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    जस दे तस पाइयां

    By June 11, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    जी क़े चक्रवर्ती

    केंद्र में मौजूदा सरकार के चार वर्ष पूरे होते ही वर्ष 2019 में होने वाले चुनाव की तैयारियों के मध्येनजर पार्टियों में हलचल होना स्वाभाविक सी बात है। अभी कुछ ही दिनों पहले मध्य प्रदेश के मंदसौर में कांग्रेस अध्यक्ष ने एक किसान रैली में संबोधन के दौरान बोलते हुए उन्होंने जनता से वादा किया कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीत कर आती हैं तो वे दस दिनों के भीतर किसानों के कर्ज माफ कर देंगे।

    इस बात से यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस अध्यक्ष अब भारतीय राजनीति का पाठ अच्छी तरह से पढ़ चुके हैं इसलिए वे एक परिपक्व राजनेता की भांति बोलने में सक्षम हो गए हैं। देश के आजादी काल से लेकर आज वर्त्तमान समय तक जिस तरह से देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने जनता से तरह-तरह के चुनावी वादे किए लेकिन वह वादे कभी पूरे नहीं हुए या नाम मात्र कहने भर का ही रहा। जनता बार-बार ऐसे झूठे वादें और अवस्वानों से छली जाती रही है और यह सिलसिला बादस्तूर लगातार जारी है। वास्तव में देखा जाये तो यह जनता का भोलापन और सहनशक्ति ही है कि वह इसके अंतिम पायदान तक पहुंचने तक शायद इसे सहन भी करे लेकिन अब देश की जनता इसे और आगे सहन करने की मूड में नहीं दिखाई देती है इसके साथ ही जनता अब इतनी भोली भी नहीं रह गई है कि वह राजनेताओं के लोकलुभावन वादों एवं उनके द्वारा दिए जाने वाले प्रलोभनों के झांसे में आ जाये।

    जिस तरह जनता के साथ आजतक होता रहा, ठीक उसी तरह उसने उनको उन्ही की भाषा में अब उत्तर देना भी शुरू कर दिया है, जिसके उदाहरण स्वरुप अभी हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश के उप चुनाव के परिणामों में हम देख सकते हैं कि वहां पर सपा- बसपा गठबंधन को जीत मिली लेकिन वहां पर मिली जीत को इन दोनों पार्टियों के अतिरिक्त भाजपा ने किस दृष्टि कोण से देखा-समझा यह कहना तो मुश्किल है लेकिन यह अवश्य है कि यहाँ मिली जीत हार में वहां के नागरिकों की प्रमुख भूमिका रही है जोकि इस बात का परिचय है कि मौजूदा समय में देश की जनता का सभी पार्टियों पर से विश्वास उठ चुका है जिसका दूरगामी प्रभाव आगे आने वाले दिनों में देश में होने वाले चुनावो में स्पष्ट झलकेगा।

    सबको देखा बार-बार हमको देखो एक बार जैसे दिए गए नारो का अंतिम हश्र क्या हुआ यह भी जनता पहले ही देख चुकी है। अब यहाँ यह प्रश्न उठना लाजमी है कि जनता देश में होने वाली आगामी चुनाव में आखिर वोट किसको और क्यों करें? क्योकि आजतक जनता ने देश के लगभग सभी पार्टियों के हाल से अवगत हो चुकी है आज उसके सामने सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि वह किसको वोट दें अथवा नही। राजनेताओं के गलत आचरणों एवं झूठे आस्वाशनों के कारण स्वमं राजनितिक लोगो ने भारतीय जनमानस के मध्य अपना विश्वास खो दिया है जिसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं। देश की जनता का विश्वासनियता खोने के बाद से देश में हुए चुनावों के परिणामो में स्पष्ट दिखाई दिया कि देश के किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत न मिलने से अकेले एक पार्टी को सरकार बनाने का मौका नहीं मिल पा रहा है इसके ताजे उदाहरण स्वरूप अभी कर्नाटक में हुए विधान सभा चुनाव में आये परिणामो को देखें तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आगे भविष्य में किसी भी पार्टी द्वारा पूर्ण बहुमत की सरकार बन पाना मुश्किल होगा।

    इन्ही बातों के मद्देनज़र लगभग सभी पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी, जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टियों के एकजुट होकर सयुंक्त मोर्चा गठित करने के अलावा भारतीय जनमानस को यह भी विश्वाश दिलाना होगा कि राजनीति में तीसरा विकल्प प्रस्तुत करने के लिए उनका विलय किसी अवसरवाद का परिणाम साबित नहीं होगा। भारतीय राजनीति में तीसरे विकल्प की गुंजाइश से इन्कार भी नहीं किया जा सकता क्योकि दुनिया के अनेक देशों में तीन विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दलों की मौजूदगी से लोकतंत्र को मजबूती मिली हुई है। जहाँ तक देश में तीसरे मोर्चे की बात को खारिज करने की है उसमें भाजपा एवं कांग्रेस इन दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों की अपनी-अपनी वजहें हैं।

    आदर्श रूप में बीजेपी यही चाहती है कि वह केंद्र में कांग्रेस पार्टी का एकमात्र विकल्प बनकर उभरे लेकिन पार्टी किसी अन्य सक्षम विकल्प के देश में उभरने को अपने लिए एक खतरे की तरह ही देख रही है जो कांग्रेस विरोधी वोटों में सेंध भी लगा सकती है। बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडु ने कहा कि “यह एक ऐसा प्रयोग है जो बार-बार विफल रहा है और यह होने वाला भी नहीं है।” वहीं पर कांग्रेस पार्टी भी ‘तीसरे मोर्चे’ के मामले को काफी संदेहपूर्ण दृष्टि से देख रही है। वहीँ उसे देश में किसी सक्षम विकल्प के उभरने से कांग्रेस को ‘सेकुलर वोट बैंक’ में सेंध लगती हुई दिखाई दे रही है क्योंकि यह उन सभी लोगों को एक विकल्प मुहैया करता है जो बीजेपी की राजनैतिक सोच के विरोधी हैं। जहां तक तीसरे मोर्चे या अन्य किसी विकल्प की बात है इसमें ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां ही शामिल होगी। यह बात पृथक है कि तीसरे विकल्प जैसे परिपाटी देश की जानता को स्वीकार होगी या नहीं यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन यदि जनता के सामने इसके अलावा और कोई दूसरा रास्ता भी नहीं हो तो ऐसे में भारतीय जनता शायद इसी विकल्प को स्वीकार कर लेने की उसकी मजबूरी होगी

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