जौनपुर में सियासी उबाल, कृपा शंकर सिंह ने सांसद बाबू सिंह कुशवाहा को कहे अपशब्द, बाहुबली धनंजय सिंह ने दी कड़ी सीख
विशेष संवाददाता
उत्तर प्रदेश की सियासत हमेशा से ही अपने भीतर कई करवटें, हैरान करने वाले घटनाक्रम और अप्रत्याशित गठबंधन समेटे रहती है। हाल ही में जौनपुर की पावन धरती पर जो कुछ घटा, उसने न सिर्फ पूर्वांचल बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीतिक सरगर्मी को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। टीडी कॉलेज के पुरातन छात्र सम्मेलन के मंच से उपजा यह विवाद केवल दो नेताओं की जुबानी जंग नहीं है, बल्कि यह राजनीति में मर्यादा, शुचिता और सकारात्मकता बनाम नकारात्मकता का एक जीवंत दस्तावेज बन गया है।
इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा साल 2019 के आम चुनावों से ही लिखी जाने लगी थी, जब महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री और एक दौर में कांग्रेस के बड़े धनकुबेर चेहरा रहे कृपा शंकर सिंह ने सत्ता की बयार को भांपते हुए भाजपा का दामन थामा था। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में जब उन्हें जौनपुर से टिकट मिला, तो उन्हें पक्का यकीन हो गया कि अब तो वो जीत ही गए। लेकिन फिर भी अपनी जीत को और पुख्ता करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति भी अपना हर मुमकिन कोशिशें की गईं। क्षेत्र में यह चर्चा आम थी कि कूटनीति के तहत जौनपुर के लोकप्रिय और बाहुबली पूर्व सांसद धनंजय सिंह को चुनावी रेस से बाहर करने की पूरी पटकथा लिखी गई, ताकि राह निष्कंटक हो सके। पैसे को पानी की तरह भी बहाया गया, यहाँ तक कि मतदान के बाद ईवीएम से भरे ट्रक के स्ट्रांग रूम परिसर में घुसने जैसी घटनाओं ने लोकतंत्र के सजग प्रहरियों को झकझोर कर रख दिया। तब बाबू सिंह कुशवाहा के समर्थकों और तत्कालीन प्रशासन के बीच का गतिरोध इस बात का गवाह बना कि सत्ता पक्ष किसी भी कीमत पर यह सीट जीतना चाहता था।
लेकिन भारतीय लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि जब-जब धनबल और बाहुबल का अहंकार अति पर होता है, जनता अपनी खामोश ताकत से उसका जवाब देती है। जौनपुर की जनता ने तमाम प्रलोभनों और दबावों को दरकिनार करते हुए पिछड़ों, वंचितों और शोषितों के हक की आवाज बुलंद करने वाले बाबू सिंह कुशवाहा को अपना नायक चुना। चुनाव हारने के बाद पराजित खेमे में एक उम्मीद थी कि बाबू सिंह कुशवाहा बाहरी हैं, बांदा से ताल्लुक रखते हैं और अपनी नई पार्टी के समीकरणों में उलझे रहेंगे, जिससे वे जौनपुर को समय नहीं दे पाएंगे। यह माना गया कि समय बीतने के साथ जनता का मोहभंग होगा और अगली बार का रास्ता साफ हो जाएगा।

परंतु, बाबू सिंह कुशवाहा एक सधे हुए कर्मयोगी निकले। उन्होंने इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। एक सच्चे जननायक की तरह उन्होंने जौनपुर को ही अपना घर बना लिया। वे समय-समय पर क्षेत्र के आम नागरिकों के बीच उपस्थित रहकर उनकी मूलभूत समस्याओं का समाधान करने लगे। विकास के वे कार्य जो दशकों से अधर में लटके थे, धरातल पर दिखने लगे। दुख-सुख में हर नागरिक के साथ खड़े रहने वाले कुशवाहा ने जौनपुर के दिलों में वह जगह बना ली, जो दशकों के स्थापित नेताओं को नसीब नहीं होती। इसके साथ ही, समाजवादी पार्टी की मजबूती के लिए पूरे उत्तर प्रदेश में ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की एक अभेद्य लहर तैयार करने में भी वे जुट गए हैं।
यही वह कर्मठता है जिसने विपक्षियों के सारे गणित बिगाड़ दिए और इसी हताशा का प्रकटीकरण टीडी कॉलेज के मंच पर हुआ। जब कृपा शंकर सिंह ने भोजपुरी में हार के दर्द को मजाकिया लहजे में बयां करते हुए वर्तमान सांसद बाबू सिंह कुशवाहा को अपशब्द कहा, तो उन्होंने अंजाने में लोकतंत्र की उस मर्यादा को लांघ दिया जिसे जौनपुर का समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन इस पूरी कहानी में असली मोड़ तब आया जब पूर्व सांसद धनंजय सिंह मंच पर आए। उन्होंने दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर, अपनी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को किनारे रखकर कृपा शंकर सिंह के इस नकारात्मक और अमर्यादित बयान का कड़ा खंडन किया। धनंजय सिंह ने साफ शब्दों में कहा कि जो जीत गया वह जनता का प्रतिनिधि है, उसे अपशब्द बोलना मतलब जौनपुर के 18 लाख मतदाताओं को अपशब्द बोलना है। वे पूरे जौनपुर संसदीय क्षेत्र के लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। सांसद की अपनी एक गरिमा होती है, एक मर्यादा होती है, जिसका सम्मान हर हाल में किया जाना चाहिए।
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धनंजय सिंह का यह रुख उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए और सकारात्मक युग का संकेत है। यह याद दिलाता है कि अतीत में भी भारतीय राजनीति में मतभेद होने के बावजूद मर्यादाएं कभी नहीं लांघी जाती थीं, ठीक वैसे ही जैसे संसद में अटल बिहारी वाजपेयी और जवाहरलाल नेहरू के बीच तीखी बहसें तो होती थीं, लेकिन एक-दूसरे के प्रति सम्मान कभी कम नहीं होता था। आज की नफरती और व्यक्तिगत आक्षेपों से भरी सियासत के बीच धनंजय सिंह द्वारा बाबू सिंह कुशवाहा के पक्ष में बात रखना जौनपुर की राजनीति को एक नई और परिपक्व दिशा दे गया है।
बाबू सिंह कुशवाहा का बेदाग और मददगार व्यक्तित्व ही है कि आज भी विभिन्न दलों के कई दिग्गज नेता उनके लगातार संपर्क में रहते हैं। बसपा सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री के रूप में भी वो सबके सहयोगी ही रहे। राजनीति में सकारात्मकता की राह में आगे बढ़ने वाले कुछ विरले नेताओं में बाबू सिंह कुशवाहा जी का नाम भी शुमार है। वे शुचिता और आदर्शों की राजनीति के संवाहक हैं। जौनपुर का यह सियासी पारा केवल एक चुनावी हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि जनता अब केवल बड़े नामों या पैसों के प्रभाव में नहीं आती, वह सेवा भाव और कर्मठता को पूजती है। पूर्वांचल की माटी से उठी मर्यादा की यह गूंज निश्चित रूप से आगामी मिशन 2027 के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए, सकारात्मक और समावेशी बदलाव की मजबूत बुनियाद तैयार कर रही है, जहां नफरत की सियासत के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।







