एक समय रैगिंग नए छात्रों के आने पर उनके स्वागत में इंट्रोडक्शन और आपसी मेल मिलाप था लेकिन समय बदलते ही अब एक कुत्सित और ऊंच नीच की नफरत से भरी मानसिकता रैगिंग का रूप ले चुकी है इसमें भी कभी कभी छात्रा और छात्रों पर मानसिक पीड़ा के साथ जान पर बन आती है। यह प्रतिस्पर्धा का कौन सा दौर है जहां प्रेम कम नफरत ज्यादा है। अब देखिये शिक्षण संस्थानों में रैगिंग खत्म करने के जितने भी उपाय क्यों न किए जाएं लेकिन उनसे इस पर कोई लगाम लगती नहीं दिखाई देती है। उद्दण्ड सीनियर छात्र आज भी डरे-सहमे जूनियरों की रैगिंग के नाम पर तमाम तरह की उद्दण्डता करते हैं। वे यह भी नहीं देखते कि उनके इस कदम का क्या असर पड़ेगा।
ऐसी ही एक घटना में लखनऊ के एक विश्वविद्यालय में एक दिव्यांग छात्र के साथ रैगिंग का एक शर्मनाक मामला सामने आया है। यहां बीए प्रथम सेमेस्टर के छात्र को पहले उसके सीनियर ने जबरन सिगरेट पिलाई। विरोध करने पर छात्र को हॉस्टल के कमरे में बंदकर बेरहमी से पीटा। इसके बाद भी दिव्यांग छात्र की मुसीबत कम नहीं हुई।
आरोप है कि सीनियर छात्रों ने उसके साथ दुष्कर्म भी किया। पीड़ित छात्र का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उसकी शिकायत पर लापरवाह रवैया बरता तथा दोषियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की। हालांकि रिपोर्ट के आधार पर दोषी छात्रों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने का भरोसा दिलाया है। यह एक बानगी है। पीड़ित छात्र ने रिपोर्ट कर दी तो मामला सामने आ गया। कई छात्र मामला खिंचने और बदनामी के भय से रिपोर्ट ही नहीं कराते लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता कि ऐसी घटनाओं की अनदेखी की जाय।
प्रयास तो यह होना चाहिए कि शिक्षण संस्थानों में इस तरह की घटनाएं होने ही न पाएं। आखिर छात्र इन संस्थानों में अध्ययन के लिए आते हैं और रैगिंग का अध्ययन से कोई संबंध नहीं है। यह तो पूरी तरह अराजक कार्रवाई है और पूरी तरह से दण्डनीय भी है। उम्मीद यह की जानी चाहिए कि संबंधित विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले में त्वरित कदम उठाएगा। अन्य संस्थानों में भी रैगिंग पर पूरी तरह से रोक सुनिश्चित की जानी चाहिए।







