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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    इंसानों से दूरी बनाते हाथी ?

    ShagunBy ShagunAugust 13, 2020Updated:August 13, 2020 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    कुछ महीनों पहले केरल में एक हाथी को बारूद खिलाने से हुई मौत के बाद मंत्री से ले कर आम लोग दुखी थे। कई जगह आंदोलन हुए, ज्ञापन-खतो कितावत भी हुई और मसला आया-गया हो गया। षायद ही लोगों को पता हो कि जून महीने के दूसरे सप्ताह के बाद दस दिनों में अकेले छत्तीसगढ़ में छह हाथी संदिग्ध हालात में मरे मिले। हाथियों के समूह यहां आए दिन खेती या गांव-घर तहस-नहस करते हैं। भले ही हम कहें कि हाथी उनके गांव-घर में घुस रहा है, हकीकत यही है कि प्राकृतिक संसाधनों के सिमटने के चलते भूखा-प्यासा हाथी अपने ही पारंपरिक इलाकों में जाता है। दुखद है कि वहां अब बस्ती, सड़क का जंजाल है। सरकारी रिपोर्ट कहती है कि औसतन हर साल हाथी के हाथों में कोई पांच सौ लोग मारे जाते हैं जबकि सौ हाथी भी इंसान से टकराव में अपनी जान गंवाते हैं।

    दुनियाभर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत शामिल हो गया है। भारत में इसे ‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ घोषित किया गया है। इसके बावजूद भारत में बीते दो दशकों के दौरान हाथियों की संख्या स्थिर हो गई हे। जिस देश में हाथी के सिर वाले गणेश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है, वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है।

    पिछले एक दशक के दौरान मध्य भारत में हाथी का प्राकृतिक पर्यावास कहलाने वाले झारखंड, छत्तीसगड़, उड़िया राज्यों में हाथियों के बेकाबू झुण्ड के हाथों एक हजार से ज्यादा लाग मारे जा चुके हैं। धीरे-धीरे इंसान और हाथी के बीच के रण का दायरा विस्तार पाता जा रहा है। देश में हाथी के सुरक्षित कॉरीडोरों की संख्या 88 हैं, इसमें 22 पूर्वोत्तर राज्यों , 20 केंद्रीय भारत और 20 दक्षिणी भारत में हैं। कभी हाथियों का सुरक्षित क्षेत्र कहलाने वाले असम में पिछले सात सालों में हाथी व इंसान के टकराव में 467 लोग मारे जा चुके हैं। अकेले पिछले साल 43 लोगों की मौत हाथों के हाथों हुई। उससे पिछले साल 92 लोग मारे गए थे। झारखंड की ही तरह बंगाल व अनय राज्यों में आए रोज हाथी को गुस्सा आ जाता है और वह खड़े खेत, घर, इंसान; जो भी रास्ते में आए कुचल कर रख देता है । दक्षिणी राज्यों के जंगलों में गर्मी के मौसम में हर साल 20 से 30 हाथियों के निर्जीव शरीर संदिग्ध हालात में मिल रहे हैं ।

    जानना जरूरी है कि हाथियों केा 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटेां तक भटकना पड़ता है । गौरतलब है कि हाथी दिखने में भले ही भारी-भरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है । थेाड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है । ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानि जंगल को जब नुकसान पहुचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिड़ंत होती है ।

    कई-कई सदियों से यह हाथी अपनी जरूरत के अनुरूप अपना स्थान बदला करता था । गजराज के आवागमन के इन रास्तों को ‘‘एलीफेंट कॉरीडार’’ कहा गया । जब कभी पानी या भोजन का संकट होता है गजराज ऐसे रास्तों से दूसरे जंगलों की ओर जाता है जिनमें मानव बस्ती ना हो। सन 1999 में भारत सरकार के वन तथा पर्यावरण मंत्रालय ने इन कॉरीडारों पर सर्वे भी करवाया था । उसमें पता चला था कि गजराज के प्राकृतिक कॉरीडार से छेड़छाड़ के कारण वह व्याकुल है । हरिद्वार और ऋषिकेश के आसपास हाथियों के आवास हुआ करते थे । आधुनिकता की आंधी में जगल उजाड़ कर ऐसे होटल बने कि अब हाथी गंगा के पूर्व से पश्चिम नहीं जा पाते हैं्र। रामगंगा को पार करना उनके लिए असंभव हो गया है । अब वह बेबस हो कर सड़क या रेलवे ट्रैक पर चला जाता है और मारा जाता है।

    दरअसल, गजराज की सबसे बड़ी खूबी है उनकी याददाश्त। आवागमन के लिए वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी परंपरागत रास्तों का इस्तेमाल करते आए हैं। राजाजी नेशनल पार्क के हाथी भी देहरादून-हरिद्वार के बीच मोतीचूर से डोईवाला तक के चार गलियारों का उपयोग ऋषिकेश के सात मोड़ और नरेंद्रनगर वन प्रभाग तक आने-जाने में करते हैं। 2010 से हाईवे चौड़ीकरण के चलते ये गलियारे बाधित हैं। हालांकि, इन स्थानों पर अंडर पास बनने हैं, लेकिन सात साल में वहां ढांचे ही खड़े हो पाए हैं। यही नहीं, वहां बड़े पैमाने पर निर्माण सामग्री भी पड़ी है। ऐसे में हाथियों की आवाजाही बाधित हो रही है और वे जैसे-तैसे निकल पा रहे हैं। ओडिसा के हालात तो बहुत ही खराब हैं। हाथियों का पसंदीदा ‘‘ सिंपलीपल कॉरीडार’’ बोउला की क्रोमियम खदान की चपेट में आ गया । सतसोकिया कॉरीडोर को राष्ट्रीय राजमार्ग हड़प गया।

    ठीक ऐसे ही हालात उत्तर-पूर्वी राज्यों के भी हैं । यहां विकास के नाम पर हाथी के पारंपरिक भोजन-स्थलों का जम कर उजाड़ा गया और बेहाल हाथी जब आबादी में घुस आया तो लोगों के गुस्से का शिकार बना । हाथियों के एक अन्य प्रमुख आश्रय-स्थल असम में हाथी बेरोजगार हो गए है और उनके सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो गया है। सन 2005 में सुप्रीम कोट के एक आदेश के बाद हाथियों से वजन ढुलाई का काम गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। इसके बाद असम के कोई 1200 पालतू हाथी एक झटके में बेरोजगार हो गए। हाथी उत्तर-पूर्वी राज्यों के समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है सदियों से ये हाथी जंगलों से लकड़ी के लठ्ठे ढोने का काम करते रहे ।

    दक्षिणी राज्यों में जंगल से सटे गांवों मे रहने वाले लोग वैसे तो हाथी की मौत को अपशकुन मानते हैं , लेकिन बिगड़ैल गजराज से अपने खेत या घर को बचाने के लिए वे बिजली के करंट या गहरी खाई खोदने को वे मजबूरी का नाम देते हैं । यहां किसानों का दर्द है कि ‘हाथी प्रोजेक्ट’ का इलाका होना उनके लिए त्रासदी बन गया है । यदि हाथी फसल को खराब कर दे तो उसका मुआवजा इतना कम होता है कि उसे पाने की भागदौड़ में इससे कहीं अधिक खर्चा हो जाता है । ऐसे ही भूखे हाथी बिहार के पलामू जिले से भाग कर छत्तीसगढ़ के सरगुजा व सटे हुए आंध्रप्रदेश के गंावों तक में उपद्रव करते रहते हैं ।

    बढ़ती आबादी के भोजन और आवास की कमी को पूरा करने के लिए जमकर जंगल काटे जा रहे हैं। उसे जब भूख लगती है और जंगल में कुछ मिलता नहीं या फिर जल-स्त्रोत सूखे मिलते हैं तो वे खेत या बस्ती की ओर आ जाते हैं । नदी-तालाबों में शुद्ध पानी के लिए यदि मछलियों की मौजूदगी जरूरी है तो वनों के पर्यांवरण को बचाने के लिए वहां हाथी अत्यावश्यक हैं । मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती दांतों का लालच; कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण हाथी को निर्ममता से मारा जा रहा है । यदि इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो जंगलों का सर्वोच्च गौरव कहलाने वाले गजराज को सर्कस, चिड़ियाघर या जुलूसों में भी देखना दुर्लभ हो जाएगा।

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