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    समाज में बढ़ रही अराजकता का जिम्मेदार कौन?

    ShagunBy ShagunJune 25, 2026 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    Who is responsible for the growing anarchy in society
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    आज हमारे भीतर वह नैतिक साहस क्यों नहीं बचा कि हम डंके की चोट पर बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कह सकें? जैसे ही समाज में कोई घटना घटती है, हमारी आंखें सबसे पहले जाति, धर्म और राजनीति का चश्मा ढूंढने लगती हैं ताकि हम यह तय कर सकें कि हमें इस पर दुखी होना है या खुश होना है…

    राहुल कुमार गुप्ता

    सोशल मीडिया के उन सभी प्लेटफार्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर वाट्सअप आदि में ज़ब हम समाज के आईने से देखने की कोशिश करते हैं तो वहां एक बेहद डरावनी और गहरी दरार दिखाई देती है। यह दरार हमारी सोच, हमारी संवेदना और हमारी बुनियादी इंसानियत के बीच खिंच चुकी है। आज के डिजिटल दौर में जब हम किसी पोस्ट को लाइक, शेयर या उस पर कमेंट करते हैं, तो अक्सर हमारी उंगलियां हमारी आत्मा से नहीं, बल्कि हमारी जाति, हमारे धर्म या हमारी राजनीतिक निष्ठा से संचालित होती हैं। यह कड़वी सच्चाई हमारे सामने रोज आती है कि आज अच्छे को अच्छा और सच्चे को सच्चा कहने वाले लोग केवल वही हैं जो उस व्यक्ति की जाति के हैं, उसके मजहब के हैं या उसके राजनीतिक दल के हैं। शेष समाज के लिए उस सामने वाले व्यक्ति की अच्छाई, उसकी मानवता, उसका देशप्रेम या उसका सर्वोच्च बलिदान कोई मायने ही नहीं रखता। ऐसा लगता है कि जैसे हमने सच और झूठ का फैसला करने का हक भी अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से बांट लिया है। यह स्थिति इतनी भयावह है कि जहां पूरी मानवता को एक सुर में रोना चाहिए था, जहां देश की सामूहिक चेतना को जागना चाहिए था, वहां भी हम पूरी तरह बंटे हुए नजर आते हैं।Who is responsible for the growing anarchy in society

    जब किसी मासूम बच्ची या बेकसूर बेटी के साथ कोई जघन्य अपराध होता है, तो कायनात को कांप जाना चाहिए, लेकिन सोशल मीडिया पर आक्रोश की लहरें भी पहचान पत्र देखकर उठती हैं। यदि पीड़ित किसी खास जाति या धर्म से है, तो केवल उसी वर्ग के लोग डिजिटल सड़कों पर मोमबत्तियां जलाते और न्याय की मांग करते दिखेंगे, जैसे कि वह बेटी सिर्फ उनकी थी, पूरे देश की नहीं। कुछ समय पहले की ही तो बात है, जब एक मासूम के साथ हुई दरिंदगी पर आधा देश चुप रहा और आधा देश सिर्फ इसलिए चिल्लाया क्योंकि पीड़ित उनके मजहब का था। इसके विपरीत, जब किसी दूसरी जगह वैसी ही घटना घटी, तो चिल्लाने वाले चुप हो गए और चुप रहने वाले अचानक सड़कों पर उतर आए। क्या किसी मासूम की चीख की भी कोई जाति होती है? क्या किसी अपराधी के खंजर का कोई धर्म होता है? लेकिन हमारी संकीर्णता यहीं नहीं रुकती। यह तो केवल सिक्के का एक पहलू है, जहां हम पीड़ितों को अपनी जाति का न पाकर मुंह फेर लेते हैं। इस बीमारी का इससे भी अधिक घातक और दुखद पहलू वह है जब हम अपने ही वर्ग, अपनी ही जाति या अपने ही राजनीतिक दल के किसी खूंखार अपराधी, बलात्कारी या भ्रष्टाचारी के समर्थन में ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं।Who is responsible for the growing anarchy in society

    आज सोशल मीडिया पर ऐसे अनगिनत वायरल उदाहरण तैर रहे हैं जहां किसी बड़े अपराध में पकड़े गए नेता या अपराधी की गिरफ्तारी पर उसकी जाति के लोग थानों का घेराव करते हैं, उसके समर्थन में रैलियां निकालते हैं और उसे मसीहा साबित करने के लिए पोस्ट पर पोस्ट शेयर करते हैं। जब किसी राजनीतिक दल का कोई रसूखदार व्यक्ति किसी संगीन जुर्म में फंसता है, तो उस दल के समर्थक न्याय प्रणाली पर सवाल उठाने लगते हैं, पीड़िता के चरित्र पर कीचड़ उछालने लगते हैं और अपने उस ‘अपराधी भाई’ के लिए सहानुभूति की लहर पैदा करने की कोशिश करते हैं। यह बदलाव एक सभ्य कहे जाने वाले मानवीय समाज की जड़ों में तेजाब डालने जैसा है। हम उस दौर में जी रहे हैं जहां अपराध की निंदा करने से पहले अपराधी का सरनेम देखा जाता है। अगर वह अपनी बिरादरी का है, तो उसके जघन्य से जघन्य अपराध को भी ‘साजिश’ का नाम देकर सही ठहराने की कुत्सित कोशिशें शुरू हो जाती हैं।

    इस वैचारिक अंधाधुंध दौड़ में हम यह पूरी तरह भूल चुके हैं कि दुनिया के तमाम धर्मों और मजहबों का अंतिम सार क्या था। क्या किसी भी धर्म ने क्रूरता का समर्थन करना सिखाया है? हर ग्रंथ, हर संत और हर पैगंबर ने मानवता, अच्छाई, संवेदनशीलता, प्रेम, दया और करुणा की विस्तीर्णता को ही जीवन का परम सत्य बताया है। फिर ऐसा क्या हुआ कि हम इस विशाल समुद्र को छोड़कर संकीर्णता के गंदे नालों की तरफ मुड़ गए? आज हमारे भीतर वह नैतिक साहस क्यों नहीं बचा कि हम डंके की चोट पर बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कह सकें? जैसे ही समाज में कोई घटना घटती है, हमारी आंखें सबसे पहले जाति, धर्म और राजनीति का चश्मा ढूंढने लगती हैं ताकि हम यह तय कर सकें कि हमें इस पर दुखी होना है या खुश होना है, इसका विरोध करना है या समर्थन करना है। इस चश्मे ने हमारी आंखों की रोशनी ही नहीं छीनी, बल्कि हमारे दिलों को भी बंजर बना दिया है।

    जब हम समाज में इस तरह बुराइयों को सिर्फ इसलिए संरक्षण देने लगते हैं क्योंकि वह बुराई हमारी अपनी चौखट से निकली है, और जब हम अच्छाई को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर देते हैं क्योंकि वह विरोधी पाले से आई है, तो हम एक स्वस्थ और सुंदर समाज की परिकल्पना कैसे कर सकते हैं? एक ऐसा समाज जहां न्याय केवल बहुसंख्यकों या ताकतवरों की बपौती बन जाए, जहां सच बोलने वाले को पहले अपनी जाति साबित करनी पड़े, वह समाज कभी फल-फूल नहीं सकता। हम अनजाने में या शायद बहुत सचेत होकर अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहद खतरनाक, नफरत भरी और भययुक्त दुनिया का निर्माण कर रहे हैं। हम अपने बच्चों को विरासत में एक ऐसा वातावरण दे रहे हैं जहां वे हर अजनबी को शक की निगाह से देखेंगे, जहां वे किसी की मदद करने से पहले उसका मजहब पूछेंगे। हम इस आत्मघाती राह पर बहुत तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम इस पतन को ही अपनी वैचारिक प्रगति मान बैठे हैं।

    हालांकि, इस घने अंधेरे में भी इंसानियत के कुछ बीज अभी बचे हुए हैं जो यदा-कदा अंकुरित होकर उम्मीद जगा देते हैं। हमें सोशल मीडिया के उसी दलदल में कुछ ऐसे वायरल वीडियो और कहानियां भी दिख जाती हैं, जहां एक हिंदू डॉक्टर अपनी जान जोखिम में डालकर किसी मुस्लिम मरीज की जान बचाता है, या कोई मुस्लिम परिवार किसी अनाथ हिंदू बच्ची का कन्यादान पूरी आस्था के साथ करता है। जब बाढ़ या किसी प्राकृतिक आपदा में सेना का जवान बिना किसी का धर्म पूछे उसे मौत के मुंह से खींच लाता है, तो वह दृश्य हमारी सोई हुई सामूहिक चेतना को एक हल्का सा झटका जरूर देता है। लेकिन ये उदाहरण अब महज अपवाद बनकर रह गए हैं। मुख्यधारा की सोच अभी भी उसी संकीर्णता की जंजीरों में जकड़ी हुई है।

    अगर हमें वास्तव में अपनी आने वाली नस्लों को एक सुरक्षित और संवेदनशील दुनिया सौंपनी है, तो हमें सोशल मीडिया के इस आभासी और जहरीले जाल से बाहर निकलना होगा। हमें अपने भीतर के उस साहस को फिर से जिंदा करना होगा जो बिना किसी डर या पक्षपात के गलत के खिलाफ खड़ा हो सके। जब तक हम अपराधी को सिर्फ अपराधी और पीड़ित को सिर्फ इंसान नहीं मानेंगे, तब तक न्याय की हर गुहार अधूरी रहेगी। अब हमें इन संकीर्ण दीवारों को ढहाना पड़ेगा और अपनी सामूहिक चेतना को वापस पाना होगा, क्योंकि अगर आज हम चुप रहे या अपनी सुविधानुसार चिल्लाए, तो कल जब हमारे अपने घर में आग लगेगी, तो उस आग को बुझाने के लिए कोई इंसान नहीं बचेगा, सिर्फ जाति और धर्म के मूकदर्शक बचेंगे।

    Shagun

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