मुनाफा कमाने तक सीमित सिनेमा उद्योग!

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हेमंत पाल

हिंदी सिनेमा से ज्यादा नैतिक अपेक्षाएं नहीं पाली जाना चाहिए! खुलेपन के खोखले दंभ से जूझता सिनेमा आज दुनिया के साम्राज्यवादी बाजारों के दबाव से जूझ रहा है। क्योंकि, सिनेमा भी अब खोखले आदर्शों के तनाव से बचना चाहता है। उसके लिए यह वक्त नैतिक आख्यानों, संस्कृति और परंपरा की दुहाई देने का नहीं है। इसलिए कि वह दुनिया के बाजार का सांस्कृतिक एजेंट है। उसके ऊपर सिर्फ बाजार वाले मांग और आपूर्ति के कायदे-कानून लागू होते हैं। सिनेमा भी इसी मांग और आपूर्ति पर खरा उतरने की बेताबी से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में सिनेमा के सामाजिक दायित्व और उसके सरोकारों पर नजर डालना बेहद जरुरी है।

वास्तविकता यह है कि आज का सिनेमा कला फिल्मों के बाजार की एक पूरी धारा को निगल गया। वो कला फ़िल्में जिन्होंने समाज की असलियत दिखाने की कोशिश की थी, आज नदारद है। लेकिन, उस सिनेमा से जुड़ा तबका अभी भी इसी बाजार को सजाने में लगा है। एक समय वो था जब वी. शांताराम से लगाकर गुरुदत्त, केए अब्बास ने व्यावसायिक सिनेमा में दखल देकर नए सिनेमा की नींव रखी थी। उस सिनेमा का मकसद सिर्फ चांदी काटना नहीं था! लेकिन, आज का सिनेमा उद्योग सिर्फ मुनाफा कमाने तक सीमित है। उसके लिए फिल्म की रिलीज के साथ ही सौ, दो सौ करोड़ क्लब में शामिल होने की चिंता सताने लगती है। उसके ये इरादे खतरनाक संकेत हैं।

इस एक सच की स्थापना ने हिंदी सिनेमा के मूल्य ही बदल दिए। दस्तक, अंकुर, मंथन, मोहन जोशी हाजिर हो, चक्र, अर्धसत्य, पार, आधारशिला, दामुल, अंकुश, धारावी जैसी फिल्में देने वाली धारा ही कहीं लुप्त हो गई। एक सामाजिक माध्यम के रूप में सिनेमा के इस्तेमाल की जिनमें समझ थी वे भी मुख्यधारा के साथ बहने लगे। यह बात भी काबिले गौर है कि कला फिल्मों ने अपने सीमित दौर में भी अपनी सीमाओं के बावजूद व्यावसायिक सिनेमा की झूठी और मक्कार दुनिया की पोल खोल दी। यह सही बात है कि आज सिनेमा का माध्यम अपनी तकनीकी श्रेष्ठताओं, प्रयोगों के चलते एक बेहद खर्चीला माध्यम बन गया है। ऐसे में सेक्स, हिंसा उनके अतिरिक्त हथियार बन गए हैं।

आज के सिनेमा की धारा समाज के लिए नहीं बल्कि बाजार के लिए है। सामाजिक सरोकार, प्रेम, देशभक्ति, भाईचारा ये सब कुछ यदि उनके मुनाफे का माध्यम बने तो ठीक, वरना ये सब भी दरकिनार कर दिए जाते हैं। मायालोक में विचरण करते इस सिनेमा का अपने आसपास के परिवेश से कोई सरोकार नहीं है। इसका कारण है कि आज उसके पास कोई आदर्श ‘नायक’ नहीं है। परदे पर पहले नायक और नायिका एकांत में नाचते या प्रेमालाप करते थे, आज ये सब खुलेआम करते हैं। संगीत का शोर और शब्दों का अकाल आज के इस सिनेमा की दयनीयता को बखानते हैं। जीवन का अनिवार्य हिस्सा बने होने के बाद भी सिनेमा पर समाज या सरकार का कोई बौद्धिक अंकुश नहीं है। इस का नतीजा ये रहा कि सिनेमा पूरी तरह निरंकुश हो गया।

समाज के एक बड़े हिस्से को सबसे ज्यादा सर्वाधिक प्रभावित करने वाले इस माध्यम के संदेशों को लेकर हमेशा ही लंबी बहस चलती रही है। लेकिन, धीरे-धीरे यह दौर भी थम सा गया! ऊँगली उठाने वाले जागरूक लोगों ने भी यह मान लिया कि इस माध्यम से किसी भी तरह की जनअपेक्षाएं पालना सही नहीं है। फिल्मकार भी यह तर्क देकर हर सवाल का अंत कर देते हैं कि हम तो वही दिखाते हैं, जो समाज में घटता है। किन्तु, यह बयान सच्चाई के कितना करीब है, ये हकीकत सब जानते हैं। सच तो ये है कि आज का सिनेमा कभी भी समाज की हलचलों का वास्तविक आईना नहीं बनता! उसे या तो वह अंतिरंजित करता है या सरलीकृत करके पेश करता है।

80 और 90 के दशक में लोगों की टूटती आस्था और सपनों से छल के बीच मुख्यधारा का सिनेमा अभिताभ बच्चन के रुप में ऐसी शख्सियत के उत्थान का गवाह बना, जो अपने बल पर अन्याय के खिलाफ लड़ाई मोल लेता था। लेकिन, आज वो दौर भी ख़त्म हो गया। आज का सिनेमा जहां पहुंचा है, वहां नायक-खलनायक और जोकर का फर्क ही ख़त्म हो गया। इसके बीच में शुरू हुए कला फिल्मों के आंदोलन को उसका ‘सच’ और उनकी ‘वस्तुनिष्ठ प्रस्तुति’ ही हजम कर गई! ऐसी स्थिति में यह तथ्य भी उभरकर सामने आया कि बाजार में झूठ ही ज्यादा बिकता है!

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