एक मार्गदर्शक सन्यासी स्वामी विवेकानन्द

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file photo
स्वामी विवेकानन्द का जीवन दर्शन यह बताता है कि उन्होंने अपने उन्तालीस वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में ही हमारे मानव समाज के लिये वह काम कर गये वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक न तो कोई ऐसा व्यक्तित्व पैदा होगा और न समाज का मार्ग दर्शन करने वाला कोई नही मिलेगा लेकिन उनके द्वारा दिया गया ज्ञान हमारे आगे आने वाली कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा।
उनका जन्म 12 जनवरी और मृत्यु 4 जुलाई,1902 को हुआ वे वेदांत के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। वे अपने मात्र तीस वर्ष की अल्प आयु में ही स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो शहर में सम्पन्न हुये विश्व धर्म सम्मेलन में भारत देश और हिंदू धर्म के विषय मे ऐसा भाषण दिया कि भारत देश की गौरव विश्व पटल पर उभर कर आने से हमारे देश को सार्वभौमिक पहचान दिलवायी। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-“यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये, उनमें और उनके दर्शन में आप सम्पूर्ण विश्व की झलक पायेंगे जिसमे आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे।

किसी ने उनके विषय में कहा था कि उनके जैसा व्यक्तित्व दुबारा पैदा होने की कल्पना करना संभव नही है। वे जहाँ-जहाँ गये अपने ओजस्ववि व्यक्तित्व से लोगों को प्रभवित करते रहे। हर कोई उनमें अपने मार्ग दर्शन करने वाला व्यक्तित्व ही नजर आया। वे ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में पृथ्वी में अवतरित हुये थे और सबको अपने मोहपास में बांध लेना उनके व्यक्तिवत के विशिष्टता थी। हिमालय प्रदेश में एक बार एक अनजान यात्री उन्हें देख अचानक ठिठक कर रुक गया और आश्चर्यपूर्वक ढंग से चिल्ला उठा-‘शिव!’ यह वाक्या ऐसा हुआ मानो उस व्यक्ति के आराध्य देव ने अपना नाम उनके माथे पर लिख दिया हो।”

वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने अपने देशवासियों का आह्वान करते हुए कहा था कि हे मेरे देशवासियों उठ और नया इतिहास रच डालो उनके ओजपूर्ण कथन से न केवल महात्मा गान्धी को आजादी की लड़ाई में जन-समर्थन मिला, वह विवेकानन्द के आह्वान का ही प्रभाव था। इस प्रकार वे भारतीय स्वत्रंत्रता संग्राम के भी एक लिये भी एक प्रेरणा के स्रोत बने। उनका विश्वास था कि पवित्र भारतवर्ष धर्म एवं दर्शन की पुण्यभूमि है, तथा यही आदिकाल से लेकर आज तक मनुष्य के लिये जीवन के सर्वोच्च आदर्श एवं मुक्ति का द्वार खोलता  है। उनका कथन-“‘उठो, जागो, स्वयं जागकर औरों को जगाओ। अपने नर-जन्म को सफल करो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाय।

उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षोँ में विवेकानन्द लगभग सशस्त्र या हिंसक क्रान्ति के जरिये भी भारत  को आजाद कराना चाहते थे लेकिन उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया कि परिस्थितियाँ उनके इरादों के लिये अभी परिपक्व नहीं हैं इसलिये इसी के पश्चात वे  ‘एकला चलो‘ की नीति का पालन करते हुए एक परिव्राजक के रूप में सम्पूर्ण दुनिया एवं भारतवर्ष को खंगाल डाला।

विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफत करते हुये उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर आध्यात्मिक चिंतन किया।

उन्होंने पुरोहितवाद, ब्राह्मणवाद, धार्मिक कर्मकाण्ड और रूढ़ियोंवादियों की खिल्ली उड़ाते हुये कहा था सम्पूर्ण मानवजाति एक है और सबका ईश भी एक है केवल पंथ अलग-अलग है जाना सबको एक ही जगह है। उनके दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी ईर्ष्या का विषय है। स्वामी जी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिये। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं। यह बात स्वामी विवेकानन्द का अपने देश के धरोहर के लिये दम्भ नहीं था बल्कि यह एक वेदान्ती साधु की भारतीय सभ्यता और संस्कृति की तटस्थ, वस्तुपरक और मूल्यगत आलोचना थी। बीसवीं सदी में समपूर्ण दुनिया ने सदी के इतिहास ने बाद में उसी को गले लगाया। – प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती

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