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    Home»धर्म»Spirituality

    गंगा जमुनी की तहजीब है जेठ माह का भंडारा, भगवान बजरंगबली जी की बरसती है विशेषकृपा

    ShagunBy ShagunMay 8, 2023 Spirituality No Comments8 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    दोस्तों नमस्कार, जय बजरंगबली, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब की तमाम एतिहासिक मिसालें हैं। इसमें बड़े मंगल के भंडारे का इतिहास भी हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की एक अटूट मिसाल है। यहां अलीगंज स्थित हनुमान मंदिर में बड़े मंगल के भंडारे की शुरुआत लखनऊ के मुस्लिम बादशाह ने की थी। इससे प्रभावित कई मुसलमान अपने हिंदू भाइयों के साथ हर वर्ष भंडारे का आयोजन करते रहे हैं।

    जेठ माह के दिन आने के साथ ही लखनऊ के अलीगंज में हनुमान जयंती अर्थात बड़ा मंगल 9 मई से मनाये जाने की इस बार जोरदार तैयारियां है लोगों में भगवान बजरंगबली के प्रति जबरदस्त उत्साह है और लोग प्राचीन दरबार में माथा टेकने के लिए बेकरार है अलीगंज में बजरंग बली के दो मंदिर है जिसमे से एक पुराने और एक नए मंदिर है। आपको यह जानकर बहुत आश्चर्य होगा की हनुमान मंदिर को किसी हिन्दू ने नहीं वल्कि इसे एक मुस्लिम महिला द्वारा बनवाया गया था।

    कभी लक्ष्मणपुर कहलाने वाली इस नगरी का नाम अंग्रजी शासन काल के दौरान नवीन नाम लखनऊ से जाना जाने जाता था। यहाँ पर से प्रवाहित होने वाली नदी गोमती नदी है। गोमती नदी के उस पार का इलाका यानि की आज का चौक में 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ काल में नवाब शुजाउद्दौला की पत्नी या नवाब वाजिद अली शाह की दादी तथा दिल्ली के मुगलिया खानदान की बेटी आलिया बेगम द्वारा अलीगंज मोहल्ले में एक हनुमान मंदिर है बनवाया गया था उस मंदिर में ज्येष्ठ मास के प्रत्येक मंगलवार को मुख्यत: हिन्दुओं, एवं प्रत्येक जाती धर्मों के लोगों की ओर से श्रद्धा पूर्वक मनौतियां मानी जाती है, एवं मनौतियां के पूर्ण होने पर आज भी लोगों द्वारा मनचाहा चढ़ावा चढ़ाया जाता है एवं मंदिर के पुजारी द्वारा उन्हें प्रसाद दिया जाता है।

    हनुमान जी के इस मंदिर का महत्व एवं मान्यता इतनी ज्यादा है कि लखनऊ में ही नहीं, दूर-दूर तक से लोग जहां भी हनुमान जी का कोई नये मंदिर की स्थापना की जाती है तो वहां की मूर्ति के लिये पोशाक, सिंदूर, लंगोटा, घण्टा और छत्र आदि इस मंदिर से बिना मूल्य के दिये जाते है एवं यहाँ से प्राप्त सभी वस्तुओं से जब वहां की मूर्ति स्थापना की जाती है तभी से उसे प्रमाणित मानी जाती है।

    कहते है, जब अयोध्या लौटने के पश्चात् जब श्री रामचन्द्र जी द्वारा सीता जी को त्यागने का निश्चय किया गया था उस वक्त सीता मैया को श्री लक्ष्मण जी श्री हनुमान जी ने अपने साथ ले कानपुर जिले के बिठूर, जहाँ पर वाल्मीकि ऋषि का आश्रम ले जाकर उन्हें छोड़ना था, उस वक्त आज वर्तमान के अलीगंज के पास आते-आते काफी रात का अंधेरा छाने लगा था, साथ ही उन सभी को रात्रि विश्राम करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। अत: वे तीनों रास्ते में यही पर सोच-विचार के लिये रूक गये। जिस स्थान पर वे रूके थे, वहाँ वर्त्तमान समय में हीवेट पॉलीटेक्निक की बगल से पुराने अलीगंज-मन्दिर को जाने वाली सड़क के मध्य एक बड़ा सा बाग हुआ करता था। यद्यपि लक्ष्मण जी ऐसा चाहते थे कि कुछ दूर और आगे चलकर गोमती के उस पार (शहर की ओर) बनी अयोध्या राज्य की चौकी में विश्राम करें, जिस स्थान को बाद में लक्ष्मण टीला के नाम से जान जाने लगा, किन्तु सीता जी अब पुंनः किसी भी राजभवन में पैर रखने को तैयार नही थीं। फलत: लक्ष्मणजी स्वमं उस चौकी अर्थात अपने महल को चले गये एवं सीता जी उसी बाग में रूक गयीं, जहां पर हनुमान जी रात भर उनका पहरा देते रहे। बाद में दूसरे दिन में वह सभी लोग वहाँ से बिठूर के लिये प्रस्थान कर दिए।

    कालान्तर में उसी बाग में एक मन्दिर बन गया, जिसमें हनुमान जी की मूर्ति स्थापित थी और उस बाग को हनुमान बाड़ी के नाम से पुकारा जाने लगा। यह मन्दिर उस वक्त से शताब्दियों तक बना रहा लकिन 14वीं शताब्दी के आरम्भ में बख्तियार खिलजी ने इसका नाम बदल कर इस्लामबाड़ी रख दिया था। इसके बहुत दिनों के पश्चात् (सन् 1792 से सन 1802 के बीच) अवध के तत्कालीन नवाब मुहम्मद अली शाह की बेगम रबिया के जब अनेक वर्षो तक कोई भी संतान उतपन्न नहीं हुई तो उन्होंने बहुत से हकीम-वैद्यों की दवाइयों और पीर-फकीरों की दुआओं ने भी उन्हें जब संतान की प्रप्ति नहीं हुई तो कुछ लोगों ने उन्हें इस्लामाबाड़ी की बाबा के पास जाकर दुआ माँगने की सलाह दी। कहते हैं कि वे इस्लामाबाड़ी गई और सन्तान की उनकी अभिलाषा पूरी हुई।

    ऐसी किंवदन्ती है कि जब वे गर्भवती थीं, तो उस वक्त उन्हें पुंनः स्वप्न आया था, जिसमें उनके (गर्भस्थ) पुत्र ने उनसे कहा कि ‘इस्लामबाड़ी में उसी जगह हनुमान जी की एक मूर्ति गड़ी हुई है’ उसे निकलवाकर किसी मन्दिर में प्रतिष्ठित करें। फलत: बच्चे के जन्म के पश्चात रबिया बेगम वहाँ पर नवाद के कारिन्दों से वहां के टीले को खुदवाया स्वप्न आदेशानुसार वास्तव में नीचे मूर्ति मिली जिसे निकाल कर साफ सुथरा करके, नवाबी आदेश से सोने-चाँदी एवं हीरे-जवाहरात से मंण्डित एक हौदे पर बैठाकर हाथी पर रख कर आसफुदौला के बड़े इमामबाड़े के पास उसे प्रतिष्ठापित करके मन्दिर बनवाने के लिए ले जाया जाने लगा। उस हाथी को लेकर जब सब महावत एवं लोग द्वारा वर्तमान अलीगंज की सड़क से आगे की ओर बढ़े (जो उस वक्त एक गलियारा हुआ करता था), उस गलियारे नुमा सड़क के अंतिम छोर पर पहुंचकर उस हाथी आगे बढ़ने से रुक गया। महावत ने लाख कोशिशों के बावजूद हाथी टस से मस नहीं हुआ वह ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। थक कर अन्त में बेगम साहिबा ने उसकी पीठ से हौदे को उतरवा दिया, तब वह फिर से चलने लगा, तो बेगम ने उस हौदे को हाथी के पीठ पर फिरसे रखवाया तो हाथी पुन: बैठ गया। अन्त में जब उस बाड़ी के साधु महाराज ने बेगम साहिब से कहा कि ‘हनुमान जी गोमती के उस पार नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि वह लक्ष्मण जी का क्षेत्र है।’ तब बेगम साहिबा ने वहीं सड़क के किनारे, गोमती-तट के निकट (उस वक्त आज प्रवाहित होने वाली गोमती अपनी वर्तमान स्थिति से हटकर अलीगंज के निकट से बहा करती थी।) मूर्ति स्थापित करा दी और उस पर एक मंदिर भी बनवाया और उस मंदिर के शीश मुकुट पर एक चाँद-सितारा अंकित करवा दिया। साथ ही उसी साधु को सरकारी खर्च पर मंदिर का महंत नियुक्त कर दिया। मंदिर के लिए उसके आस-पास की अधिकांश जमीन महमूदाबाद रियासत की ओर से मुफ्त में दे दी गयी थी।

    मन्दिर-स्थापना के दो-तीन वर्षों के बाद उस क्षेत्र में एक बार प्लेग महामारी दूर-दूर तक फैली जिससे हजारों लोगों कों अपने जान से हाथ धोना पड़ा था अतः इस घातक रोग से बचने के लिए लोग पुराने मंदिर के हनुमान जी के मन्दिर में गये। तभी वहां के पुजारी को यह स्वप्नादेश हुआ, कि जिसमें हनुमान जी कह रहे थे कि ये लोग यहाँ नहीं, उस नये मन्दिर में जायें मैं वहाँ वास करता हूँ, मेरी शक्ति वहां की मूर्ति में है। फलत: वह पूरी भीड़ उस नये मन्दिर में चली आयी और उनमें से बहुतों को स्वास्थ्य लाभ कर उस जानलेवा बीमारी से लोगों को मुक्ति मिली, उसी वक्त से इस नये हनुमान जी के मन्दिर पर प्रतिवर्ष मेला लगने लगा। लेकिन इसी सम्बन्ध में एक दूसरी किंवदन्ती भी बहुत प्रसिद्ध है कि एक बार नवाब वाजिद अली शाह की दादी आलिया बेगम बहुत बीमार पड़ी। उन्होंने यहाँ पर दुआ एवं इबादत की जिससे उन्हें उस रोग से मुक्ति मिली थी इसके फलस्वरूप उन्होंने यहाँ बहुत बड़ा उत्सव मनाया, लाखों की खैरात बाँटी और तभी से यहाँ मेला लगने की परम्परा प्रारम्भ हुई थी जो आज भी वदस्तूर जारी है इसी के साथ ही आलिया बेगम के नाम पर इस पूरे मुहल्ले (अर्थात् तत्कालीन गाँव) का नाम अलीगंज पड़ गया।

    इस तरह की यह दोनों किवदंतियों के अलावा एक और तीसरी किंवदन्ती यह भी है कि नवाब वाजिद अली शाह के वक्त केसर एवं कस्तूरी का एक बहुत बड़ा व्यापारी जटमल लखनऊ आ कर चौक के निकट की उस वक्त की सबसे बड़ी सआदतगंज की मंडी में कई दिन तक डेरा डाले पड़ा रहा, लेकिन उसकी केसर एवं कस्तूरी अत्यधिक मँहगी होने के कारण उसके दर्जनों ऊँटों पर लदी केसर ज्यों-की-त्यों पड़ी रही, उसे केसर-कस्तूरी की खरीददार नहीं मिला। जैसा कि इस मंडी की प्रशंसा बहुत दूर-दूर तक थी। फारस, अफगानिस्तान एवं कश्मीर आदि जगहों से मेवों, फलों तथा जेवरात आदि के बड़े-बड़े व्यापारी वहाँ आया-जाया करते थे। वह व्यापारी बहुत निराश हुआ और लोगों से कहने लगा कि ‘अवध के नवाबों का मैंने बड़ा नाम सुना था, लेकिन वह सब गलत निकला।’ इतनी दूर आकर खाली हाथ अपने देश लौटने के विचारमात्र से वह बहुत दु:खी था ऐसी अवस्था में वह अयोध्या की ओर चल पड़ा। वह रास्ते में इसी नये मन्दिर के पास आकर विश्राम के लिये रूका, तब वहां के लोगों के कहने से उसने हनुमान जी से अपने माल की बिक्री के लिए बहुत मनौती मानी।

    यह संयोग ही था कि उन्हीं दिनों नवाब वाजिद अली शाह अपनी कैसर बेगम के नाम पर कैसरबाग स्थान का निर्माण करवा रहे थे। किसी व्यक्ति ने उन्हें राय दी कि यदि इस कैसरबाग की इमारत को केसर-कस्तूरी से पुतवा दें तो सारा इलाका ही केसर-कस्तूरी के गंध से सुवासित हो उठेगा तब उस व्यापारी की सारी कस्तूरी उसके मुँहमाँगे दाम पर खरीद ली गयी। व्यापारी जटमल के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा, तब उसने हृदय खोलकर मन्दिर के लिए धन खर्च कर मन्दिर के भीतर मूर्ति पर एक छत्र का निर्माण कर लगवाया। है, वह छत्र आज वर्त्तमान समय में भी मूर्ति के मष्तक पर सोभायमान है उसने पूरे मन्दिर को ही नये सिरे से बनवाया। वर्तमान स्तूप (गुंबद) भी उसी वक्त का उसके द्वारा बनवाया गया है।

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