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    अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस: पृथ्वी की रक्षा से ही बचेगा अस्तित्त्व

    By April 22, 2019Updated:April 22, 2019 Current Issues No Comments11 Mins Read
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    डा. जगदीश गांधी

    संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 22 अप्रैल को अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस अर्थात धरती माता दिवस सारे विश्व में मनाने की घोषणा की गयी है। पहली बार यह वर्ष 1970 में इस उद्देश्य से मनाया गया था कि लोगों को अपनी धरती माता के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। धरती हमारी माता है, परमात्मा हमारा पिता है। यह सारी धरती एक कुटुम्ब तथा एक देश है और हम सब इसके नागरिक हैं, इन विचारों को संसार के बच्चों को बाल्यावस्था से ही देने का समय अब आ चुका है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है – माता भूमिः पुत्रोहं पृथिव्या अर्थात वसुंधरा जननी है और मैं इसका पुत्र/पुत्री हूँ। हमने अपनी धरती माता को जख्मों से घायल कर दिया है। हमारे पृथ्वी ग्रह पर ग्लोबल वार्मिंग, कानूनविहीनता, आतंकवाद तथा परमाणु शस्त्रों की होड़ के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार है।

    पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत में छेद हो गया है। धरती कराह रही है इसके लिए निश्चय ही हम सभी धरती वासी दोषी हैं। इस स्वच्छ श्यामला धरा को हरी-भरी तथा प्रदूषण से मुक्त रखने का दायित्व हम सभी एकजुट होकर निभा सकते हैं। वही दूसरी ओर भारत ने अपना अंतरिक्ष यान मंगल की कक्षा में स्थापित करके इतिहास रच दिया है। इस ऐतिहासिक सफलता के लिए हम सभी विश्ववासियों सहित भारतीय वैज्ञानिकां को हार्दिक बधाइयाँ देते हैंं।

    धरती पीड़ा से कराह रही है:

    संसार के लोगों ने समस्याओं के हल के लिए लड़ाई का रास्ता खोज निकाला है। मानव जाति को इसके अलावा कोई सभ्य तरीका समझ में नहीं आता है। पति-पत्नी आपसी मतभेद के चलते एक दूसरे को जान से मार देते हैं। देशों के बीच आपसी मतभेद के चलते युद्ध होते हैं। एक-दूसरे को मारने के लिए बड़े-बड़े घातक परमाणु बम बन गये हैं। सारी मानव जाति का विनाश करने के लिए युद्धों की जमकर तैयारी करते चले जा रहे हैं। मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि संसार की मानव जाति ने अपने आपसी मतभेदों को हल करने का अब तक जो तरीका ईजाद किया है, वह युद्ध और आतंकवाद है। मनुष्य आपसी मतभेदों के हल के लिए पाषाण युग में पत्थरों से लड़ता था। इसके बाद लाठी-डण्डे से लड़ाईयाँ हुई। थोड़ा और विकास हुआ तो तलवारों-भालों से लड़ा गया। बुद्धि का और विकास हुआ तो मनुष्य बन्दूकों से लड़ा। उसके बाद अब परमाणु बमों और मिसाइलों से तथा आधुनिक रासायनिक एवं जैविक हथियारों लड़ने की तैयारी कर रहा है।

    महापुरषों के विचार:

    एलिजाबेथ बैरेट ब्राउनिंग- पृथ्वी स्वर्ग से भरी हुई है….लेकिन इसकी अनुभूति पवित्र हृदय वाला ही कर पाता है। कार्ल सागन- विशाल ब्रह्मांडीय अखाड़े में पृथ्वी एक बहुत छोटा सा मंच है। खलील जिब्रान- ये मत भूलो की धरती तुम्हारे पैरों को महसूस करके खुश होती है और हवा तुम्हारे बालों से खेलना चाहती है। जॉन मुइर- हजारों थके, अचंभित, अति सभ्य लोग अब ये जानने लगे हैं कि पहाड़ों पर जाना घर जाना है कि जंगल एक जरूरत हैं। चीफ सीयेटेल- पृथ्वी हमारी नहीं हम पृथ्वी के हैं। हेनरी डेविड थोरो- एक अच्छे घर का क्या उपयोग है अगर आपके पास इसे बनाने के लिए एक सहनशील ग्रह नहीं हैं। महात्मा गाँधी- पृथ्वी सभी मनुष्यों की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन लालच पूरा करने के लिए नहीं। चक पल्ह्न्युक- जो पृथ्वी को नरक जैसा अनुभव करा रहा है वो हमारी अपेक्षा है कि स्वर्ग जैसा होना चाहिए।

    काश! तुम अंतरिक्ष से देखने के लिए यहाँ होते:

    स्टीवन राईट- एक बार मेरे एक दोस्त ने मुझे एक पोस्ट कार्ड भेजा जिस पर अन्तरिक्ष से ली हुई पूरे पृथ्वी की फोटो थी पीछे लिखा था, ‘‘काश तुम यहाँ होते। क्रिस डी लेसी- तुम पृथ्वी से जो लेते हो, उसे वापस कर देना चाहिए, यही प्रकृति का तरीका है। टेरेंस मैककेना- शैतानी सभ्यता इस पृथ्वी ग्रह के सिर पर तानी एक भरी हुई बंदूक है।  अमेरिकी कहावत- हमें यह ग्रह हमारे पूर्वजों से उत्तराधिकार में नहीं मिला, हम इसे अपने बच्चों से उधार में लेते हैं। बिल कोस्बी- मनुष्य ही इस पृथ्वी पर एक मात्र प्राणी है जो अपने बच्चों को घर वापस आने की इजाजत देता है। खलील जिब्रान- पेड़ वो कविताएँ हैं जो पृथ्वी आकाश पर लिखती है। संतोष कलवार- भगवान ने पृथ्वी पर स्वर्ग बनाया लेकिन इंसान ने नरक।

    धरती जीवों की भी माता है:

    युरी गागरिन- मैं पृथ्वी देख रहा हूँ ! यह बहुत खूबसूरत है। स्टीवन रेडहेड- जिन्दगी वो है जो आप इसे बनाते हैं, धरती पर स्वर्ग या नर्क। एस0जी0रेन्बोल्ट- बिना पृथ्वी के मानव जाति घर के बिना मानवता के सामान है। एमी बी0- पृथ्वी एक कैनवास है, और परमेश्वर कलाकार है। मारिओ स्टिंगर- ये सिर्फ ‘‘हमारी’’ दुनिया नहीं है। लौरेल मेरी सोबोल- स्वस्थ पृथ्वी स्वस्थ निवासियों के बराबर है। तोबा बीटा- धरती माँ शायद पसंद ना करे जिस तरह हम उसे जख्म देते है। जीनेट वाल्स- यदि आप खुद को ईश्वर के प्रेम की याद दिलाना चाहते है, तो बस सूर्योदय देख लीजिये। जैक्स-एवस कौस्टो- पानी और हवा, दो महत्त्वपूर्ण द्रव्य जिस पर हर प्रकार का जीवन निर्भर करता है, वैश्विक कचरे के डिब्बे बन गए हैं। मार्टिन क्रूज स्मिथ- क्योंकि प्रकृति के लिए मानव गतिविधि इतिहास में घटी सबसे बड़ी परमाणु दुर्घटना से भी बदतर है।

    यदि धरती मरती है तो हम कैसे जीवित रह सकते हैं:

    रेनर मारिया रिलके- फिर से बसंत आ गया है पृथ्वी एक बच्चे की तरह है जिसे कविताएँ अच्छी तरह से याद हैं। संतोष कलवार- इस नीले चमकते ग्रह पर बिताया हर एक पल कीमती है इसलिए इसे सावधानी से प्रयोग करो। पृथ्वी माँ इतना अधिक रोई कि उनके पास खुशियों की जमीन से अधिक आंसुओं के दरिये हैं। पाउलो कोएलो- हम इतने अभिमानी कैसे हो सकते हैं? यह ग्रह हमेशा शक्तिशाली था, है और रहेगा, हम इसे नष्ट नहीं कर सकते, अगर हम अपनी सीमा लांघते हैं तो ये ग्रह बस हमें बस अपनी सतह से मिटा देगा और खुद जीवित रहेगी, वे इस बारे में बात क्यों नहीं शुरू करते कि ग्रह हमारा ही विनाश ना कर दे। आर्थर टोफटे-ये ग्रह मर रहा है मानवजाति इसे नष्ट कर रही है…अगर पृथ्वी मरती है, तुम मरते हो।

    जन्म लेना सबसे बड़ा सौभाग्य है:

    स्टीव मराबोली- जब लोग मुझसे कहते हैं कि वे जिम नहीं ज्वाइन कर सकते हैं, मैं कहता हूँ बाहर जाओ; पृथ्वी ग्रह एक जिम है और हम पहले से ही इसके सदस्य हैं, दौड़ो, कूदो, पसीना बहाओ, और तुम्हारे पास जो प्राकृतिक सम्पदा है उसका आनंद उठाओं। जैक्स ईव्स कोस्टे- जन्म से ही, इंसान अपने कन्धों पर गुरूत्वाकर्षण का बोझ उठाये रहता है। वह पृथ्वी से बंधा रहता है। लेकिन एक व्यक्ति को बस सतह से थोड़ा नीचे जाना होता है और वो स्वतंत्र हो जाता है। स्टीवन एम्0 ग्रीयर- हम ऐसे बिंदु पर पहुँच रहे हैं जहाँ हमने पृथ्वी पर जो बोझ रखा है यदि उसे खुद नहीं हटाते तो पृथ्वी को उसे हटाना होगा। विलियम ऐ0एंडर्स- हम इतनी दूर चाँद का पता लगाने आये, और जो सबसे जरूरी चीज है वो ये कि हमने पृथ्वी को खोज लिया।

    उठ जाग मुसाफिर अब भोर भयी अब रैन कहा जो सोवत है :

    आप देखे यूरोप के 27 देश जो द्वितीय विश्व महायुद्ध में जमकर एक-दूसरे से लडे़े थे। इन देशों ने आपसी विश्वव्यापी समझदारी विकसित करके अपने-अपने देश के ऊपर एक यूरोपियन संसद बना ली। इनमें से 16 देशों ने यूरोपियन करेन्सी निर्मित करके एक अर्थ व्यवस्था बना ली। पूर्व जर्मनी तथा पश्चिम जर्मनी आपस में 70 वर्षो तक आपस में खूब लड़ते रहे। जर्मनी ने बर्लिन की दीवार खड़ी करके अपने को दो टुकड़ों में बॉट लिया। जर्मनवासियों में वर्षो बाद यह समझदारी विकसित हुई कि आपस में लड़ना ठीक नहीं है। ये समझदारी आते ही दोनों देश आपसी परामर्श करके मिलकर एक हो गये। दोनों देशों को बांटने वाली बर्लिन की दीवार तोड़ डाली गयी। सोचे ये देश आपस में लड़ते समय सुखी थे या फिर आपसी परामर्श करके मिलजुल कर रहने के निर्णय से अब ज्यादा सुखी हैं। इन देशों ने युद्ध की जगह परामर्श को चुनने की समझदारी दिखाई। परामर्श से भ्रान्तियाँ दूर हो जाती है और साझा लाभ की निश्चयात्मक स्थिति तक पहुँच जाते हैं।

    पल में परलय होगी तो बहुरि करेगा कब?

    अब तो दो ही अंतिम विकल्प हैं कि या तो मिलजुल कर अपनी-अपनी राष्ट्रीय सरकारों के ऊपर ‘विश्व की एक सरकार बनाये’ अन्यथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवादियों द्वारा विश्व को अपनी मर्जी से चलाने के लिए छोड़ दें। उत्तरी एवं दक्षिणी कोरिया की समस्या, अमेरिका और इराक की समस्या, अमेरिका एवं अफगानिस्तान के तालिबानों एवं पाकिस्तान की समस्या, अमेरिका और ईरान की समस्या, इजरायल और फिलिस्तीन की समस्या, कश्मीर के मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान, सीरिया की समस्या व तालिबान आदि की समस्यायें दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही हैं। बारूद के ढेर पर बैठी है यह दुनिया, एटम बमों के जोर पर ऐठी है यह दुनिया। हमने धरती, पाताल तथा अन्तरिक्ष में मानव जाति को सम्पूर्ण सर्वनाश करने के लिए मिसाइलें फिट कर रखी हैं।

    दृष्टिकोण विश्वव्यापी बनाना चाहिए:

    सारी सृष्टि का रचनाकार परमपिता परमात्मा सम्पूर्ण धरती के समस्त मानवजाति को एकसमान रूप से प्रेम करता है। परमपिता परमात्मा की तरह ही हमें भी अपनी आत्मा के पिता परमात्मा की तरह विश्वव्यापी दृष्टिकोण का बनना चाहिए। यदि आप अपने परिवार को अच्छा बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं तो आप इस भावना को बढ़ाते हुए पूरे देश के निर्माण के लिए भी प्रयास करें। यदि आप अपने देश के निर्माण के लिए अच्छा कार्य कर रहे हैं तो इस भावना को बढ़ाते हुए पूरे विश्व को कुटुम्ब की तरह बनाने के लिए भी कार्य करें। कहने का तात्पर्य यह है कि आप अच्छा काम कर रहे हैं तो उसे परिवार या देश की सीमाओं में सीमित न करें। हमें अपने दृष्टिकोण को निरन्तर प्रयास करके विश्वव्यापी बनाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद एवं तृतीय विश्व युद्ध की युद्ध भूमि बनने से पहले भारत को अपनी प्राचीन संस्कृति, सभ्यता तथा संविधान के अनुरूप सारे विश्व को एक कुटुम्ब बनाने की आवश्यकता है। भारत बचेगा तभी जब वह आगे बढ़कर सारी दुनिया को बचायेंगा वरना पूरा विश्व जलकर राख हो जायेगा। जगत गुरू भारत की चिंता अब सारे विश्व को बचाने की होनी चाहिए। अगला एक कदम बढ़ाकर ‘जय जगत’ के उद्घोष को साकार करना है। अर्थात सारी वसुधा को कुटुम्ब बनाना है।

    चलो दुनियाँ को स्वर्ग बनाये हम प्रेम से और प्यार से:

    यह सृष्टि केवल मनुष्य के लिए ही नहीं है वरन् इस पर जीव-जन्तुओं व वनस्पति का भी पूरा अधिकार है। अतः मनुष्य को उस महान रचनाकार परमात्मा द्वारा प्रदत्त अपार संसाधनों का उपयोग विवेकी ढंग से करना चाहिए तथा उन शक्तियों का सम्मान करना चाहिए जिन्होंने अरबों वर्ष पूर्व यह ब्रह्ममाण्ड सहित यह प्यारी धरती हमें सौंपी है। अब इन्सानी सोच को बदल डालने के लिए अनेक अवसर आ जुटे हैं। मानव मन में जगमगाते हुए ये ग्रह-नक्षत्र, आकाशगंगायें और नीहारिकायें चिरअतीत से यह जिज्ञासा जगाते रहे हैं कि क्या इस विराट ब्रह्ममाण्ड में हम अकेले ही हैं अथवा पृथ्वी से बाहर और भी कहीं जीवन है। अब इन्सानी सोच को बदल डालने के लिए अनेक अवसर आ जुटे हैं।

    पृथ्वी एक राष्ट्र है:

    आज जहाँ हम अपनी छोटी सी धरती को द्वीपों और देशों में बांटते फिर रहे हैं। इसके छोटे से टुकड़े के लिए महाविनाश के सरंजाम जुटाते फिरते है, वहीं अब वैज्ञानिकों ने चेतावनी दे डाली है कि मानव अभी से अपने को विश्व परिवार का ही नहीं वरन् ब्रह्ममाण्ड परिवार का सदस्य मानकर अपनी सोच में बदलाव लाए। नया युग प्रस्तुत करने वाली इस नयी सदी में मनुष्य देश-जाति और धर्मो की संकीर्ण परिधि में बॅधा न रहेगा। समूची पृथ्वी एक राष्ट्र का रूप लेगी, इसमें एक धर्म होगा, एक भाषा बनेगी और एक संस्कृति पनपेगी। अगले दिनों हमें अपना परिचय धरती के निवासी के रूप में देना पड़ेगा तभी हम ब्रह्ममाण्ड के अन्य सुविकसित प्राणियों से एकता, आत्मीयता तथा ज्ञान-विज्ञान का आदान-प्रदान स्थापित कर पाएँगे।

    सामाजिक न्याय सुलभ हो:

    सीएमएस विगत 55 वर्षों से लगातार विश्व के दो अरब से अधिक बच्चों के सुरक्षित भविष्य हेतु विश्व एकता व विश्व शान्ति का बिगुल बजा रहा है परन्तु हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के ऑफिसियल एन0जी0ओ0 का दर्जा मिलने के बाद विश्व पटल पर इसकी प्रतिध्वनि और जोरदार ढंग से सुनाई देगी। सीएमएस की सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति का मूल यही है कि सभी को सामाजिक न्याय सहजता से मिल सके, मानवाधिकारों का संरक्षण हो, भावी पीढ़ी के सम्पूर्ण मानव जाति की सेवा के लिए तैयार किया जा सके, यही कारण है सर्वधर्म समभाव, विश्व मानवता की सेवा, विश्व बन्धुत्व व विश्व एकता के सद्प्रयास इस विद्यालय को एक अनूठा रंग प्रदान करते हैं जिसकी मिसाल शायद ही विश्व में कहीं और मिल सके। विश्व का धन लड़ाई में नहीं भलाई में खर्च होना चाहिए। सीएमएस बच्चों को इस तरह से प्रशिक्षित कर रहा है कि वे बड़े होकर दुनिया से लड़ाईयाँ मिटाकर विश्व एकता तथा विश्व शान्ति की स्थापना करें। हरित क्रांति एवं श्वेत क्रांति से देशों में अकूत सम्पत्ति है पर वह धन युद्ध पर खर्च कर दिया जाता है। सीएमएस के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करके सभी लोगों का भौतिक तथा सामाजिक कल्याण करेंगे।

    • लेखक सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ के संस्थापक-प्रबन्धक एवं प्रख्यात शिक्षाविद् हैं

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