न्याय हुआ और दूर हुई गलतफहमी

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
योगी आदित्यनाथ ने अंतिम सीमा तक धैर्य का परिचय दिया, गठबन्धन धर्म का पालन किया, अपने मंत्रिमण्डलीय सहयोगी से संविधान की भावना के अनुरूप कार्य की अपेक्षा की, इसके लिए उन्हें पर्याप्त अवसर दिया। लेकिन जब पानी सिर के ऊपर हो गया, ओमप्रकाश राजभर अपनी हठधर्मिता छोड़ने को तैयार नहीं हुए। वह संवैधानिक व गठबन्धन धर्म की भावना को चुनौती देते रहे, तब मुख्यमंत्री ने राज्यपाल से उन्हें पदमुक्त करने की सिफारिश की। यह अंतिम विकल्प था।
इस प्रकरण ने ओम प्रकाश राजभर के विषय मे अनेक तथ्य स्थापित किये है। पहली यह कि वह बड़ी गलतफहमी में थे, दूसरा वह संविधान की संसदीय व्यवस्था का मखौल बना रहे थे, तीसरा यह कि वह गठबन्धन धर्म की घोर अवहेलना कर रहे थे। चौथी बात यह कि वह अपने और अपने परिवार के लिए ही परेशान थे।
बताया जा रहा था कि वह स्वयं बड़ा मंत्रालय चाहते थे, जो मंत्रालय उन्हें दिया गया, उसमें उनका मन नहीं लग रहा था। अपनी हैसियत से अधिक वह लोकसभा चुनाव के लिए सीट मांग रहे थे। चर्चा थी कि इसके लिए वह कुछ अन्य दलों के सम्पर्क में भी थे। लेकिन कहीं भी उन्हें महत्व नहीं दिया गया। इन बातों से उनकी विश्वसनीयता भी समाप्त हुई थी। यह साबित हुआ कि वह अकेले अपनी पार्टी को मजबूत करने की स्थिति में नहीं है। उनकी यही गलतफहमी इस चुनाव में दूर हो गई। सभी सीटों पर उन्हें निराशा मिली।
दूसरी बात यह कि उन्होंने मंत्री रहते हुए संविधान की भावना का उल्लंघन किया। संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना से कार्य करती है। इसीलिए मंत्रीगण पद के साथ-साथ गोपनीयता की शपथ लेते है। यदि किसी एक मंत्री के खिलाफ विधायक निंदा प्रस्ताव पारित कर देती है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देने पड़ता है। ओमप्रकाश राजभर ने इसी संवैधानिक भावना व व्यवस्था का निरादर किया था। वह कभी भी अपने मंत्रिपद के दायित्वों के बेहतर निर्वाह के लिए चर्चित नहीं रहे। उन्होंने जब भी मुंह खोला अपनी ही सरकार पर हमला बोलते रहे। धमकी देते रहे, लेकिन असहमति के बाद भी मंत्रिमंडल में बने रहे।
तीसरी बात यह कि उन्होंने गठबन्धन धर्म का पालन नहीं किया। असहमति के बाद गठबन्धन से अलग हो जाना अनुचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन गठबन्धन में रहकर लगातार उसी पर हमला बोलना अनुचित है। सलाह देना अलग विषय है, लेकिन अनुचित दबाब बनाने का प्रयास निंदनीय होता है। ओमप्रकाश राजभर यही कर रहे थे। ऐसे में योगी आदित्यनाथ के सामने उनको हटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

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