दुनिया की मुसीबत बने प्लास्टिक को कैसे रोका जाये?

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इम्पोर्टेन्ट इशू: जी के चक्रवर्ती

आज हम अपने चारों ओर देखते हैं तो लगभग बहुत सी चीजें प्लास्टिक से बनी हुई ही दिखाई देती है और हम जितनी भी चीजें दिन भर में इस्तेमाल करते हैं उन में से लगभग 60 से 70 प्रतिशत वस्तुएं एवं समान प्लास्टिक से ही बनी हुई होती है जैसे बर्तन, कंघे, टेलीफोन, टेलीविजन, बच्चों के खिलौने, मशीनों के पुर्जें इत्यादि अनेक प्रकार की वस्तुएं प्लास्टिक से बनाई जाती हैं वर्तमान समय मे प्लास्टिक हमारे मानव जीवन मे एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है आज के आधुनिक युग में प्लास्टिक की मांग बहुत ज्यादा है जो वस्तुएं पहले किसी अन्य पदार्थों से बनाई जाती थी जैसे कांसा, पीतल, लोहे या लकड़ी आज प्लास्टिक से बनाई जा रही है क्योंकि प्लास्टिक अन्य पदार्थों की तुलना में कई कारणों से बहुत अच्छी एवं हल्की होती है।

प्लास्टिक से निर्मित वस्तुएं जल्दी टूटती एवं नष्ट नहीं होती है और इससे सबसे बड़ी बात यह है कि यह कागज एवं अन्य धातुओं की तरह सड़ता-गलता नहीं है किसी भी वातावरण में रहने के बावजूद न तो लोहे की तरह इसमें जंग लगता है और न ही इसके ऊपर जल्दी से किसी भी तरह के वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। प्लास्टिक से विद्युत के उपकरण बनाए जाते हैं क्योंकि प्लास्टिक विद्युत का कुचालक तो होता ही है साथ ही साथ प्लास्टिक की आयु भी बहुत लंबी होती है क्योंकि यह पदार्थ बहुत लंबे समय तक टिकता है एवं प्लास्टिक से बनाई गयी वस्तुएं धातु से बनी वस्तुओं के मुकाबले सस्ती, हल्की एवं लम्बे समय तक टिकाऊ होती हैं, प्लास्टिक पदार्थ में एक ऐसा विशेष गुण होता है जिसकी वजह से प्लास्टिक को थोड़ा सा गर्म करते ही आसानी से किसी भी आकार में बदने के अलावा इसमे किसी अन्य पदार्थ मिला कर बहुत सी वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है।

पूरे विश्व मे ‘रवांडा’ ही ऐसा देश है कहाँ पर प्लास्टिक पूरी तरह से बैन है

सबसे पहले मानव निर्मित प्लास्टिक सन 1855 में अलेक्जेंडर पार्क्स द्वारा बनाया गया था जिस के कारण पहले इसका नाम Parkesine (nitrocellulose) रखा गया। इससे पूर्व 1600 ई.पू. में, Mesoamericans प्राकृतिक रबरों का इस्तेमाल गेंदों, बैंड, और मूर्तियों में इस्तेमाल हुआ करता था, सर्वप्रथम प्लास्टिक को सन, 1856 में अलेक्जेंडर पार्क्‍स द्वारा बर्मिंघम में, ब्रिटेन द्वारा पेटेंट कराया गया था और इसे लंदन में सन, 1862 में एक महान अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रस्तुत कर उन्होंने सन, इस  विश्व मेले में एक कांस्य पदक भी जीता था। प्लास्टिक शब्द की उपत्ति ग्रीक भाषा के प्लास्तिकोज शब्द से हुई है। हमारे भारत मे प्रतिव्यक्ति द्वारा लगभग 9.7 किलो ग्राम प्लास्टिक प्रयोग में लाया जाता है। पूरे विश्व मे ‘रवांडा’ ही ऐसा देश है कहाँ पर प्लास्टिक पूरी तरह से बैन है।

आपने 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदी, और पीकर फेंक दिया। तो इस बोतल का 90 फीसदी हिस्सा 27-28 वीं सदी में नष्ट होगा। करीब 450 से 500 साल लगेंगे। यानि जिस बोतल में पानी पिया होगा वह आज भी मौजूद है। हर 60 मिनट में 6 करोड़ बोतल बेची जा रही है, अरबो खरबो का व्यापार है। हिन्द महासागर में करीब 28 पैच (प्लास्टिक पहाड़) का बन चुका है। जानवर मर रहे है, मछलियां, समुद्री जीव मर रहे हैं। अगला नम्बर आपका और मेरा है ।

फाइव स्टार और अन्य होटल में भारत मे रोज करीब 4 लाख पानी की बोतल का कूड़ा निकलता है। शादी विवाह में अब कुल्हड़ में पानी पीना, तांबे पीतल के जग से पानी पिलाना फैशन वाह्य है, बेल, कच्चे आम, पुदीना या लस्सी के शर्बत की जगह पेप्सी कोक की बोतल देना चाहिए नही तो लोग गंवार समझेंगे। विज्ञान के अनुसार सोडा प्यास बुझता नही, बढ़ाता है। फिर भी ठंडा मतलब ठंडा, प्यास लगे तो पेप्सी यह टीवी में दिखाता है।

यूरोप के बहुत देशों ने अपने प्रदूषण पर काबू पाया है, अब उनके नल का पानी पीने योग्य हो गया। लेकिन गंगा यमुना सहित सैकड़ों नदियों, लाखो कुंवे के देश मे पानी का व्यापार अरबो रुपये का है। लगातार भूजल नीचे जा रहा है, एनसीआर डार्क जोन बन गया है, देश के के महानगर में कूड़े और इससे रिसता लीचेत कैंसर पैदा कर रहा है। तो क्या हुआ? जो होगा देखा जाएगा..


सन1897 के अंतिम दशक में विल्हेलम फ्रिस्क तथा एडोल्फ स्पिट्लर नामक दो जर्मन रसायन शास्त्रियों ने विद्यालयों में पढ़ाने के लिए ब्लैक बोर्ड के निर्माण हेतु स्लेट के विकल्प को ढूंढ़ने का प्रयास करते हुये वर्ष 1846 से 1940 तक अपने अथक प्रयासों और विभिन्न प्रकार के प्रयोगों के दौर से गुजरने के बाद कैसीन पर फार्मेल्डिहाइड की अभिक्रिया से जानवरों के सींग से एक प्लास्टिक की तरह (GLUE) ग्लू जैसा चिपचिपा पदार्थ जिसको सरेश के नाम से भी जाना जाता है को हासिल किया था जिसका उपयोग प्लास्टिक की तरह ही अनेक प्रकार से इस्तेमाल कर सकते थे।

सन 1900 में सम्पूर्ण रूप से सिंथेटिक thermoset, फिनोल और formaldehyde का उपयोग करके सर्व प्रथम प्लास्टिक का निर्माण किया गया। वर्ष 1900 में  जर्मनी तथा फ्रांस में व्यावसायिक प्लास्टिक को कैसीन से निर्मित कर उसका उत्पादन किया जाने लगा। बेल्जियम के अमेरिकी नागरिक डॉ. लियो बैकलैंड ने प्लास्टिक के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण भूमिका निभाया सन् 1909 में फीनॉल तथा फार्मेल्डिहाइड की अभिक्रिया कराकर उसमें कुछ परिवर्तन करके बेकलैंड एक ऐसा प्लास्टिक निर्मित करने में सफलता हासिल की जिसका उपयोग कई तरह के उद्योगों-धंधों में किया जा सकता था। बेकलैंड के नाम पर ही इस नए प्लास्टिक जैसे पदार्थ का नामकरण बेकेलाइट रखा गया।
प्लास्टिक की खोज के क्षेत्र नित-नए अन्य पदार्थ इंसानो के हाथ लगे। इस खोज में कई वैज्ञानिक ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वैज्ञानिकों की इतनी मेहनत से ही आज हमे प्लास्टिक इस्तेमाल करने को मिल रहा और दिनोदिन इसकी मांग बढती चली गई। वर्तमान समय मे कई वस्तुओं के निर्माण में प्लास्टिक का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है। विश्व के प्रत्येक घरों में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न प्रकार की वस्तुएं प्लास्टिक की ही बनी हुई है आज चारो तरफ प्लास्टिक ही प्लास्टिक नजर आने से संकट उत्पन्न हो गया है। क्योंकि प्लास्टिक एक ऐसा पदार्थ है जिसका निवारण नहीं किया जा सकता यानी कि इसको समाप्त नहीं किया जा सकता है इसे जलाकर नष्ट करने पर वातावरण में बहुत अधिक मात्रा में वायु प्रदूषण होता है। वातावरणीय प्रदूषण को देखते हुए प्लास्टिक का रीसाइक्लिंग पर जोर दिया जाने लगा है अर्थात प्लास्टिक को इस्तेमाल करने के बाद उससे रीसायकल करके किसी और चीज़ के निर्माण में इस्तेमाल किया जाये सके जैसे, प्लास्टिक की बोतलों को पिघला कर उन्हें प्लास्टिक की कुर्सियों या मेजों के रूप में ढाल कर घरेलू वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है।
आज हम इंसानों के सामने सबसे अहम प्रश्न यह है कि हमें जिस तरह प्लास्टिक इस्तेमाल करने की लत पड़ गई है, उसमें बुनियादी तौर पर हम बदलाव कैसे लाया जा सकता हैं ? इस दिशा में दुनिया के साठ देशों में प्लास्टिक उत्पादन पर कंनून बन गये हैं। कई देशी विदेशी कंपनियों ने तो प्लास्टिक कचरे का उत्पादन कम करने की कोशिश में प्रयत्नशील भी हैं। इसके लिए वे अपने मुनाफ़े से भी समझौता करने के लिए तैयार हैं। जैसे कि यदि हम कोका-कोला कंपनी को ही लें तो तथ्य बताते हैं कि यह कम्पनी प्रति वर्ष केवल ब्रिटेन में 38,250 टन प्लास्टिक का उपयोग केवल पैकेजिंग में प्रयोग करती है। अकेले ब्रिटेन में कोका-कोला कम्पनी एक सौ दस अरब प्लास्टिक की ऐसी बन्द बोतलों में अपने उत्पाद बेचती है, जिसे केवल एक ही दफे इस्तेमाल में लाया जाता है। यदि हम विभिन्न आंकड़ों पर गौर करें तो यह ज्ञात होता है कि प्रति वर्ष दुनियाभर में 500 अरब प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल होता है। बहुत बड़े पैमाने पर इसके उत्पादन होने से इसका निपटारा कर पाना भी अत्यंत गंभीर चुनौती है। दरअसल, प्लास्टिक न तो नष्ट होता है और न ही सड़ता है। आपको जानकर शायद हैरानी हो कि प्लास्टिक 500 से 700 साल बाद नष्ट होना शुरू होता है और पूरी तरह से डिग्रेड होने में उसे पूरे एक हजार वर्ष लगते हैं। इसका अर्थ यह हुआ जितना भी प्लास्टिक का उत्पादन आज दिन तक सम्पूर्ण दुनिया मे हुआ है अभी तक वह नष्ट नहीं हुआ है। सम्पूर्ण दुनिया से 21.6 अरब किलो कूड़ा प्रति वर्ष समुद्र में फेंका जा रहा है जिस कूड़े में प्लास्टिक की मात्रा सर्वाधिक है।
अभी हाल ही में दुनिया के लगभग 60 देशों ने अपने देश मे प्रयोग होने वाले प्लास्टिक की थैलियों और केवल एक ही बार इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक के उत्पादन पर क़ाबू पाने के लिए क़ानून बनाए हैं। दुनिया का एक छोटा सा देश ‘वनुआतू’ जिसने अपने यहाँ एक ही दफे इस्तेमाल होने वाले प्रत्येक तरह के प्लास्टिको पर रोक लगा कर दुनिया का सबसे पहला देश बन गया है।
वहीं पर हम यदि अपने भारत की बात करें तो प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पहल पर इसके दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र ने अपने यहाँ प्लास्टिक पर पाबंदी लगा दी गई है लेकिन ये पाबंदी प्रत्येक प्रकार के प्लास्टिकों पर लागू नही किया गया है केवल उन्ही प्लास्टिकों पर इसे लागू किया गया है जिन्हें पर्यावरण के लिए सबसे अधिक नुक़सानदेह मानी जाती है। हमारे देश मे सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि कानून तो बना दिया जाता है लेकिन उसके शक्ति से प्रयोग और लागू हो पाना बहुत ही टेड़ी खीर है क्योंकि ऊपर से लेकर नीचे पायदानपर बैठे अफसरशाही के लोग पूर्णतः भ्र्ष्टाचार में आकंठ डूबे हुए होने से ऐसे नियम-कानून केवल कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं। देश के किसी भी राज्य द्वरा मात्र अपने राज्य में इसके प्रयोग पर रोक लगाने से ही इसके प्रचलन को समाज से पूर्णतः समाप्त नही किया जा सकता है जब तक कि देश राज्यों के अतिरिक्त वहाँ निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति इसके प्रयोग न करने एवं न होने देने के लिए प्रतिबद्ध नही होते है।

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