बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पद से इस्तीफे की घोषणा कर करीब एक महीने से बनी असमंजस की स्थिति को समाप्त कर दिया है। इस आशय वाले अपने पत्र में उन्होंने लिखा है कि प्रतिद्वंद्वियों को हम तब तक नहीं हरा सकते जब तक सत्ता की चाहत छोड़कर विचारधारा की एक बड़ी लड़ाई लडऩे का मन नहीं बनाते। राहुल के इस फैसले के बाद कांग्रेस को अब अपने नए अध्यक्ष का चुनाव करना है।
पार्टी संविधान के अनुसार, अध्यक्ष पद खाली रहने की स्थिति में पार्टी का सबसे वरिष्ठ महासचिव अस्थायी तौर पर अध्यक्ष का कामकाज संभाल लेता है। लेकिन कांग्रेस को लेकर देशभर में उत्सुकता यह है कि पार्टी का नेतृत्व गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति के हाथ में जाने पर क्या वह एकजुट रह पाएगी? बीती आधी सदी का पार्टी इतिहास यही बताता है कि जब-जब उसकी कमान गांधी-नेहरू परिवार से बाहर गई, पार्टी खंडित हुई।

पार्टी के भीतर कई समानांतर सत्ताएं उठ खड़ी हुईं और गांधी-नेहरू परिवार के वफादार लोग कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष के लिए प्राणांतक सिरदर्द बन गए। इसीलिए धीरे-धीरे करके यह मान लिया गया कि कांग्रेस तभी एकजुट रह सकती है जब गांधी-नेहरू फैमिली का छाता उस पर तना रहे। पार्टी को वोट भी अब तक काफी कुछ इस परिवार के करिश्मे से ही मिलते रहे हैं। इसके अलावा सत्ता भी इसके बचे रहने की एक बड़ी वजह बनी रही। लेकिन अभी हालात एकदम बदल गए हैं। बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों ने वोटरों का मिजाज बदल दिया है। लोगों को पता है कि कौन उनसे निरंतर संवाद कर रहा है।
किससे वे अपने दुख-सुख का साझा कर सकते हैं। यानी पार्टियों का सिर्फ चुनाव में दिखना काफी नहीं है। हर दिन की सक्रियता उनके लिए जरूरी हो गई है। इसके लिए मजबूत जमीनी संगठन उनके पास होना चाहिए, जिसे खड़ा करना कंाग्रेस भूल चुकी है।
स्थानीय इकाइयों के चुनाव के नाम पर वहां बस रस्म-अदायगी होती है। ज्यादातर जिलों में संगठन कागज पर चल रहा है। एक समय कंाग्रेस में क्षेत्रीय नेताओं की भरमार हुआ करती थी, जो जनता से जमीनी संवाद के दम पर पार्टी को वोट दिलाया करते थे। ऐसे नेताओं का अब वहां घोर अभाव हो गया है और हर बात में आलाकमान का मुंह ताकने का चलन चल पड़ा है।
अच्छा होता कि राहुल गांधी अपने त्यागपत्र में इन मुद्दों पर बात करते। इससे नए अध्यक्ष के सामने उसका कार्यभार स्पष्ट होता। नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई नेता कांग्रेस को अच्छी तरह चला सकता है, बशर्ते यह परिवार पार्टी में उसकी अथॉरिटी स्थापित होने दे। इसमें कोई शक नहीं कि गांधी-नेहरू परिवार मौजूदा कांग्रेस की रीढ़ है। पार्टी के भीतर नई कार्य संस्कृति उसकी कोशिशों से ही आएगी। लेकिन यह काम उसे खुद को पीछे रखते हुए करना होगा। नए अध्यक्ष के नेतृत्व में अगर कंाग्रेस के भीतर जमीनी कामकाजी टीम स्पिरिट पैदा की जा सकी तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक खुशखबरी होगी।








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