लखनऊ में हुई चर्चा में बोले राम कथा वाचक धीरेन्द्र वशिष्ठ – “समाज मनुष्य को भ्रष्ट बना रहा है”
लखनऊ, 13 जुलाई। संयुक्त परिवार की ममता अब इतिहास होती जा रही है। एकल परिवारों में सदस्यों को संबल देने वाले रिश्ते तेजी से टूट रहे हैं, निपट रहे हैं और अकेलापन सिसक रहा है। तनाव और अवसाद की चपेट में आ रहे लोग इस बदलाव की भारी कीमत चुकाने को मजबूर हैं।ये चिंताजनक तस्वीर अवध फाउंडेशन द्वारा जानकीपुरम स्थित कार्यालय सभागार में आयोजित संगोष्ठी में उभरी। विषय था- ‘पारिवारिक और सामाजिक संबंधों का वर्तमान स्वरूप’।
मुख्य अतिथि का आह्वान
राम कथा वाचक धीरेन्द्र वशिष्ठ ने कहा, “मनुष्य अबोध बालक के रूप में सरल और सीधा जन्म लेता है, लेकिन समाज संपत्ति, लालच और ऊंच-नीच की भावना से उसे भ्रष्ट बना देता है। स्वतंत्र पैदा होने वाला इंसान हर तरफ जंजीरों में जकड़ा नजर आता है।”
सतयुग से कलियुग तक पतन
संस्था के अध्यक्ष सूरजदेव शुक्ल ने स्वागत करते हुए कहा कि सतयुग से कलियुग तक पारिवारिक संबंधों का निरंतर पतन हुआ है। अब इसे सुधारने की सख्त जरूरत है।
कार्यक्रम की शुरुआत
दीप प्रज्ज्वलन के बाद बीना मिश्रा के शिष्यों अराध्या, अद्वैत, साक्षी और रचित मिश्रा ने श्रीराम स्तुति व हनुमान चालीसा का पाठ कर माहौल को पवित्र बनाया। कार्यक्रम का संचालन रामप्रकाश त्रिपाठी ने किया।
अन्य प्रमुख विचार
- डॉ. काशीनाथ पांडेय ने कहा कि परिवार के बिना बच्चे की शिक्षा, ज्ञान और विकास संभव नहीं। प्राचीन भारतीय संस्कृति कर्तव्य सिखाती थी, जबकि पाश्चात्य संस्कृति केवल अधिकार सिखा रही है, जो पतन का मुख्य कारण है।
- बीना मिश्रा ने रामायण के चरित्रों के माध्यम से परिवार की अहमियत को काव्य रूप में प्रस्तुत किया।
- बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने परिवार को समाज और देश की बुनियादी इकाई बताया।
इनकी रही उपस्थिति
शिक्षाविदों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और युवाओं की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही। आरडी शुक्ला, शिवकुमार पांडेय, आरसी त्रिपाठी, जानकी शरण शुक्ला, प्रणव दत्ता, प्रकाश चंद्र शर्मा, राकेश तिवारी समेत कई गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार रखे।
संगोष्ठी ने एक बार फिर याद दिलाया कि रिश्तों की मरम्मत के बिना न तो परिवार बच सकता है और न ही स्वस्थ समाज।







