जी के चक्रवर्ती
आज भी हमारे देश में शिक्षा को शैक्षिक अभियानों जैसे सभी के लिए शिक्षा से जोड़ कर देश के लोगों को विशेष कर गांवों के लोगों को शिक्षित करने के साथ ही साथ नगरों के अशिक्षित लोगों के लिए एक वैतरणी के रूप में मान कर उसके विस्तार की कोशिशें की गई, इसके फायदे नुकसान को बैगर सोचे-समझेे ही एसे अभियानों के उलटे सीधे तौर तरीके से इसके विस्तार किये जाने के दूरगामी प्रभाव क्या और कैसे होंगे? जिसकी वजह से ऐसे सभी के लिए शिक्षा जैसे अभियानों के माध्यम से देश के मुख्यतः दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश एवं बिहार में सामाजिक परिवर्तन लाने की मुहिम की शुरुआत की गई थी, जिसमे हमारे भारतीय समाज के लोगों की प्रकृति को देशीय दृष्टिकोण से देखे बगैर ही उसमे हस्तक्षेप करना शुरू कर दिये जाने से अंग्रेजी जैसी भाषा के उपनिवेश के विस्तार किये जाने वाली बात ही साबित हुई।हमें यह अवश्य ही याद होगा कि भारत के तक्षशिला एवं नालंदा जैसी विश्वस्तरीय शैक्षणिक संस्थाओं, विद्यालयों, गुरुकुलों, एवं गांवों में फैले स्कूलों की श्रृंखला वाली समाज-पोषित शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजी हुकूमत द्वारा धीरे-धीरे विधिपूर्वक तहस-नहस कर डाला गया। हमारे देश के अति विकसित ज्ञान एवं उसके उपयोग की समस्त व्यवस्थाओं को अंग्रेजों ने अपने हितों की रक्षा के लिए उसे हमारे ही देश में किनारे पर ढकेल कर उसे तिरस्कृत करवा दिया गया। इस तरह से अंग्रेजों ने अपनी पसंद के अनुसार यहाँ के रुचिकर ज्ञान को यही के लोगो के जीवन की मुख्य धारा से अलग कर उसे जड़वत बना दिए जाने से यह केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर संग्रहालय की वस्तु बन गई।
इस प्रकार भारत में शिक्षा के लिए एक शून्यक स्थान निर्मित हो गया जिससे भारत में उनके अनुसार बनाये नये शिक्षा पद्धति के घुसपैठ करने के लिए एक माहौल निर्मित होता चला गया। इस तरह इस शून्यता को अंग्रेजो ने अपने कार्य सूची के अनुरूप भारत के शैक्षिक परिपाटी में अंग्रेजो की पढ़ने-पढ़ाने की व्यवस्था को यहाँ पर लागू कर दिया जिससे भारत में शिक्षा का ऐसे नवीन पद्धति का निर्माण हुआ जिसमें अंग्रेजी भाषा की विचारधाराओं, पद्धतियों एवं ज्ञान के भारतीय चिंतन में अपना स्थान बना लिया। भारतीय संस्कृति और भारतीय जनमानस के मष्तिक में उनकी शिक्षा के और तौर- तरीके, रहन-सहन की सामाजिक व्यवस्थाओं का प्रवेश भारतीय लोगों के मध्य करा कर उनके कायाकल्प करने की उनकी योजनाएं दिनों- दिन कामियाब होती चली गई।
अंग्रेजी उपनिवेश के वक्त भारतियों पर शिक्षा का जो ढांचा लादा गया था वह उपनिवेश के समाप्त होने के बाद स्वतंत्र भारत में भी मौजूद रहा उस वक्त इस बात पर प्रश्न उठाने की जगह उसे सही ठहरा कर दोनों आंखें मूंद कर अपना लिया गया जिसकी वजह से भाषायी ज्ञान में पश्चिमी वर्चस्व का असर आज वर्त्तमान समय तक बखूबी दिखाई देता है। उस वक्त इन विसंगतियो पर किसी का भी ध्यान नहीं गया ऐसा नहीं है। देश में इस मुद्दे पर समीक्षात्मक विचार-विमर्श भी हुए राधाकृष्ण एवं कोठारी जैसे व्यक्तियों के रिपोर्ट के अनुसार अनेको संस्तुतियां भी की गई लेकिन ऐसे विचार अधिकांशतःह ठंडे बस्ते में चले गए। इन सभी प्रक्रियाओं में हमारे द्वारा जिस सामाजिक यथार्थ का निर्माण हुआ वह मात्र भ्रम का कारण बना।
देश काल की सीमाओं को लांघ कर आधुनिकता एवं वैज्ञानिकता के सुगठित आवरण में हमारी न्यूनतम ज्ञान ने पश्चिमी ज्ञान को अनुकर्णीय ज्ञान मान कर उसे अपनाया। जबकि दिखावटी एवं सरकरी ज्ञान के बहिष्कृत होने के बावजूद हमारे सार्वजानिक लोक जीवन में यह आधे अधूरे रूप में इसके अवशेष आज भी हमें देखने-सुनने को मिल जायेंगे। वाही पर भारतीय संगीत, चित्रकला,योग, आयुर्वेद, दर्शन या आध्यात्म के क्षेत्रों के ज्ञान एक चमचमाते सितार की भांति वर्त्तमान समय में भी अपनी चमक विखेर रहा है लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि ज्ञान-विज्ञान की देशीय परंपरा को अनावश्यक रूप से रोक कर हमने स्वमं ही उसे किनारे धकेल कर विदेशी संस्कृति एवं उनके चाल-चलन को अपना कर अपने दिनचर्या में शामिल करते चले गये, जिससे हमें अपने ही पथ से भटक कर पता नही किस दिशा की ओर पग बढ़ाते चले गये। वर्त्तमान समय के भूमंडलिकरण के दौर में हम स्वमं ही अपनी पहचान खोते चले जा रहे है।







