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    Home»ब्लॉग

    ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना

    By August 25, 2018 ब्लॉग 9 Comments16 Mins Read
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    वीरेन्द्र सिंह गोधारा

    जब कोई बहुत प्यारा व्यक्ति जाता है तो दिल यही पुकारता है, ‘‘ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आना…..’’ इन्हीं शब्दों से आरंभ होने वाला गीत 1963 के चलचित्र ‘बन्दिनी’ में सुनने को मिला था सान्द्र भावनात्मकता से ओत-प्रोत इस गीत को शैलेन्द्र ने लिख था तथा इसके भावों को अपने स्वर से विस्तार दिया था मुकेश ने . गीत में ‘हो सके तो..’ के उपयोग ने ग़ज़ब का असर पैदा किया है बुलाने वाले को लग रहा है कि जाने वाला कदाचित नहीं लौट पाएगा. किन्तु दिल तो यही चाह रहा है कि वह लौट आये. राग जोग पर आधारित इस गीत में निर्मल भावनाओं के साथ विषाद तथा कसक का जो अद्रुत मेल है, वह अन्यत्र दुर्लभ है. एक आदर्श गीत के चार पक्ष होते है. गीत लेखन, धुन, गायम तथा इन तीनों में तालमेल. धुन तथा तालमेल का दायित्व संगीत निर्देशक पर होता है इस गीत में यह दायित्व शचीन देव बर्मन ने सफलतापूर्वक निभाया था.

    चैथे दशक के मध्य से अपनी मृत्यु पर्यनत, आठवें दशक के मध्य तक, चार दशक की लंबी अवधि के लिये चित्रपट संगीत के स्तंभ रहे शचीन देव बर्मन ने लगभग सौ चलचित्रों को संगीत से सजाया तथा सैंकड़ों मधुर गीतों की रचना की.इनमें से अनेक चलचित्रों के तो सभी गीत भारी लोकप्रियता के धनी सिद्ध हुये. शचीन दा का नाम बहुधा देवनागरी लिपि में ‘सचिन’ लिखा जाता है, जो अशुद्ध है. किन्तु इसमें दोष उस रोमन लिपि का है, जिसके माध्यम से शब्द दूसरी भाषाओं में पहुचते हैं तब ‘ठाकुर’ को ‘टैगोर’, सौरभ का ‘सौरव’ तथा ‘जस्टिस लिबढ़ाँ ’ का ‘जस्टिस लिब्रहान’ हो जाता है. अस्तु……शचीन दा का पूरा नाम शचीन्द्र देव बर्मन था वह त्रिपुरा के राजकुमार थ, उनका जन्म कमिल्ला में हुआ था, जो अब बांग्लादेश में हैं, उनके आठ भाई-बहन और थे।
    कोलकाता विश्वद्यिालय से ठण्।ण् करने के पश्चात उन्होंने अपना ध्यान पूरी तरह संगीत में लगा दिया. उन्होंने कृष्ण चन्द्र दे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय, बादल ख़ां तथा अलाउद्दीन ख़ां से संगीत की शिक्षा ली. 1932 में उन्होंने कृष्ण चन्द्र दे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय, बादल ख़ां तथा अलाउद्दीन ख़ंा से संगीत की शिक्षा ली. 1932 में उन्होंने कोलकाता रेडियों स्टेशन पर गायन प्रारंभ किया. उनके गायन पर बंगला लोकधुनों-भटियाली.

    सारी, धमैल इत्यादि स्टेशन पर गायन प्रारंभ किया. उनके गायन पर बंगला लोकधुनों-भटियाली. सारी. धमैल इत्यादि का प्रभाव था, जो बहुत बाद तक भी उनकी संगीत रचनाओं पर देखा जा सकता है. 1932 में ही उनका पहला बंगला ग्रमोफ़ोन रिकाॅर्ड हिन्दुस्तान म्यूज़िकल प्रोडक्ट्ज़ द्वारा प्रकाशित किया गया, इसके पश्चात तो उनके रिकाॅर्डो की पंक्ति लग गई. तत्कालीन प्रतिष्ठित संगीतकारों-हिमांशु दत्त, राय चन्द बराल, काज़ी नज़रूल इस्लाम तथा शैलेश दासगुप्त के निर्देशन में उन्होंने गीत गये. 1934 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के निमंत्रण पर उन्होंने अखिल भारतीय संगीत समारोह में बंगला ठुमरी प्रस्तुत की, जिसे वहां उपस्थित विजय लक्ष्मी पंडित तथा अस्ताद अब्दुल करीम ख़ां द्वारा काफ़ी सराहा गया. इसी वर्ष बंगला संगीत समारोह, कोलकाता में, जिसका उद्घाटन रबीन्द्र नाथ ठाकुर ने किया था, उन्हें ठुमरी गायन के लिये स्वर्ण पदक मिला.

    10 फ़रवरी, 1938 को उन्होंने अपनी प्रेयसी मीरा दासगुप्त के साथ घर बसा लिया तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में यह एक क्रान्तिकारी क़दम था, क्योंकि मीरा राजकुमारी नहीं थी राजपरिवार का कोपभाजन बनने से शचीन दा को पारिवारिक संपत्ति में से अपना अंश भी गंवाना पड़ा 27 जून, 1930 को उनके पुत्र राहुल देव का जन्म हुआ. कालान्तर में पहले उनके पुत्र और उसके बाद उनकी पत्नी भी उनके सहायक संगीत निर्देशक रहे.

    चलचित्र के लिये उनका पहला गीत ‘यहूदी की लड़की’ (1933) के लिये रिकाॅर्ड हुआ, किन्तु इसका उपयोग चित्र में नहीं किया गया. चित्र के लिये इसे दुबारा पहाड़ी सान्याल के स्वर में रिकाॅर्ड किया गया. इस प्रकार चित्रपट पर उनका प्रथम गीत बंगला चत्र ‘सांझेर पिदिम’ में सुना गया. ‘सलीमा’ (1934) तथा ‘विद्रोही’ (1935) चलचित्रों में उन्होंने अभिनय भी किया. कुछ समय उन्होंने रंगमंच के लिये भी संगीत दिया.

    चलचित्रों में संगीत निर्देशन का क्रम 1937 में बंगला चित्र ‘राजगी’ से प्रारंभ हुआ 1944 में निर्माता-निर्देशक शशधर मुखर्जी उन्हें मुंबई खींच लाए और फिर शचीन दा मुंबई के ही होकर रह गये. शशधर मुखर्जी की संस्था फ़िल्मिस्तान में उन्होंने 1946 में चलचित्रों ‘शिकरी’ तथा ‘आठ दिन’ तथा 1947 में ’दो भाई’ में संगीत दिया. ‘दो भाई’ में रबीन्द्र संगीत का पुट लिये हुए गीता दत्त के गीत ‘‘मरा सुन्दर सपना बीत गया………’’ को आजतक बड़े चाव से सुना जाता है. इस गीत ने गीता दत्त तथा शचीन दा, दोनें को अपार लोकप्रियता दिलवाई. 1948 में देव आनन्द-सुरैया अभिनीत चित्र ‘विद्या’ में सुरैया-मुकेश का युगल गीत ‘‘लाई खुशी की दुनया..’’ लोकप्रिय हुआ. इस चि. से संबंधित एक रोचक तथ्य यह भी बताया जाता है कि चित्रांकन के समय दुर्घटनावशं नौका उलट जाने से तैरना ना जानने वाली सुरैया की जान देव आनन्द ने बचाई थी, जो दोनों के पे्रम संबंध प्रारंभ होने का कारण बना, शचीन दा इस संबंध की प्रगाढता में उत्पे्ररक की भूमिका निभाई.

    1949 में फ़िल्मिस्तान का जबर्दस्त हिट चित्र ‘शबनम’ आया. इसमें कामिनी कौशल की शोख़ अदाओं तथा शमशाद बेगम के मस्ताना अन्दाज़ से सराबोर कई भाषाओं की पंक्तियां संजोए गीत आया, ‘‘ये दुनिया रूप की चोर….’’जिसने तहलका मचा दिया. 1950 में चित्र ‘मशाल’ में संगीत देते समय कुछ ऐसा हुआ कि तुनुकमिज़ाज शचीन दा चित्र को बीच ही में छोड़ अगली गाड़ी से कोलकाता लौटने का निर्णय ले बैठे.

    सौभाग्य से उन्हें मना लिया गया अन्यथा इतिहास कुछ दूसरा ही होता. ‘मशाल’ का संगीत, विशेष रूप से मन्ना दे का गीत, ‘‘ऊपर गगन विशाल….’’ अत्यन्त लोकप्रिय हुआ. मन्ना दे के लिये तो यह गीत उन्हें पाश्र्वगायन की मुख्य धारा में लाने वाला सिद्ध हुआ, अन्यथा अब तक वह कई वर्षो से सफलता के लिये हाथ-पैर मार रहे थे तथा गायन की पूरी तैयारी एवं योग्यता के सत्यापि सफलता उन्हें छल रही थी. इस गीत में समूह गान के स्वरों पर ध्यान दिया जाए तो किशोर कुमार तथा स्वयं शचीन दा स्वर हमें सुनाई देता है.

    यहीं से किशोर कुमार और शचीन दा की टीमिंग प्रारंभ होती है इसी वर्ष चित्र ‘प्यार’ में उन्होंने किशोर कुमार से कई गीत गवाएा. किशोर कुमार द्वारा राज कपूर के लिये पाश्र्वगायन केवल इसी चित्र में मिलता है. राज कपूर के लिय, तथा, बहुत बाद में 1974 में दिलीप कुमार के लिये चित्र ‘सगीना’ में किशोर कुमार से गवाने का श्रेय एकमात्र शचीन दा को जाता है.1947 के चित्र ‘दिल की रानी’ में तो शचीन दा ने यशोदा नन्दन जोशी का गीत चित्रके नायक राज कपूर से ही गवा लिया था, और क्या खूब गवाया कि, बताया जाता है, उन दिनों जिसे देखो उसके होटों पर यही गीत…….‘‘ओ दुनिया के लोगो बोलो, कहां छिपा चितचोर…’’ अपने कैरियर के प्रारंभिक दौर में किशोर पाश्र्वगायन को लेकर गंभीर नहीं थे और अभिनय की ओर उनका झुकाव अधिक था, उनकी पाश्र्वगायन क्षमता को पहचानकर सर्वप्रथम खेमचन्द्र प्रकाश ने 1948 में उनसे चित्र ‘ज़िद्दी’ में गीत ‘‘मरने की दुआएं क्यों मांगूं…’’ गवाया. संयोग से किशोर का यह पहला गीत देव आनन्द पर ही चित्रित किया गया था. फिर खेमचन्द्र प्रकाश ने ही 1949 में चित्र ‘रिमझिम’ में उनसे गीत ‘‘जगमग-जगमग करता निकला चांद पूनम का…….’’गवाया. इसके पश्चात शचीन दा का ध्यान किशोर पर गया.

    चित्र ‘विद्या’ में शचीन दा की जो पटरी देव आनन्द के साथ बैठी, वह बहुत लंबी गई. उस दौर के सभी पाश्र्वगायकों-मुकेश, रफी, किशोर, हेमन्त, तलत तथा मन्ना-का उपयोग उन्होंने देव आनन्द के लिये किया. 1950 में जब देव ने अपनी निर्माण संस्था नवकेतन की नींव डाली तो अपने प्रथम चित्र ‘अफ़सर’ के संगीत निर्देशन का दायित्व शचीन दा को ही सौंपा. यह सिलसिला बहुत लंबा चला तथा जब तक वह जीवित रहे, नवकेतन के चित्रों को वह, अथवा उनके पुत्र एवं सहायक राहुल, संगीत से संवारते रहे. अपवाद के रूप में चित्र ‘हमसफ़र’ (संगीत:अली अकबर खां़) तथा चित्र ‘हम दोनों’ (संगीत: जयदेव) का उल्लेख किया जा सकता है. अन्य निर्माता भी देव आनन्द अभिनीत चित्रों में बहुधा शचीन दा से ही संगीत निर्देशित करवाते थे.

    चित्र ‘अफसर’ में सुरैया के दो गीतों को अपार लोकप्रियता मिली, ‘‘ मन मोर हुआ मतवाला..’’ तथा ’’नैन दीवाने, एक ने मानें…’’. 1951 में नवकेतन के चित्र ‘बाज़ी’ में उन्होंने गीता दत्त की आवाज़ के विविध आयाम तलाशे तथा विभिन्न प्रकार के गीतों में उनका उपयोग किया. इस चित्र के साहिर लुधियानवी के लिखे आठ गीतों में से एक-एक गीत शमशाद बेगम तथा किशोर कुमार का थाए शेष छः गीता दत्त के गये हुये थे, जिनमें से ‘‘ आज की रात पिया दिल न तोड़ों..’’ अपनी कोमल-सी मीठी-मीठी मनुहार के लिये बरबस याद आ जाता है. इसी चित्र का एक अन्य गीत हे‘‘ तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बनाले ….’’ गीत क्या है, चमत्कार है. आप को किसी भी कोण से क्या यह ग़जल लगती है ? अब लगती हो या न लगती हो साहब, है तो यह ग़ज़ल ही, यह तो शचीन दा का चमत्कार है कि पाश्चात्य संगीत में ढालकर इसे फड़कता हुआ बना दिया.

    यह चमत्कार हमें नवकेतन के ही 1955 के चित्र ‘हाउस नं. 44, में भी मिलता है. यहां भी साहिर लुधियानवी की ही एक ग़ज़ल थी, जिसे उन्होंने त्रासदी का जाल सा बुनते हुए हेमन्त कुमार के स्वरों में प्रसतुत किया, ‘‘तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं……’’ इसी चित्र में लता का गाया गीत ’’फैली हुई हैं सपनों की बाहें….’’ भोर के समीर के हिचकोले खिलाता हुआ उगते सूरज की लाली में आह्यद की सरिता में नौका विहार कराता सा लगता है. वैसे तो शचीन दा जो चित्र हाथ में लिये, उन्हीं में अपना कमाल दिखाया पर नवकेतन के चित्रों की बात ही और थी. उनका संगीत भी देव आनन्द के धंसू व्यक्तित्व के अनुरूप ही होता था,
    किन्तु शचीन देव बर्मन ने अन्य चलचित्रों के साथ सौतेला व्यवहार किया हो, ऐसा कही देखने को नहीं मिलता, यदि ‘काला पानी’ ‘गाइड’ तथा ‘ज्यूएल थीफ’ में एक से बढ़कर एक गीत हैं तो यही बात ‘‘प्यासा’’, ‘देवदास’ तथा ‘चलती का नाम गड़ी’ पर भी लागू होती है.

    वित्रपट संगीत का एक और पक्ष है जिस पर अपेक्षकत कम चर्चा होती है. हम सारी चर्चा की इतिश्री चित्र के गीतों की लय-ताल तथा काव्यात्मकता और गायक अथवा गायिका की प्रस्तुति पर ही कर देते हैं. रेगीत निर्देशक का एक और गुरूतर दायित्व होता है पूरे चित्र में दृश्यों के अनुरूप पृष्ठभूमि संगीत की आपूर्ति. हम देखते हैं कि इस दृष्टि से भी शचीन दा के चित्र कहीं उन्नीस नहीं पड़ते.

    1957 में लता मंगेशकर से मतभेद हो जाने पर शचीनदा ने बरसों लता से नहीं गवाया तथा आशा भोंसले से गवाना प्रारंभ कर दिय. लगभग ऐसी ही स्थिति ने, जहां हम देखते हैं कि, अण्णा साहब अर्थात बण्रामचन्द्र जैसी हस्ती को तोड़कर रख दिया था, शचीनदा चट्टान की तरह डटे रहे लता से दादा की अनबन बरसों चली. फिर जब दादा के पुत्र राहुल देव बर्मन चित्रों में स्वतंत्र रूप से संगीत देने लगे तथा गीतों के पर्वाभ्यास ;तमीमतेंसद्ध के लिये लता को घर बुलाने लगे तब बातों-बातों में ही अनबवन दूर भी हो गई.

    स्वयं गायक होने के सत्यापि शचीनदा अभिनेताओं के लिये पाश्र्वगायन नहीं करते थे. न हीं वह अन्य संगीत निर्देशकों के लिये गाते थे चित्रों में जहां-जहां उनके गीत हैं, पृष्ठभूमि से ही सुनाई देते हैं ऐसे गीतों की संख्या तो बहुत अधिक नहीं है, पर जो भी गीत उन्होंने गाये हैं, वे बहुत बढिया हैं तथा काफी लोकप्रिय भी. साथ ही वे हमें कोई न कोई संदेश अथवा प्रेरणा देते हैं. चित्र ‘सुजाता’ में मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा गीत ‘‘सन मेरे बन्धु रे…’’चित्र ‘बन्दिनी’ में शैलेन्द्र लिखित ‘‘ आरघना’ में आनन्द बख्शी का गीत ‘‘सफल होगी तेरी आराधना…..’’ ‘तलाश’ में मजरूह का गीत ‘‘मेरी दुनियाा है मा तेरे आंचल में…’’ तथा ‘गाइड’ में शैलेन्द्र का ‘‘वहां कौन है तेरा, मुसाफिर जायेगा कहां ?’’ उन गीतों में सहज ही याद आ जाते हैं उनका गाया भ्रमर गीत ‘‘धीरे से जाना बगियन में रे भंवरा……‘‘और भजन भजन ‘‘अंखियां हरि दरसन की प्यासी….’’ तो अद्भुत हैं.
    चित्र ‘आराधना’ को उनके कैरियर में एक मील के पत्थर के रूप देख जाता है, लेकिन उनके स्वयं के लिए नहीं,किशोर कुमार और राजेश खन्ना के लिए.

    इस चित्र से ही किशोर पाश्र्वगायन के तथा राजेश अभिनय के गगन में दैदाप्यमान नक्षत्र की भांति चमकने लगे. किशोर ने रफ़ी को काफी पीछे छोड़ दिया तो राजेश ने धर्मेन्द्र को. दादा के पुत्र राहुलदेव उर्फ पंचम यू तो कई वर्षों से पिता के सहायक के रूप में कार्य करने के साथ-साथ स्वतन्त्र रूप से भी अनुबंध ले रहे थे किन्तु इस चित्र के बाद दादा के अनुबंधों का ग्राफ नीचे जाने लगा और पंचम का ऊपर. आराधना में पंचम यूं तो सहायक संगीत निर्देशक थे किनतु वास्तव में इससे बहुत अधिक थे. राजेश खन्ना की चित्र में दोहरी भूमिका थीं पिता तथा पुत्र की, अधिक महत्वपूर्ण पिता की भूमिका के लिये किशोर से गवाया. बहुधा अपने निर्णय पर अड़़ जाने वाले दादा का इसके लिये मान जाना कुछ विचित्र लगता है. बहरहाल किशोर के गये सभी गीतों ने झंडे़ गाड़ दिए. आनन्द बख्शी के गीत ‘‘मेरे सपनों की रानी..’’ तो एक बाढ की भांति लोगों को बहा ले गया. इस गीत में माउथ आॅर्गन पंचम ने बजाया था.

    शचीन दा की छवि निर्भीक तथा मुंहफट और एक सीमा तक सनकी व्यक्ति की थी. किन्तु उनके हृदय में निर्मल पे्रम हिलोलें लेता रहता था इसलिए उनकी डाट सूनकर भी लोग उनके साथ को तरसते थे प्रतिभा उनमें बला की थी जिसका सब लोहा मानते थे. पान की गिलौरियों से भरा डिब्बा सदैव साथ रहता था. किसी से बहुत प्रसन्न हो जाते थे तो पान खिलाते, अन्यथा बीच-बीच में स्वयं ही खाते रहते, दादा की विनोदप्रियता की इन्तिहा यह थी कि उनकी गायन शैली की मिमिक्री जब नाक से गाकर किशोर या सुदेश भोंसले करते तो वह खुश होते. दादा का निणर्य पलटने की एक अन्य घटना का उल्लेख अपने एक साक्षात्कार में मजरूह सुल्तानपुरी ने किया था. चित्र ‘पेइंग गेस्ट’ में कहानी में एक स्थिति में दादा किशोर से एकल गीत गवाना चाहते थे किन्तु मजरूह उस स्थिति के लिए युगल गीत लिखने का मन बना चुके थे मजरूह के प्रस्ताव पर पहले तो शचीनदा भड़के, ‘‘हटाओं…..ये नहीं चलेगा’’ किन्तु मजरूह के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने स्वीकार कर लिया. आशा तथा किशोर का गया हुआ वह गीत यादगार बन गया… ‘‘छोड़ दो आंचल जमाना क्यों कहेगा..’’

    1957 में अपने अंतिम गीत चित्र ‘मिली’ के मजयह लिखित, ‘‘बड़ी सूनी है..’’ के ध्वनिमुद्रण के पश्चात दादा का स्वस्थ्य तेजी से बिगड़ा तथा 1 अक्टूबर, 1975 को वह चल बसे. अनेक सम्मानों तथा पुरस्कारों से अलंकृत दादा के योगदान को संगीत तथा चलचित्र से जुडे़ लोग कभी भुला नहीं सकेंगे

    सम्मान तथा पुरस्कारः

    -1934: बंगाल आॅल इंडिया म्यूूजिक काॅन्फें्रस, कोलकाता स्वर्ण पदक
    -1954ः सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र टैक्सी ड्राइवर) फिल्मफेयर पुरस्कार
    -1958ः संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
    -1958: एशिया फिल्म सोसायटी पुरस्कार
    -1965: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र तीन देविया) बंगली फिल्म जर्नलिस्ट पुरस्कार
    -1966: सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक (चित्र गाइड) बंगाली फिल्म जर्नलिस्ट पुरस्कार
    -1969: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र आराधना) बंगाली फिल्म जर्नलिस्ट पुरस्कार
    -1969: पद्मश्री राष्ट्रीय पुरस्कार
    -1970: सर्वश्रेष्ठ पश्र्वगायक (सफल होगी तेरी आराधना-चित्र आराधना) राष्ट्रीय पुरस्कार
    -1973: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र अभिमान) फिल्मफेयर पुरस्कार
    -1973: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र अभिमान) बंगला फिल्म जर्नलिस्टअ पुरस्कार
    -1974: सर्वश्रेश्ष्ठ संगीत निर्देशक (चित्र ज़िन्दगी) राष्ट्रीय पुरस्कार

    शचीन देव बर्मन द्वारा संगीतबद्ध प्रमुख चलचित्रः

    राजगी (1937), जाखेर धन (1939), जीबन संगिनी (1940), प्रतिशोध (1941), शिकारी (1945), आठ दिन (1946), चित्तौड़ विजय, दिल की रानी, दो भाई (1947), विद्या (1948), शबनम (1949),, अफसर, मशाल, प्यार (1950), बाजी, बहार, बुजदिल, एक नज़र, नौजवान, सज़ा (1951), जाल, लाल कुंवर (1952), अरमान, बाबला, जीवन ज्योति, शहंशाह (1953), टैकसी ड्राइवर, (1954), जाल, लाल कुंवर (1952), फंटूश (1956), नौ दो ग्यारह, पेइंग गेस्ट, प्यासा (1957), चलती का नाम गाड़ी, काला पानी, सोलवां साल, सोलवां साल, लाजवन्ती (1958), इंसान जाग उठा, कागज के फूल, सुजाता (1959), बेवकूफ, काला बाजार, बंबई का बाबू, एक के बाद एक,मंजिल, मियां बीवी राज़ी (1960), बात एक राज की, डाॅ. विद्या (1962), तेरे घर के सामने, बन्दिनी, मेरी सूरत तेरी आंखे (1963), बेनज़ीर, कैसे कहूं, जिद्दी (1964), गाइड, तीन देवियां (1965), ज्यूएल थीफ़ (1967) आराधना, तलाश, जयोति (1969), पे्रम पुजारी (1970), गैम्बलर, गैम्बलर, शर्मीली, नया जमाना, तेरे मेरे सपने (1971), अनुराग, जिन्दगी जिन्दगी (1972), फागुन, जुगनू, छपा रूस्तम, अभिमान (1937), प्रेम नगर, सगीना 1974), चुपके-चुपके, मिली (1957), बारूद, अर्जुन पंडित, दीवीनगी (1976), त्याग (1977).

    शचीन देव बर्मन के कुछ सदाबहार गीतः

    आलेख में जिन गीतों की चर्चा हो चुकी है, उनमें मैं ये गीत और जोड़ना चाहूंग. यह सूची किसी भी दृष्टि से परिपूर्ण नहीं है. कुछ गीतों के छूटने का और कुछ को यंूही ले लेने के परिवाद भी उठेंगें ही. यही कहना चाहूंगा कि कितनी भी सूचियां बनवाई जाएं, हर व्यक्ति अलग सूची ही बनायेगा.

    सैयां दिल में आना रे – राजेन्द्र कुष्ण (शमशाद-बहार), तुम न जाने किस जहां में खो गये – साहिर (लता-सजा), सुन जा दिल की दास्तां, -साहिर (हेमन्त-जाल), रात के राही थक मत जाना – साहिर (मन्ना-बाबला), जायें तो जाये कहां – साहिर (लता/तलत-टेक्सी ड्राइवर), जीवन के सफ़र में राही -साहिर (लता/किशोर-मुनीमजी), आगे तेरी मरज़ी – साहिर (लता-देवदास), चुप है धरती – साहिर (हेमन्त-हाउस नं. 44), आंखों में क्या जी -मजरूह (आशा, किशोर-नौ दो ग्यारह), चांद फिर निकला – मजरूह (लता-पेइग गेस्ट), हमने तो जब कलियां मांगी -साहिर (हेमन्त-प्यासा), ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है -साहिर (रफ़ी-प्यासा), नन्ही कली सोने चली -मजरूह (गीता-सुजाता), अपनी तो हर आह इक तूफान है-शैलेन्द्र (रफी-काला बाजार),चल री सजनी अब क्या सोचे – मजरूह (गीता-सुजाता), अपनी तो हर आह इक तूफान-मजरूह (तलत-सुजाता), नन्ही कली सोने चली – मजरूह (गीत-सुजाता), अपनी तो हर आह इक तूफान है – शैलेन्द्र (रफी-काला बाजार), चल री सजनी अब क्या सोचे – मजरूह (मुकेश-बंबई का बाब) पवन चले तो उठे नदी में लहरिया – (आशा,रफी-बंबई का बाबू) किसने चिलमन से मारा नजारा मुझे – मजरूह (मन्ना-बात एक रात की), ऐ दिले आवारा चल – मजरूह (शचीनदा-बन्दिनी ), ये किसने गीत छेड़ा – शेलेन्द्र (मेरी सूरत तेरी आंखें), पूछो न कैसे मैंन रैन बिताई – शैलेन्द्र (मेरी सूरत तेरी आंखें), रात का समां-शैलेन्द्र (मरी सूरत तेरी आंखें), पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई – शैलेन्द्र (गाइड), कहीं बेखयाल होकर – मजरूह (रफी-तीन देवियां), रात अकेली है – मजरूह (आशा-ज्यूएल थीफ), कोरा कागज था ये मन मेरा – आनन्द बख्शी (लता,किशोर-आराधना), फूलों के रंग से दिल की कलम से – नीरज (किशोर-प्रेम पुजारी), जीवन की बगिया महकेगी – नीरज (लता, किशोर-तेरे मेरे सपने), तेरा कंगना रे – मजरूह (लता, रफी-अभिमान), आग लगी हमरी झोंपड़िया में- मजरूह (किशोर-सगीना), आये तुम याद मुझे – मजरूह (किशोर-मिली).

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