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    मौसम की मार से बेबस हम!

    By June 2, 2018 Hot issue No Comments5 Mins Read
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    जी क़े चक्रवर्ती

    मौसम चाहे कितना ही सुखद या दुखद क्यों न हो, यदि वह लगातार कई सप्ताहों तक एक जैसा बना रहता है लोग उससे ऊबने लगते ही हैं। ऐसे में लोग उसमें परिवर्तन होने का इंतजार करने लगते हैं। बहुत दिनों तक जब मौसम में कोई परिवर्तन नहीं होता तब उनका मूड निराशाजनक एवं उदास हो जाता है। लंबे समय तक मौसम का एक-सा बने रहने से शारीरिक दृष्टि से भी नुकसान देह हो सकता है।

    हमारे देश में पिछले एक दशक से मौसम में आमूलचूल परिवर्तन आया है। मौजूदा समय में मौसम अपना खेल खेल रही है अभी कुछ दिन पहले ही प्रचंड गर्मी पड़ रही थी लेकिन अब मौसम बहुत खुश ग्वार चल रहा है गर्मी बिलकुल खत्म हो गई सुखद मन मोहक हवाएं चल रही है भारत के दक्षिण भारत के केरल कर्नाटक में अक्सर जून के महीने तक मानसून पहुँचता है लेकिन इस बार मानसून अपने निर्धारित समय से तीन दिनों पहले ही आ पहुंचा है।

    भारत में यह पहला मौका है जब मौसम को लेकर इतने व्यापक स्तर पर चेतावनी जारी की गई है। मौसम विभाग इस तरह के अनुमान उपग्रहों से मिले आंकड़ों और अन्य स्रोतों से हासिल जानकारियों के विश्लेषण के आधार पर समय-समय पर व्यक्त करता रहता है। ऐसे में यह संभव है कि कई बार अनुमान सटीक न हो पाये।

    भारत के अनेक हिस्सों में मौसम का आलम यह है कि बारिश का मौसम आएगा तो पता चलेगा कि उमस भरी गर्मी पड़ रही है, आज से दो दशक पूर्व अक्तूबर के महीने में ठंड पड़नी शुरू हो जाती थी और मार्च तक बनी रहती थी। लेकिन मौजूदा समय में कुल पंद्रह दिनों तक भी कड़ाके की सर्दी नहीं पड़ रही है। ग्लोबल स्तर पर मौसम में आये इस तरह के बदलावों से पूरी दुनिया प्रभावित हुई है। समय बदला है और इस वर्तमान समय में यूरोप एवं अमेरिका जैसे देशों में सर्दी लंबे समय तक पड़ने लगी है, वहां पर इस समय ऐसी बर्फबारी होने लगी है कि जो वहां पिछले वर्षों में बर्फबारी के पिछले सारे रेकार्ड तोड़ दिए। वहीं पर अरब जैसे गर्म रेगिस्तान वाले मुल्कों से बर्फबारी की खबरें आ जाती हैं। समुद्र गरम होते जा रहे हैं जिसकी वजह से यहां के तटीय इलाकों के शहरों में गर्मी अपनी असर दिखाने लगी हैं। ऐसे में इंसान करे तो क्या करे, कुदरत की मार के आगे हम सभी बेबस हैं।

    अभी हाल ही ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण सन 2080 तक अकेले ब्रिटेन में बाढ़ के कारण होने वाली मौतें दो गुनी हो जाएँगी। यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रीनहाउस गैसों के वैश्विक उत्सर्जन में ब्रिटेन का योगदान दो फीसदी है, जबकि अमेरिका, जहाँ की आबादी वैश्विक जनंसख्या की तुलना में महज चार प्रतिशत है, ऐसी गैसों का 20 प्रतिशत से ज्यादा उत्सर्जन कर रहा है। अकेले अमेरिका ही हर साल 488 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में पहुँचाता है और कनाडा के साथ मिलकर कुल विश्व तेल खपत का 44 फीसदी हिस्सा उपभोग कर लेता है। इसके बाद नंबर यूरोपीय देशों में रूस का आता है। यह भी गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसी) के मुताबिक दुनिया को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में सन 2050 तक 60 फीसदी की कटौती करनी है, ताकि वह 1990 के स्तर पर आ सके।

    हमारे देश में बिगड़ते मौसम को लेकर मौसम विभाग आए दिन आगाह कर रहा है। इस बार उत्तरी राज्यों में जिस तरह से अचानक मौसम के बदलने से तेज आंधी-बारिश ने जो तबाही मचाई हुई है वह मौसम विज्ञानियों के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है। अभी पिछले ही हफ्ते उत्तर भारत को जिस प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ा, उसमें मौसम तंत्र से जुड़ी कई घटनाएं ऐसी हुर्इं जो इससे पहले कभी नहीं देखने आया हालांकि मई की शुरुआत में अंधड़ और बारिश को लेकर चेतावनी अवश्य जारी की गई थी, लेकिन यह चेतावनी राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्यों के लिए नहीं थी। जबकि इन्हीं दो राज्यों में सबसे ज्यादा तबाही मची। राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश में तबाही के कारण ही हरियाणा के ऊपर चक्रवाती वायु का प्रवाह बना रहा। जलवायु में तेजी से हो रहे इन छोटे-बड़े बदलावों ने ऋतु-चक्र को बिगाड़ दिया हैं। इसके साथ ही साथ भूमध्य सागर और अरब सागर से उठने वाली पछुआ हवाओं से इस कम दबाव वाले क्षेत्र में बादल एवं चक्रवाती तूफान उठे। मौसम में इन बदलावों के पीछे सबसे बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

    इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट की एक रिपोर्ट कहती है, “इन घटनाओं का अध्ययन करने से यह बात मानी जा सकती है कि भारत के हिमालयी राज्यों में बादल फटने की और बहुत ज्यादा बारिश की वजह से अचानक आने वाली बाढ़ के मामले बढ़े हैं। जैसे कि अभी उत्तराखंड में बादल फटने से तबाही मच गयी और सड़कें दो किलोमीटर तक फैट गयी।”

    भारत की आधी आबादी अपने खेती के लिए बारिश पर निर्भर है, लेकिन बीते एक दशक में मानसून का मिजाज काफी बदल चुका है। जर्मनी के क्लाइमेट चेंज इंस्टीट्यूट पोस्टडाम के याकोब श्वे भारतीय मानसून पर शोध कर रहे हैं। वह कहते हैं, “जिस तरह के बड़े बदलाव हम भारतीय मानसून के स्वभाव में देख रहे हैं, वे शायद इंसानी गतिविधियों की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन से जुड़ी दिखाई दे रही हैं। बीते कुछ दशकों से मौसम का व्यवहार बहुत बदल रहा है।”

    गर्मियों में भारतीय उपमहाद्वीप की हवा बहुत गर्म हो जाती हैं, इससे कम दबाव का क्षेत्र बनता है। समुद्र में नमी भरी ठंडी हवाएं इस कम दबाव के क्षेत्र की तरफ बढ़ती हैं, इससे बारिश होती है। वैज्ञानिकों को लगता है कि अगर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो भारत को आने वाले दशकों में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। वैज्ञानिक समुदाय तो इस बात भी चर्चा कर रहा है कि क्या मानसून भारत से हमेशा के लिए रूठ तो नहीं जाएगा।

    #cold weather #global warming #hot #raining wather

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