बैठकर खाने के बजाय घर से पानी ले जाने वालों को छूट दी जा रही है
पंकज चतुर्वेदी
वैसे तो चेन्नई भारत के पुराने प्रगतिशील शहरों में गिना जाता है, लेकिन इन दिनों वहां ‘जल -आपातकाल’ का प्रकोप है। शहर के लगभग सभी बड़े रेस्त्रां ने अपने काम करने के समय को कम कर दिया है। बैठ कर खाने के बजाय घर ले जाने वालों को छूट दी जा रही है। चेन्नई होटल एसोसिएशन के मुताबिक, पानी की कमी के चलते शहर के कोई पचास हजार छोटे व मध्यम होटल-रेस्त्रां गत पंद्रह दिन से बंद हैं और इससे हजारों लोग बेरोजगार हो चुके हैं।
महानगर के विश्व प्रसिद्ध आईटी कॉरीडोर ओल्ड महाबलीपुरम रोड (ओएमआर) की साढ़े छह सौ से अधिक आईटी कंपनियों ने अपने बीस हजार से ज्यादा कर्मचारियों को घर से काम करने या फिर कंपनी के हैदराबाद या बंगलूरू स्थित कार्यालयों से काम करने के निर्देश दे दिए हैं। कुल मिला कर शहर में पानी बचा ही नहीं है।
कोई नब्बे लाख की आबादी के शहर में पानी के नल हफ्तों से सूखे हैं और बारह हजार लीटर का एक टैंकर पांच हजार में खरीद कर लोग काम चला रहे हैं। कभी लगता है कि समुद्र तट पर बसा ऐसा शहर, जहां चार बड़े-बड़े जलाशय और दो नदियों थीं, आखिरकार पानी की हर बूंद के लिए क्यों तरस गया?
गंभीरता से देखें, तो यह प्यास समाज के कथित विकास की दौड़ में खुद के द्वारा ही कुचली-बिसराई व नष्ट कर दी गई पारंपरिक जल निधियों के लुप्त होने से उपजाई है। और इसका निदान भी जल के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटना ही है। सरकार कह रही है कि गत तीन सालों में चेन्नई मेट्रो वाटर को 2638.42 करोड़ रुपये दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि डाले गए पाइप या टंकियां तब तक काम की नहीं हैं, जब तक कि जल स्रोत न हो।
कभी समुद्र के किनारे का छोटा-सा गांव मद्रासपट्टनम आज भारत का बड़ा नगर है। अनियोजित विकास, शरणार्थी समस्या और जल निधियों की उपेक्षा के चलते आज यह महानगर एक बड़ी झुग्गी में बदल गया है। नवंबर-2015 में आई भयानक बाढ़ के बाद तैयार की गई नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ डिजास्टर मैनेजमेंट की रिपोर्ट में बताया गया है कि 650 से अधिक जल निधियों में कूड़ा भर कर चौरस मैदान बना दिए गए। यही वे पारंपरिक स्थल थे, जहां बारिश का पानी टिकता था और जब उनकी जगह समाज ने घेर ली तो पानी समाज में घुस गया।
-पंकज बुक्स ब्लॉगपोस्ट से साभार








2 Comments
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