देश में सीवर की भरमार है लेकिन उनके सफाई करने के उपयुक्त आधुनिक साधन की कमी आज भी बनी है देश आज २१वी सदी की ओर अग्रसर है लेकिन सीवर की सफाई करने के लिए आज भी वही गरीब उतरते हैं जिनके घर में गरीबी और भुखमरी हैं। बगैर किसी सेफ्टी गॉर्ड के सेफ्टी टैंक में उतरते यह गरीब सीवर की सफाई में या तो भयानक गैस से या दम घुटने से मर जाते हैं। आमतौर पर देखा गया हैं कि इस तरह के मामले में एक दो मामूली जाँच के बाद मामला रफा दफा हो जाता हैं?
बता दें कि एक बार फिर सेफ्टी टैंक की सफाई करने उतरे दो सफाईकर्मी काल के गाल में समा गए। दिल्ली के प्रेमनगर इलाके में 10 फीट टैंक की सफाई करने कुल 5 मजदूर उतरे थे, इनमें दो की मौत हो गई जबकि 3 की हालत गंभीर है। इन लोगों के पास सुरक्षा के किसी तरह के कोई भी उपकरण नहीं थे। देश में हर जगह सेफ्टी टैंक हैं मगर उनकी सफाई को लेकर किसी तरह की कोई समग्र योजना का अभाव रहा है। न कोई तकनीक न कोई जिजीविषा। हर रोज कहीं-न-कहीं से सीवर की सफाई करते मजदूरों की मौत की खबर मिलती है। क्या स्वच्छ भारत अभियान के कालखंड में इस तरह की खबरें हमें शर्मिदा नहीं करती?
हाल के वर्षो में सेफ्टी टैंक की सफाई करते कई मजदूरों की मौत हुई है। देश भर की बात करें तो पिछले पांच सालों में कुल 1470 सफाईकर्मियों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़े 2018 तक के हैं। पिछले कुछ महीनों के दौरान हुई मौतों को जोड़ दें तो कई 1500 से ज्यादा हो जाएंगे। वहीं दिल्ली की बात करें तो पांच सालों में कुल 74 सफाईकर्मियों की मौत सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई है। साफ-सफाई अभियान की वकालत करने वाले लोग इस समस्या पर ज्यादा से ज्यादा सेफ्टी किट, दस्ताने और मास्क उपलब्ध कराने की बात करते हैं जबकि सफाई के लिए मशीनों के इस्तेमाल पर कोई बात नहीं करता है।
सर्वोच्च अदालत ने 2014 में मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा था कि नालों की सफाई के दौरान मारे गए कर्मचारियों के परिजनों को दस लाख रुपये मुआवजा दिया जाना चाहिए। वहीं उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के वक्त माना था कि दिल्ली में सफाईकर्मियों की स्थिति बेहद गंभीर है। सबसे चिंता की बात यह है कि मुआवजा देने के मामले में भी शासन स्तर पर लापरवाही और उदासीनता देखी जाती है।
हमेशा से सीवर श्रमिकों के पुनर्वास और क्षतिपूर्ति की नीतियां अधिक सफल नहीं हुई है। इसलिए नौकरशाही को निद्रा से जागना होगा। सरकार को भी इस मद में आवंटित बजट का समझदारी से इस्तेमाल करने के नियम बनाने होंगे। स्मार्ट शहर की र्चचा तो बहुतेरे होती है, मगर ‘‘स्मार्ट सैनिटेशन’ की बात कोई नहीं करता है। जब तक मशीन का इस्तेमाल सफाई के लिए नहीं होगा, एक-एक कर मजदूर अपनी जान गंवाते रहेंगे।








2 Comments
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