पिछले साल जून में ईरान और इजराइल के बीच छिड़े संक्षिप्त लेकिन तीव्र युद्ध के बाद, जिसमें अमेरिका ने भी सीधे हस्तक्षेप किया था, ऐसा लग रहा था कि मध्य पूर्व में तनाव कुछ समय के लिए शांत हो जाएगा। लेकिन फरवरी 2026 आते-आते स्थिति फिर से बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी है परमाणु कार्यक्रम पर नई डील के लिए 10-15 दिनों का अल्टीमेटम, वरना “बहुत बुरे हालात” होंगे। ट्रंप ने कहा है कि यह समय काफी है, और अगर ईरान नहीं माना तो “really bad things” होंगे।
ट्रंप को अपनी सैन्य ताकत पर पूरा यकीन है। जनवरी में वेनेजुएला में मादुरो शासन के खिलाफ सफल कार्रवाई ने उन्हें और मजबूत किया है। दूसरी तरफ, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई भी पीछे नहीं हट रहे। ईरान ने अमेरिकी हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की धमकी दी है, जिसमें क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाना शामिल है।
मध्य पूर्व की राजनीति में इजराइल अमेरिका का सबसे मजबूत सहयोगी बना हुआ है। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने इजराइल पर हमला किया तो यह ईरान के इतिहास की सबसे बड़ी गलती होगी, और जवाब इतना जबरदस्त होगा कि कल्पना भी नहीं की जा सकती। अमेरिका ने क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा सैन्य जमावड़ा किया है – दो एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप्स (USS Gerald R. Ford सहित), दर्जनों फाइटर जेट्स, टैंकर और अन्य जहाज – 2003 के इराक युद्ध के बाद का सबसे बड़ा।
ईरान की तरफ से भी तैयारी जोरों पर है। ईरान ने अपनी एयर डिफेंस और मिसाइल साइट्स को मजबूत किया है, और रूस के साथ संयुक्त नौसैनिक अभ्यास किए हैं। हालांकि, घरेलू मोर्चे पर ईरान कमजोर दिख रहा है। जनवरी-फरवरी में विरोध प्रदर्शनों में हजारों लोग मारे गए, इंटरनेट बंद कर दिया गया, लेकिन असंतोष अभी भी सुलग रहा है। ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों की हत्या पर भी हमले की धमकी दी है।
क्षेत्रीय समर्थन की बात करें तो सऊदी अरब जैसे पुराने अमेरिकी सहयोगी अब हिचक रहे हैं। इजराइल की आक्रामकता से वे सतर्क हैं और स्पष्ट पक्ष नहीं ले रहे। ईरान को कुछ हद तक क्षेत्रीय देशों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन मनोवैज्ञानिक युद्ध दोनों तरफ से तेज है।
ट्रंप के लिए यह प्रतिष्ठा का मामला बन चुका है परमाणु संवर्धन को पूरी तरह रोकना, और ईरान को झुकाना। ईरान इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मान रहा है। जेनेवा में अप्रत्यक्ष बातचीत चल रही है, जहां ओमान मध्यस्थ है, लेकिन दोनों पक्षों की मांगें बहुत दूर हैं। अमेरिका “शून्य संवर्धन” चाहता है, जबकि ईरान दबाव में आने को तैयार नहीं।
अगर टकराव बढ़ा तो भारत के लिए बड़ी दुविधा होगी। ईरान से तेल आयात, चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक संबंध, और अमेरिका के साथ मजबूत गठजोड़ संतुलन बनाना मुश्किल होगा। तेल की कीमतें पहले ही बढ़ रही हैं, और युद्ध हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ेगा।
फिलहाल वार्ता का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन घड़ी तेजी से चल रही है। अगर डिप्लोमेसी कामयाब नहीं हुई, तो मध्य पूर्व में फिर से जंग की आहट सुनाई दे सकती है और इस बार यह और विनाशकारी हो सकती है। दुनिया की नजरें अगले कुछ दिनों पर टिकी हैं।







