोशिश की थी। यह उन अलगाववादी ताकतों को ऑक्सीजन देने जैसा है, जो पंजाब की शांति को दोबारा भंग करना चाहती हैं।
भारतीय सेना के मनोबल और सर्वोच्च बलिदान का अपमान
ऑपरेशन ब्लू स्टार में भारतीय सेना के 80 से अधिक जवानों और अधिकारियों ने देश की एकता को अक्षुण्ण रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। सेना ने यह ऑपरेशन अपने व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि भारत सरकार के आदेश पर राष्ट्रीय सुरक्षा को कायम रखने के लिए किया था। एक जिम्मेदार मंत्री द्वारा इस कार्रवाई की तुलना विदेशी आक्रमणकारी ‘अहमद शाह अब्दाली’ के हमलों से करना देश की सेना की देशभक्ति पर एक गहरा आघात है। यदि राजनीतिक दल अपने संकीर्ण हितों के लिए सेना की ऐतिहासिक कार्रवाइयों को ‘कलंक’ और ‘हमला’ बताने लगेंगे, तो देश की सेना के मनोबल पर इसका विपरीत असर पड़ेगा।
इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की खतरनाक मिसाल
इतिहास गवाह है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यह कठिन फैसला तब लिया था जब बातचीत के सारे रास्ते बंद हो चुके थे। इसे एक “सोची-समझी साजिश” और “अब्दाली जैसा हमला” बताना न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ना है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के सामने एक गलत नैरेटिव (विमर्श) पेश करना है। यह बयान यह संदेश देता है कि भारत सरकार अपनी ही जनता पर बिना किसी ठोस कारण के हमला कर रही थी, जो कि पूरी तरह भ्रामक और खतरनाक है।
सीमा पार बैठे दुश्मनों को रणनीतिक बढ़त
भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान (और उसकी खुफिया एजेंसी ISI) दशकों से पंजाब में खालिस्तानी अलगाववाद को दोबारा जिंदा करने की ताक में रहता है। वैश्विक स्तर पर भी भारत विरोधी तत्व लगातार सक्रिय हैं। जब भारत के भीतर से, वह भी सरकार के एक शीर्ष स्तर से, ऐसी टिप्पणियां आती हैं, तो विदेशी धरती पर बैठे भारत-विरोधी तत्वों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने का एक बड़ा हथियार मिल जाता है। वे इस बयान का उपयोग यह साबित करने के लिए कर सकते हैं कि “भारत के मंत्री खुद मानते हैं कि सरकार ने सिखों पर जुल्म किया था।” कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सक्रिय भारत-विरोधी और खालिस्तानी तत्वों के लिए यह बयान एक बहुत बड़ा “रणनीतिक हथियार” (Strategic Tool) बन गया है। प्रतिबंधित संगठन जैसे ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ) और अन्य विदेशी गुरुद्वारा कमेटियां लंबे समय से वैश्विक मंचों (जैसे संयुक्त राष्ट्र या विदेशी संसदों) में यह दुष्प्रचार करती आई हैं कि “भारत सरकार ने 1984 में अपने ही नागरिकों पर अकारण हमला किया था।” अब वे भारत के ही एक मौजूदा सरकारी मंत्री के बयान को प्रमाण (Evidence) के रूप में पेश करेंगे कि “स्वयं भारत सरकार के प्रतिनिधि इस कार्रवाई को एक बाहरी आक्रमणकारी (अब्दाली) जैसा हमला और कलंक मान रहे हैं।”
कनाडाई या ब्रिटिश राजनेता, जो अक्सर वोट बैंक की राजनीति के कारण खालिस्तानी समर्थकों को संरक्षण देते हैं, अब इस बयान का हवाला देकर भारत के आंतरिक मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठा सकते हैं। इससे भारत के राजनयिकों (Diplomats) के लिए विदेशी धरती पर भारत का पक्ष मजबूत रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा। विदेशों में बैठे कट्टरपंथी इस बयान के वीडियो और खबरों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर सिख युवाओं को भावुक करने और भारत के खिलाफ भड़काने के लिए करेंगे। इससे उनके संगठनों को मिलने वाली फंडिंग (चंदे) में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका इस्तेमाल भारत में अशांति फैलाने के लिए किया जाता है।
पंजाब की आंतरिक सुरक्षा राजनीति पर असर
पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है जिसकी सीमाएं पाकिस्तान से मिलती हैं। वहां सुरक्षा और राजनीति का चोली-दामन का साथ रहा है। इस बयान के राज्य की आंतरिक सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं. जरनैल सिंह भिंडरांवाले की तस्वीर के सामने खड़े होकर मुख्यधारा के एक राष्ट्रीय दल के मंत्री द्वारा ऐसी बातें कहना उग्रवादी विचारधारा को सामाजिक और राजनीतिक रूप से स्वीकार्य (Mainstream) बना देता है। जब राज्य व्यवस्था खुद झुकती नजर आती है, तो स्लीपर सेल्स और भूमिगत अपराधियों (Gangsters) का हौसला बढ़ता है, जो पंजाब में पिछले कुछ समय से ‘गैंगस्टर-कट्टरपंथी गठजोड़’ के रूप में उभर रहे हैं। हाल के वर्षों में ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह (जो वर्तमान में जेल में है) जैसे लोगों ने जिस अलगाववादी भावना को दोबारा हवा देने की कोशिश की थी, उसे इस तरह के बयानों से वैचारिक मजबूती मिलती है। जेलों या गुपचुप तरीके से काम कर रहे असामाजिक तत्वों को यह संदेश जाता है कि राजनीतिक दल अंततः उनके एजेंडे के सामने घुटने टेकने को तैयार हैं। पंजाब पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां (IB, NIA) दिन-रात सीमा पार से आने वाले ड्रोनों, टिफिन बमों और हथियारों की तस्करी को रोकने के लिए काम करती हैं। जब राजनीतिक नेतृत्व उग्रवाद के इतिहास को ‘बलिदान’ का दर्जा देने लगता है, तो जमीन पर काम कर रहे सुरक्षाकर्मियों का मनोबल टूटता है। उन्हें लगता है कि उनकी जान जोखिम में डालकर की गई सुरक्षा कार्यवाईयाँ भविष्य में राजनीतिक सौदेबाजी की भेंट चढ़ सकती हैं। पंजाब ने उग्रवाद के दौर में गहरा हिंदू-सिख विभाजन देखा था, जिसे दशकों की कोशिशों के बाद पाटकर ‘भाईचारे’ में बदला गया। चुनावी फायदे के लिए 1984 के जख्मों को इस तरह से कुरेदना राज्य में दोबारा सांप्रदायिक तनाव या ध्रुवीकरण को जन्म दे सकता है, जो कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI का पुराना सपना रहा है।
सत्तारूढ़ दल की चुप्पी और प्रतिक्रिया के स्वरूप
भाजपा ने खुद को इस बयान से आधिकारिक तौर पर अलग रखा है, लेकिन मंत्री गिरीश महाजन के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नहीं की है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से अभी तक इस बयान पर कोई आधिकारिक खंडन, समर्थन या बड़ी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। विपक्ष (जैसे कांग्रेस और शिवसेना-यूबीटी) द्वारा महाजन को कैबिनेट से बर्खास्त करने की लगातार की जा रही मांग के बावजूद सरकार ने इसे एक ‘निजी’ या ‘स्थानीय संदर्भ’ का बयान मानकर ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की है। पंजाब में जमीन तलाश रही भाजपा इकाई ने इस बयान का खुलकर विरोध नहीं किया है। पंजाब भाजपा के कुछ स्थानीय नेताओं का मानना है कि सिखों की धार्मिक भावनाओं (विशेषकर 1984 के जख्मों) के प्रति सहानुभूति दिखाना राज्य में उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए जरूरी है। यह चुप्पी भाजपा के अपने मूल वैचारिक सिद्धांतों के विरोधाभास को उजागर करती है। एक तरफ पार्टी राष्ट्रवाद, आतंकवाद पर ‘जीरो टॉलरेंस’ और सेना के सम्मान को सर्वोपरि रखती है; वहीं दूसरी तरफ, सेना की ही एक ऐतिहासिक कार्रवाई को ‘कलंक’ बताने वाले अपने मंत्री पर कार्रवाई न करना पार्टी के दोहरे मापदंड को दिखाता है, जैसा कि विपक्षी दलों ने आरोप भी लगाया है. शीर्ष नेतृत्व की यह चुप्पी देश के अन्य मंत्रियों और नेताओं को यह संदेश देती है कि चुनावी लाभ के लिए संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों या देशविरोधी आंदोलनों के इतिहास के साथ “वैचारिक समझौता” किया जा सकता है। यह ढील आने वाले समय में अन्य राज्यों (जैसे कश्मीर या पूर्वोत्तर) में भी सुरक्षा बलों द्वारा की गई आतंकवाद-विरोधी कार्रवाइयों पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे सकती है।
लोकतंत्र में विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता की हो, तो लक्ष्मण रेखा तय होनी चाहिए। गिरीश महाजन का बयान भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता पर एक बड़ा सवालिया निशान है। सरकार और पार्टी नेतृत्व को ऐसी प्रवृत्तियों पर सख्त लगाम लगानी चाहिए। भारत एक बेहद नाजुक भू-राजनीतिक परिवेश से गुजर रहा है; ऐसे में चुनावी फायदे के लिए आंतरिक सुरक्षा की नींव में बारूद बिछाना देश के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ होगा।
- (लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं)







