संजय दत्त की बायोपिक नहीं, उनका चेहरा साफ़ करने के लिए बनाई गई है संजू

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दयानन्द पांडेय

कल रात संजू देखी। बहुत ही पावरफुल फ़िल्म है । मैं तो बहुत देर तक नि:शब्द रह गया। बहुत से लोगों की आत्मकथा पढ़ी है । जीवनी पढ़ी है । बायोपिक फ़िल्में देखी हैं । रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी से बेहतर बायोपिक अब तक नहीं बनी , आगे भी खैर क्या बनेगी । तीन फ़िल्मी लोगों की बायोपिक देखी है । एक मीना कुमारी पर मीना कुमारी की अमर कहानी जो बहुत ही लिजलिजी फ़िल्म थी और भटकी हुई भी । मीना कुमारी की फ़िल्मी क्लिपिंग से लदी-फदी । कोई ओर-छोर नहीं । सिर्फ़ मीना कुमारी के नाम पर भावनात्मक दोहन कर दर्शकों को सिनेमाघर तक बुला लिया गया था । दूसरी , मराठी अभिनेत्री हंसा वाडेकर पर श्याम बेनेगल की फ़िल्म भूमिका जिस का रोल स्मिता पाटिल ने किया था । उन के क्रूर पति के रूप में अमोल पालेकर थे । शानदार फ़िल्म थी । और अब संजय पर बनी संजू । राज कुमार हिरानी की यह फिल्म इन तीनों में बहुत बेहतर है । बहुत शानदार । लेकिन इस संजू को सिर्फ़ एक कमी के कारण हम अप्रतिम फ़िल्म कहते-कहते रुक से गए हैं । यह फिल्म संजय दत्त की बायोपिक कम , संजय दत्त का चेहरा साफ़ करने के लिए ज़्यादा बनाई गई है । बस यह संजय दत्त की तरफ से क़दम-क़दम पर सफाई देने वाली फ़िल्म के रूप में न बनाई गई होती , अपने सहज रूप में , सहज गति में चली होती , इसी ध्यान से लिखी और निर्देशित की गई होती तो निश्चित मानिए यह कालजयी फ़िल्म भी होती । सिर्फ़ पैसा कमाने वाली फ़िल्म नहीं होती। गाडफादर जैसी क्लासिक फ़िल्में भी आख़िर हमारे सामने हैं ।

इस फ़िल्म को देखने के बाद ज़रा ठहर कर सोचिए तो क़ायदे से यह सुनील दत्त के त्याग , साहस और धैर्य की फ़िल्म है । अब चूंकि फ़िल्म के लेखक और निर्देशक को सुनील दत्त की तरफ से कोई सफाई नहीं देनी थी , उन का चेहरा साफ़ नहीं करना था सो उन की भूमिका परेश रावल जैसे सधे हुए अभिनेता को निर्विकार ढंग से थमा दी है और परेश रावल ने उसी सहजता से उन्हें जी लिया है । फ़िल्म देख कर सुनील दत्त के प्रति करुणा और संवेदना जगती है , संजय दत्त के प्रति नहीं । यह तो फिल्म है लेकिन असल जीवन में संजय दत्त को ले कर सुनील दत्त ने कितना अपमान , कितना कष्ट , कितना लांछन और कितना टूटन जिया होगा , वह ही जानते रहे होंगे । फिल्म भी थोड़ा बहुत बताती ही है । जानने वाले जानते हैं कि संजय दत्त का 1993 के मुम्बई की आतंकवादी बम ब्लास्ट घटना में कितना हाथ था , कितना सहयोग था पर एक सुनील दत्त के सामाजिक और राजनीतिक पुण्य-प्रताप के कारण ही वह आतंकवादी घटना से जैसे-तैसे क़ानूनी तौर पर बरी हो पाए । सचमुच नहीं । होते तो इस फिल्म का इस एक बात पर इतना जोर नहीं होता कि संजय दत्त टेररिस्ट नहीं हैं। ए के – 56 रखने पर सिर्फ़ आर्म्स एक्ट पर सजा नाकाफी हैं संजय दत्त पर । क़ानून के जानकार और मुम्बई के लोग भी जानते हैं । जिन परिवारों के लोग तब मरे थे, उन से पूछिए ।

पुरानी कहावत है कि आदमी परिस्थितियों का दास होता है । संजय दत्त के लिए इस संजू फिल्म में बार-बार यही जतलाने की कोशिश भी की गई है । जब कि सच यह नहीं है । परिस्थितियों का दास आदमी एक बार, दो बार हो सकता है , बार-बार नहीं । फिर भी अगर यही तर्क मान लिया जाए कि आदमी परिस्थितियों का दास होता है तो इस बिना पर तो सभी ड्रगिस्ट , सभी आतंकवादी , सभी औरतबाज़, सभी अपराधी बरी हो जाएंगे । जैसे संजय दत्त बरी हो गए हैं । संजय दत्त भले क़ानूनी रूप से बरी हो गए हैं, इस फिल्म के मार्फत अपना चेहरा साफ़ करने की सफाई पेश कर गए हैं लेकिन तथ्य अपनी जगह हैं। बहुत से हत्यारे और आतंकवादी कानून की आंख में धूल झोंक कर , पैसे के दम पर बरी हो जाते हैं , संजय दत्त इकलौते नहीं हैं । हां साढ़े तीन सौ से अधिक औरतों को भोगने का संजय दत्त का रिकार्ड ज़रुर अनूठा है । इस संख्या में उन्हों ने वेश्याओं की गिनती छोड़ दी है ।

अभी कुछ समय पहले एक फिल्म तलवार आई थी । वह भी बहुत बेहतरीन फिल्म थी । नायाब । जिसे तलवार दम्पति ने पैसा खर्च कर अपनी बेटी की हत्या के बाबत अपना चेहरा साफ़ किया था । हाईकोर्ट द्वारा जेल से भी बरी हो गए हैं । लेकिन जानने वाले जानते हैं कि तलवार दम्पति कितना बरी हैं , कितना दोषी। बहरहाल यह एक ग़लत ट्रेंड बन रहा है कि पैसे वाले लोग पैसा खर्च कर अपनी सफाई में फिल्म बना कर , किताब लिख-लिखवा कर अपने को महात्मा गांधी साबित करने लगे हैं । परिस्थितियों का दास साबित कर सारा ठीकरा बिकाऊ मीडिया पर फोड़ देना बहुत आसान है किसी फिल्म के मार्फत । आप दादागिरी की तर्ज पर गांधीगिरी कर सकते हैं और फ़िल्म कामयाब कर सकते हैं तो यह कौन सा कठिन काम है भला । पर यह न भूलिए कि कुछ दोगले इतिहासकारों के इतिहास लेखन से अभी तक इतिहास के परसेप्शन तो नहीं बदले हैं । लोग जानते हैं कि इतिहास क्या है और दोगले इतिहासकार क्या लिख रहे हैं या लिख गए हैं । फिल्मों से , किताब से आप के या किसी के पाप नहीं धुलते , परसेप्शन नहीं बदलते । रावण , रावण ही रहता है , राम नहीं बन जाता । ठीक वैसे ही जैसे गंगा नहाने से सचमुच पाप और अपराध नहीं धुलते । पाप और अपराध परछाई की तरह आप के साथ रहते हैं । मरने के बाद भी नहीं मिटते ।

रही बात संजू फिल्म की तो फिल्म के लिहाज से वंडरफुल फिल्म है । बतौर अभिनेता रणवीर कपूर ने अपने जीवन का श्रेष्ठ अभिनय परोसा है । रणवीर में संभावनाएं बहुत हैं अभी । उन के अभिनय में सिर्फ़ ड्रामा ही नहीं जीवन भी है , सादगी और निश्छलता भी भरपूर । संजय दत्त को जैसे शीशे में उतार दिया है अपने अभिनय में रणवीर कपूर ने । तिस पर उन्हें परेश रावल जैसे अनूठे अभिनेता का साथ मिल गया है । दोनों की बीट और ट्यून ज़बरदस्त है । मनीषा कोइराला ने भी नरगिस को जीने की कोशिश की है । अमरीकी दोस्त भी गज़ब है । विकी कौशल ने गज़ब अभिनय किया है । काश कि ऐसा समर्पित दोस्त सब के जीवन में हो । सोनम कपूर भी भली लगी हैं । और बोमन ईरानी के अभिनय के क्या कहने । पूरी फिल्म की पटकथा , परिकल्पना और निर्देशन लाजवाब है । बहुत दिन बाद इतनी कसी और सधी हुई फिल्म देखने को मिली । शार्प और सुंदर ।देखते समय आप एक क्षण के लिए भी फिल्म से फुर्सत नहीं ले सकते । सब कुछ कसा और सधा हुआ । देखने के बाद भी फ़िल्म मन में निरंतर चलती और गूंजती रहती है । अनुष्का शर्मा जैसी हिरोइन टाइप , पैसे वाली संपन्न लेखिका देखना किसी हिंदी फिल्म में ही मुमकिन है । एक दृश्य में तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जिस तरह खिल्ली उड़ाई गई है वह न सिर्फ़ बहुत अभद्र है बल्कि अटल जी के चरित्र से भी मेल नहीं खाती । यह निर्देशक राजकुमार हिरानी की हार और संजय दत्त का अपना फ्रस्टेशन हो सकता है , सच नहीं । इसी तरह इंडियन मीडिया पर जिस तरह फ़िल्म टूट कर बरसती है तो मीडिया की कलई खोलती हुई हिट भी ख़ूब करती है लेकिन जानने वाले जानते हैं कि ऐसी सभी ख़बरें मीडिया में पुलिस की अनआफिशियल ब्रीफिंग पर आधारित होती हैं , जिन की ज़मीन भी कहीं न कहीं होती ही है । आधारहीन नहीं होती यह ब्रीफिंग भी । बिकाऊ मीडिया अब दूध की धुली नहीं है , मुम्बई में तो माफ़िया के दबाव में वैसे ही रहती है जैसे फ़िल्म इंडस्ट्री । आकंठ पाप में डूबी हुई है मीडिया भी पर संजय दत्त जैसा दाग़ी व्यक्ति जब मीडिया पर अपने फ्रस्ट्रेशन का घड़ा फोड़ता दीखता है तो हंसी आती है । सुनील दत्त जैसा व्यक्ति भी जब अख़बार के संपादक के पास अपने नालायक , ड्रगिस्ट और टेररिस्ट बेटे का उलाहना ले कर जाता है तो खीझ होती है ।

इस फिल्म में पहली बार गीतकारों को इतना सम्मान मिलता देख कर भी ख़ुशी हुई । गीतकारों को मुश्किल समय में याद कर उन्हें उस्ताद कह कर गुहराना अभिभूत करता है और चकित भी । अभी तक लोग फ़िल्मी गाने याद तो करते हैं पर अकसर गायकों के नाम से या कभी-कभार संगीतकारों के नाम से । लेकिन संजू में हर मुश्किल की घड़ी में जब उस्ताद कह कर गीतकारों को सुनील दत्त की भूमिका में परेश रावल याद करते हैं और अचानक बोलते हैं मज़रूह सुल्तानपुरी ! तो फ़िल्म का स्वाद बेहिसाब बढ़ जाता है । और वह उन का गीत याद करते हैं , रुक जाना नहीं , तू कभी हार के / कांटों पे चल के मिलेंगे साए बहार के ! नरगिस से शादी पर हाजी मस्तान के विरोध को वह एक दूसरे उस्ताद साहिर लुधियानवी को याद करते हैं , न सिर झुका के जियो , न मुंह छुपा के जियो ! आख़िर में एक तीसरे उस्ताद आनंद बक्षी आते हैं , कुछ तो लोग कहेंगे , लोगों का काम है कहना ! कुछ तो लोग कहेंगे नाम से ही अनुष्का शर्मा उन की जीवनी की किताब ले कर उपस्थित होती हैं । इस के पहले भी आनंद बक्षी मिलते हैं हाथी मेरे साथी के एक गीत के मार्फ़त , दुनिया में रहना है तो काम करो प्यारे ! इन उस्ताद लोगों को वह नरगिस की यादों को झरोखे से याद करते हैं तो बात में भावनात्मक और संवेदनात्मक दम आ जाता है । संजू फिल्म इस लिए भी याद की जानी चाहिए कि नरगिस और राजकपूर के परिवार का यह समानुपातिक मिलन भी है ।

रेखा , माधुरी दीक्षित जैसी अभिनेत्रियों के साथ संजय दत्त का प्रेम संबंध और गुपचुप शादी जैसे घटनाएं इस फ़िल्म में विलुप्त हैं । उन की पहली पत्नी ऋचा शर्मा और उन से उन की बेटी भी अनुपस्थित है फ़िल्म से । दूसरी पत्नी भी । मान्यता से उन के विवाह के प्रसंग और जुड़े विवाद भी गुम हैं । ऐसी बहुत सी नालायकी और फ़रेब भी संजय दत्त के छुपा ले गए हैं निर्देशक । संजय की बहन प्रिया दत्त का सारा अवदान फ़िल्म में भुला दिया गया है । तब जब कि प्रिया सुनील दत्त के जाने के बाद जिस तरह से संजय के साथ संघर्ष में कंधे से कंधा मिला कर खड़ी दिखी थीं , वह अदभुत था । संजय के वकील भी लापता हैं । सारी कायनात एक तरफ दूसरी तरफ एक बाला साहब ठाकरे न होते तो भी संजय दत्त का टेररिस्ट के जुर्म से छूट्टी पा पाना नामुमकिन था । लेकिन बाला साहब ठाकरे भी फ़िल्म से अनुपस्थित हैं । फिल्म में संजय दत्त का चेहरा साफ़ करने के लिए इसी तरह जहां बहुत से तथ्य छुपाए गए हैं वहीँ बहुत से तथ्य काल्पनिक रूप से गढ़े गए हैं । दाऊद इब्राहीम से सीधा संपर्क था संजय दत्त का। आमिर खान , शाहरुख़ खान जब अंडरवर्ल्ड के मार्फत संजय दत्त का नुकसान पर नुकसान कर रहे थे , यह सब भी फिल्म से पूरी तरह गोल है । नरगिस संजय का ड्रगिस्ट रूप नहीं जानती थीं , यह भी झूठ है । ऐसी बहुतेरी बातें हैं । जब बायोपिक ही बना रहे थे , पूरी बायोपिक बनाते । सच-झूठ करने से बातें क्या छुप जाती हैं । संजय दत्त का बिगड़ैल बचपन और स्कूली जीवन भी लापता है। तो यह बायोपिक बनाने की ज़िद भला क्यों थी । आप घोषित कर देते कि संजय दत्त के जीवन से प्रेरित या आधारित। पर शायद इस तरह दोस्ती नहीं निभ पाती । चेहरा साफ़ करने का मकसद कामयाब नहीं हो पाता। बावजूद इन सब बेवकूफियों के यह मकसद हासिल तो नहीं हो पाया है ।

हर नालायक और बिगड़े लड़के के पिता को यह फ़िल्म ज़रुर देखनी चाहिए । शायद सुनील दत्त के धैर्य को देख कर उसे सीख मिले। धैर्य धारण करने का साहस भी । वह अभागा पिता यह भी सोच सकता है कि उस का लड़का कितना भी नालायक और बिगड़ा हुआ हो पर संजय दत्त से तो बहुत बेहतर है । संजय दत्त जैसा ड्रगिस्ट, नशेड़ी, मनबढ़ और टेररिस्ट लड़का भगवान किसी को न दे । इस लिए भी कि दुनिया के सारे पिता सुनील दत्त जैसा धैर्य , पैसा, फ़िल्मी लोकप्रियता , सामाजिक और राजनीतिक जीवन नहीं पाते। विधु विनोद चोपड़ा , राजकुमार हिरानी को सुनील दत्त के जीवन पर भी एक फिल्म बनाने की सोचनी चाहिए। इसी जूनून और इसी समर्पण के साथ । वह शायद क्लासिक बन जाए ।

सरोकारनामा से साभार

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