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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    सोनिया का मंसूबा और पूर्वोत्तर की मिसाल

    By March 14, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
    सोनिया गांधी अपने पुत्र को विरासत सौपने के बाबजूद निश्चिंत नहीं हो सकी हैं। पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणामों ने उन्हें अवश्य निराश किया है। यह बात उनके ताजा बयान से जाहिर है। सोनिया ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने हेतु प्रयास किया है। उन्होंने मंसूबा दिखाया कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह भाजपा को जीतने नहीं देंगी। अच्छे दिन का हश्र शाइनिंग इंडिया जैसा होगा। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि उसने कांग्रेस मुस्लिम समर्थक पार्टी होने का ठप्पा लगा दिया। जबकि कुछ दिन पहले उन्होंने कहा था कि अब राहुल उनके नेता है। उनके निर्देशन में पार्टी चलेगी। लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम ने कांग्रेस को हिला दिया है। उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ईसाई बहुल इन राज्यों में भाजपा बाजी मार ले जाएगी। किन्तु सबका साथ सबका विकास नारा यहां भी कामयाब हो गया। इसी लिए सोनिया गांधी को पुनः सामने आना पड़ा। विरासत सौपने के बाद भी उन्हें चैन नहीं मिला। ऐसा लग रहा है कि राहुल की क्षमता को लेकर वह परेशान है। इसी के मद्देनजर सोनिया गांधी ने विपक्षी पार्टियों को भोज पर बुलाया। वह चाहती है कि विपक्षी गठबन्धन की अगुवाई कांग्रेस करे। किन्तु राहुल के नाम पर अनेक विपक्षी पार्टियां सहमत नहीं है।
    सोनिया गांधी ने पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों में कांग्रेस और उसकी सहयोगी वामपंथी पार्टियों की पराजय पर फोकस नहीं किया। लेकिन उनका बयान ऐसे समय में आया, जिसमें पराजय का सन्दर्भ भी जुड़ गया। मतलब जो पार्टी लगातार अपना जनाधार बढाती चल रही है, सोनिया एक वर्ष बाद उसे रोकने का हौसला दिखा रही है। त्रिपुरा में भाजपा की पूर्ण बहुमत और मेघालय, नागालैंड में राजग सरकार का गठन चुनावी इतिहास में मील के पत्थर की भांति दर्ज होगा।    कुछ वर्ष पहले जिसका सपना देखना भी संभव नहीं था, वह सच्चाई बन कर सामने आ गया। त्रिपुरा में जनादेश के अनुरूप भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गई। नवनियुक्त मुख्यमंत्री विरोधियों के लिए विप्लव साबित हुए। विप्लव देव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इस अभूतपूर्व बदलाव के साक्षी प्रधानमंत्री मोदी भी बने। प्रजातन्त्र में हार जीत को स्वभाविक प्रक्रिया माना जाता है।
    लेकिन त्रिपुरा का चुनावी संघर्ष दो विचारधाराओं के बीच था। एक लेनिन और माओ से प्रेरणा लेती थी, दूसरे की प्रेरणा  गांधी, अम्बेडकर, हेडगेवार रहे है। यहां केवल एक सरकार अपदस्त नहीं हुई है, बल्कि राष्ट्रवाद का नयायुग शुरू हुआ है। यह सांस्कृतिक रूप से राष्ट्रीय भावना को मजबूत बनाएगा। विदेशों से प्रेरणा लेने वाले तत्वों का मनोबल कमजोर होगा। त्रिपुरा के इस सन्देश का दूरगामी प्रभाव होगा।  कांग्रेस का कहना है कि भाजपा ने कम संख्या के बाद भी सरकार बना ली। यह आरोप गलत है।  मेघालय में  भाजपा की नहीं बल्कि राजग की सरकार बनी है। यह गठबन्धन चुनाव के पहले ही कांग्रेस के विरोध में बन चुका था।  ऐसी स्थिति में चुनाव पूर्व बने गठबन्धन का सँख्याबल राज्यपाल ने देखा। इस गठबन्धन को बहुमत प्राप्त था। संविधान और बोम्मई वाद के अनुरूप राजग को सरकार बनाने का आमंत्रण देने के अलावा राज्यपाल के पास कोई विकल्प नहीं था। कॉनरैड संगमा ने रविवार को मेघालय के राज्यपाल गंगा प्रसाद से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया था। नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के अध्यक्ष कॉनरैड संगमा आज मेघालय के मुख्यमंत्री बने।
    कॉनरैड संगमा को साठ सदस्यीय विधानसभा में चौतीस विधायकों का समर्थन प्राप्त है। नागालैंड में भी राजग की सरकार बनी। नेफ्यू रियो मुख्यमंत्री बने। नागालैंड के राज्यपाल पीबी आचार्य ने एनडीपीपी के वरिष्ठ नेता नेफ्यू रियो को प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ दिलाई. नागालैंड में एनडीपीपी ने बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई है।।
    रियो के पास भाजपा के बारह, एक जदयू और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन हासिल है।  साथ में एनडीपीपी के  अठारह विधायक हैं।
     जाहिर है कि कांग्रेस के अपने गढ़ से ही पैर उखड़ गए है। सोनिया की कवायद से कई तथ्य उजागर हुए है। पहला उन्हें लग रहा है कि राहुल की ताजपोशी का कोई उत्साहजनक परिणाम नहीं हुआ है। पार्टी भाजपा के मुकाबले पीछे छूट रही है। राहुल की बातों को आज भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। दूसरा यह कि कांग्रेस अकेले भाजपा का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। उसे गठबन्धन बनाने का प्रयास करना होगा। लेकिन ये प्रयास कितने सफल होंगे, इसे लेकर आशंका है। सोनिया गांधी के आवास पर हुए विपक्षी दलों के रात्रिभोज में सीपीआई-एम, सीपीआई, तृणमूल कांग्रेस, बसपा, सपा, जद-एस, आरजेडी और कांग्रेस सहित बीस विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया. इस रात्रिभोज में एनसीपी के शरद पवार, सपा के रामगोपाल यादव, बसपा के सतीशचंद्र मिश्र, राजद से मीसा भारती और तेजस्वी यादव, माकपा से मोहम्मद सलीम, द्रमुक से कनिमोझी, और शरद यादव आदि ने हिस्सा लिया। आंध्रप्रदेश की सत्तारुढ़ तेलुगू देशम पार्टी, बीजद और टीआरएस के नेताओं को निमंत्रित नहीं किया गया। तेदेपा ने हाल ही में अपने मंत्रियों को नरेंद्र मोदी सरकार से हटा लिया है, लेकिन वह राजग का घटक बनी हुई है। बीजद की उड़ीसा और टीआरएस  की तेलंगाना सरकार है। सोनिया आम चुनाव को लेकर विपक्षी दलों से मतभेद भुलाकर साथ आने की अपील कर चुकी है। लेकिन इसमें अनेक समस्याएं है। एक यह कि बीस में से अधिकांश दलों का सँख्याबल लगभग नगण्य है। इनके रहने से किसी गठबन्धन को मजबूती नहीं मिल सकती। दूसरा यह कि क्षेत्रीय दलों का अपने प्रदेश से बाहर कोई अस्तित्व नहीं है। इन्हें अकेले ही लड़ना होगा। तीसरी सबसे बड़ी बात यह है कि कांग्रेस खुद बहुत कमजोर हो गई है। क्षेत्रीय दल उसके साथ जाने में फिलहाल कोई फायदा नही देख रहे है। जैसे उत्तर प्रदेश में निकॉय और गोरखपुर, फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन समाप्त कर दिया था।
    अपने को मजबूत बनाने का कोई तरीका कांग्रेस को नजर नहीं आ रहा है। केवल भाजपा पर तोहमत लगाकर वह अपना ग्राफ नहीं बढ़ा सकेगी। उसे मुसलमानों की हितैषी  भाजपा ने नहीं बताया बल्कि तुष्टिकरण के चलते कांग्रेस ने खुद यह छवि बनाई थी। उसके प्रधानमंत्री देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का बता रहे थे, कांग्रेसी दिग्गज हिन्दू आतंकवाद का राग अलाप रहे थे, बटाला मुठभेड़ में आतंकवादी के मरने पर आंसू निकल रहे थे। इन कारणों से कांग्रेस ने अपना दायरा सीमित कर लिया था। इसके लिए कोई अन्य दोषी नहीं था। घोटालों को रोकने, दोषियों के खिलाफ कार्यवाई करने में भी यूपीए सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई थी। व्यवस्था को सुधारने पर भी ध्यान नहीं दिया गया। इसी लिए आमजन के विश्वास पुनः हासिल करने में कांग्रेस को परेशानी हो रही है।
    मंसूबा बनाने का अधिकार सबको है। लेकिन इसके अनुरूप जब मिसाल भी दी जाती है, तभी उसका महत्व होता है।  सोनिया गांधी का आगामी आम चुनाव को लेकर दिया गया बयान, और विपक्षी पार्टियों को दिए गए भोज का समय ही निराशाजनक था। सोनिया गांधी ने उधर मंसूबा बनाया, आमचुनाव के बाद सत्ता में लौटने का दावा किया, उधर पूर्वोत्तर के तीन राज्यो से कांग्रेस और उसके सहयोगी कम्युनिस्ट दलों के पैर उखड़ गए। मिसाल इस पराजय की बनी, ऐसे में मंसूबा भी बेअसर हो गया।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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