मैंने मां को मां, दीदी को दीदी और ईश्वर को ईश्वर कहा।
मैंने पिता को पिता, भाई को भाई और पत्थर को पत्थर कहा।
लेकिन जो खुद को गुरु समझते थे, मैंने कभी उन्हें गुरु नहीं कहा।
वे अगर सुबह नजर आ जाते तो मेरा पूरा दिन खराब हो जाता,
इसलिए मैंने अपने रास्ते बदल लिए।
मैं उनके स्पर्श से बचकर बढ़ता रहा।
जो खुद को गुरु समझते थे, मैं उनकी कक्षाओं से बाहर निकल आया और अपनी दुपहरें कैरम खिलाने वाले क्लबों में गुजार दीं।
वहां भी अगर किसी ने गुरु बनने की कोशिश की तो मैंने उसे गर्म समोसे भेंट किए और शाम होते-होते गंदे सिनेमाघरों की ओर चल पड़ा।
परंतु गुरुओं से बचना मुश्किल था, कुछ मुझे बस्ती के बाहर मिले और कुछ शराब की दुकानों के ऊपर। इस ऊंचाई पर आकर वे अपना गुरुत्व खो चुकते थे और संसार में गिरते चले जाते थे।
रात जैसे-जैसे और होती जाती, मुझे लगता कि इन्हें गिरने के सिवाए और कुछ नहीं आता है।
बाद इसके मैं लड़खड़ाते हुए दिन की आखिरी रोटियों तक पहुंचता और सो जाता : सुबह होते ही उनसे बचने के लिए।
[ होश में न होने के निष्कर्ष ] अविनाश मिश्र की वाल से







