वर्षा मंगल की मधुर कामना

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
लखनऊ,12 अगस्त 2019: अखिल भारतीय बांगो साहित्य सम्मेलन की ओर से बंगाली क्लब में वर्षा मंगल कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और समरसता का सन्देश दिया गया। इसकी अध्यक्षता शिक्षाविद और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवशीष घोष ने की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में बंगला साहित्य, साहित्यकार और कलाकारों का बहुत योगदान रहा है। बांगो सम्मेलन इसी विचार को आगे बढ़ा रहा है। इसमें बच्चों ने वर्षा ऋतु पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये। इस अवसर पर सचिव संदीप बासु,गोपाल चक्रवर्ती,अरुण सान्याल सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।
रविन्द्र नाथ टैगोर बर्षा मौसम पर अनेक गीतों की रचना की थी। जिसकी आज भी देश के अनेक हिस्सों में संगीतमय प्रस्तुति की जाती है। यह गीत व नृत्य लोकप्रिय रविन्द्र संगीत पर आधारित होते है। इसी को वर्षा मंगल कहा जाता है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भी इस संस्था के अध्यक्ष पद पर रहते हुए राष्ट्रीय सांस्कृतिक सद्भाव का सन्देश दिया था।
प्रायः कवियों को वर्षा ऋतु विशेष प्रिय होती है। क्योंकि इसमें प्रकृति अपने सुंदर रूप में प्रकट होती है। सर्वत्र हरियाली होती है। कवि मन के भाव जागृत होते है।
 रवीन्द्र नाथ टैगोर को वर्षा ऋतु बहुत अच्छी लगती थी। इससे संबंधित उन्होंने अनेक रचनाएं लिखी। छवि ओ गान में भी ‘बादल‘ कविता लिखी। बादल और वर्षा का अटूट रिश्ता होता है। ‘कड़ि ओं कोमल‘ में भी प्रकृति मुस्कुराती है।
रवींद्रनाथ ने आत्मकथा में लिखा कि विद्यार्थी जीवन में मौका मिलते ही मैं दूसरी मंजिल पर जाकर खिड़की में बैठ जाता था। और अपना वक्त बिताया करता था। वस्तुतः यह प्रकृति के प्रति उनका आकर्षण था। प्राकृतिक सौन्दर्य से प्रेरित होकर उन्होंने अनेक काव्य लिखे। महनतरी में उनका प्रकृति प्रेम झलकता है।सोहय गीत, प्रभात गीत तथा हृदय व्रत कविताओं में प्राकृतिक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति है। उन्होंने अनेक गीतों एवं रागों की रचना की थी। कवि काहिनी, बनफूल, भग्न-हृदय, रूद्रचंड, शैशव संगीत आदि का संगीत आज भी गाया जाता है। प्रभात संगीत की  ‘निर्झरेर स्वप्नभंग‘ तथा ‘सृष्टि स्थिति प्रलय‘अच्छी कवितायें हैं। संगीत सौरभ, शोभा, जगते या किछू आछे कवि हेथा प्रतिध्वनीमय‘में भी सौंदर्यबोध है।

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