राजनीति में रिश्तों का इमोशनल कार्ड

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राजनीति में रिश्तों के इमोशनल कार्ड की सूची लंबी है। आधुनिक प्रजातन्त्र में भी इसका महत्व है। लेकिन विकसित और विकासशील देशों की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में बहुत अंतर है। विकसित देशों में रिश्तों के कार्ड दुर्लभ होते है। अमेरिका में संवैधानिक प्रजातन्त्र को सवा दो सौ साल हो गए। इस लंबी अवधि में दो बार ही रिश्तों को राष्ट्रपति बनने का अवसर मिला। रूजवेल्ट के कई वर्ष बाद उनके भतीजे भी राष्ट्रपति बने थे। इसके आधी शताब्दी बाद पहले सीनियर बुश बाद उनके पुत्र जार्ज बुश राष्ट्रपति बने थे। यूरोपीय प्रजातन्त्र में भी ऐसे उदहारण दुर्लभ होते है। इसका प्रमुख कारण यह है कि वहाँ पार्टियों के नेता होते है, हमारे देश में अपवाद छोड़ दें तो नेताओं की पार्टियां हैं। इसलिए नेता अपनी चुनावी सुविधा के अनुरूप रिश्तों को नाम देते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में रिश्तों के कई इमोशनल कार्ड एक साथ चर्चा में आ गए। इसकी शुरुआत बसपा प्रमुख मायावती ने की। उन्होंने ऐलान किया कि वह किसी की बुआ नहीं है। इसके बाद सेक्युलर मोर्चे के संस्थापक शिवपाल यादव का बयान आया। इसमें उन्होंने भतीजे और भाई के साथ पुराने रिश्तों को याद किया। यह सब चल ही रहा था कि सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष के मंच पर पहुंचे। उन्हें आशीर्वाद दिया। यह रिश्तों पर उनका इमोशनल कार्ड था।
 शिवपाल यादव ने भी रिश्तों का कार्ड चला। वह सैफई परिवार और सपा के लिए किए गए अपने कार्यों की भावुक चर्चा करते है। कहते हैं कि जिन भतीजों को अपने बेटे से ज्यादा प्यार किया आज वही उनके सामने खड़े हो गये हैं। नेताजी की भी नहीं सुन रहे हैं। पूरा देश जानता है कि सपा और सैफई परिवार में जो कुछ भी है वह नेताजी की देन है। उन्होंने बताया कि नेताजी की बात उनके लिये ईश वचन होती थी। नेताजी ज्यादातर बाहर रहते थे। आने पर उन्हें कपड़े धुले और प्रेस किये हुये मिलते थे। कई बार तो वह अपने हाथ से उनके कुर्ते और धोतियां धुल दिया करते थे। जाते समय वह जो कह जाते थे उसे पूरा करना अपना धर्म समझता था। अब वह भी बेबस हैं।
सपा को इस मुकाम तक पहुंचाने में उन्होंने नेताजी के कन्धे से कन्धा मिलाकर मेहनत की है। लेकिन, अब अपमान का आलम यहां तक पहुंच गया था कि उन्हें पार्टी की बैठकों की सूचना तक नहीं दी जाती थी। सपा में अब चापलूसों और आधारविहीन लोगों की पौ बारह है। पार्टी में लगातार हो रही अपनी अनदेखी का जिक्र करते हुए शिवपाल ने बताया कि राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा विधायकों को एक होटल में दावत दी गयी थी। वह भी न्योते का इन्तजार कर रहे थे, लेकिन बुलावा नहीं आने पर वह इटावा चले गये। दोपहर दो बजे के बाद अखिलेश का फोन आया। पार्टी हित में मैने दूर की सोची और उल्टे पांव लखनऊ वापस आ गया। शिवपाल का कहना है कि तमाम झिड़कियों और अपमान के बावजूद वह अलग नहीं होना चाहते थे, लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है।
इसलिए समाजवादी सेक्युलर मोर्चा का गठन बहुत मजबूरी में किया है। उन्होंने कहा कि कभी सोचा नहीं था कि ऐसा भी करना पड़ेगा। शिवपाल ने कहा था कि मोर्चे के गठन से पहले और बाद में भी नेताजी से कई बार मुलाकात हुई है। नेताजी का आर्शीवाद उनके साथ है।
लेकिन शिवपाल की बात पुरानी हुई। नेता जी ने अपना आशीर्वाद अखिलेश को ही दिया। ऐसा नहीं कि शिवपाल इस स्थिति से बेखबर थे। मुलायम ने अखिलेश को उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाने के साथ कर लिया था। इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, पार्टी अध्यक्ष बनाया। उत्तराधिकार पर कोई संशय नहीं था। फिर भी शिवपाल रिश्तों के अतीत की चर्चा करते रहेंगे।

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